महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१९०-
नवत्यधिकशततमोऽध्यायः
कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट
वैशम्पायन उवाच
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां
पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ
भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मनुष्योंमें श्रेष्ठ महानुभाव कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घरमें प्रवेश करके अत्यन्त प्रसन्न हो माताको द्रौपदीकी प्राप्ति सूचित करते हुए बोले—'माँ! हमलोग भिक्षा लाये हैं' ॥ १ ॥
कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ
प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ।
पश्चाच्च कुन्ती प्रसमीक्ष्य कृष्णां
कष्टं मया भाषितमित्युवाच ॥ २ ॥
उस समय कुन्तीदेवी कुटियाके भीतर थीं। उन्होंने अपने पुत्रोंको देखे बिना ही उत्तर दे दिया—'(भिक्षा लाये हो तो) तुम सभी भाई मिलकर उसे पाओ।' तत्पश्चात् द्रौपदीको देखकर कुन्तीने चिन्तित होकर कहा—'हाय! मेरे मुँहसे बड़ी अनुचित बात निकल गयी' ॥ २ ॥
साधर्मभीता परिचिन्तयन्ती
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीताम् ।
पाणौ गृहीत्वोपजगाम कुन्ती
युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ॥ ३ ॥
कुन्तीदेवी अधर्मके भयसे बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं; (परंतु मनोनुकूल पतिकी प्राप्तिसे) द्रौपदीके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। कुन्तीदेवी द्रौपदीका हाथ पकड़कर युधिष्ठिरके पास गयीं और उनसे उन्होंने यह बात कही— ॥ ३ ॥
कुन्त्युवाच
इयं तु कन्या द्रुपदस्य राज्ञः
तवानुजाभ्यां मयि संनिविष्टा ।
यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं
समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ४ ॥
कुन्तीने कहा— बेटा! यह राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी है। तुम्हारे छोटे भाई भीमसेन और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया और मैंने भी (इसे देखे बिना ही) भूलसे (भिक्षा ही समझकर) अनुरूप उत्तर दे दिया—'तुम सब लोग मिलकर इसे पाओ' ॥ ४ ॥
मया कथं नानृतमुक्तमद्य
भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि ।
पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो
न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब कैसे मेरी बात झूठी न हो? और क्या किया जाय, जिससे इस पांचालराज-कुमारी कृष्णाको न तो पाप लगे और न नीच योनियोंमें ही भटकना पड़े ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तो मतिमान् नृवीरो
मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा ।
कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो
धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने माताकी यह बात सुनकर दो घड़ीतक (मन-ही-मन) कुछ विचार किया। फिर कुन्तीदेवीको भलीभाँति आश्वासन देकर उन्होंने धनंजयसे यह बात कही— ॥ ६ ॥
त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी
त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री ।
प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह
गृहाण पाणिं विधिवत् त्वमस्याः ॥ ७ ॥
‘अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है, तुम्हारे ही साथ इस राजकुमारीकी शोभा होगी। शत्रुओंका सामना करनेवाले वीर! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और (अग्निदेवके साक्ष्यमें) विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहण करो’ ॥ ७ ॥
अर्जुन उवाच
मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं
कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः ।
भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं
भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥
अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे
पश्चादयं सहदेवस्तरस्वी ।
वृकोदरोऽहं च यमौ च राज-
न्नियं च कन्या भवतो नियोज्याः ॥ ९ ॥
**अर्जुन बोले—**नरेन्द्र! आप मुझे अधर्मका भागी न बनाइये। (बड़े भाईके अविवाहित रहते छोटे भाईका विवाह हो जाय,) यह धर्म नहीं है; ऐसा व्यवहार तो अनार्योंमें देखा गया है। पहले आपका विवाह होना चाहिये; तत्पश्चात् अचिन्त्यकर्मा महाबाहु भीमसेनका और फिर मेरा। तत्पश्चात् नकुल फिर वेगवान् सहदेव विवाह कर सकते हैं। राजन्! भैया भीमसेन, मैं नकुल-सहदेव तथा यह राजकन्या—सभी आपकी आज्ञाके अधीन हैं ॥ ८-९ ॥
एवं गते यत् करणीयमत्र
धर्म्यं यशस्यं कुरु तद् विचिन्त्य ।
पाञ्चालराजस्य हितं च यत् स्यात्
प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥
ऐसी दशामें आप यहाँ अपनी बुद्धिसे विचार करके जो धर्म और यशके अनुकूल तथा पांचालराजके लिये भी हितकर कार्य हो, वह कीजिये और उसके लिये हमें आज्ञा दीजिये।
हम सब लोग आपके अधीन हैं ।। १० ।।
वैशम्पायन उवाच
जिष्णोर्वचनमाज्ञाय भक्तिस्नेहसमन्वितम् ।
दृष्टिं निवेशयामासुः पाञ्चाल्यां पाण्डुनन्दनाः ।। ११ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**अर्जुनके ये भक्तिभाव तथा स्नेहसे भरे वचन सुननेके बाद समस्त पाण्डवोंने पांचालराजकुमारी द्रौपदीकी ओर देखा ।। ११ ।।
दृष्ट्वा ते तत्र पश्यन्तीं सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् ।
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन् ।। १२ ।।
यशस्विनी कृष्णा भी उन सबको देख रही थी। वहाँ बैठे हुए पाण्डवोंने द्रौपदीको देखकर आपसमें भी एक-दूसरेपर दृष्टिपात किया और सबने अपने हृदयमें द्रुपदराजकुमारीको बसा लिया ।। १२ ।।
तेषां तु द्रौपदीं दृष्ट्वा सर्वेषाममितौजसाम् ।
सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ।। १३ ।।
द्रुपदकुमारीपर दृष्टि पड़ते ही उन सभी अमिततेजस्वी पाण्डुपुत्रोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर मन्मथ प्रकट हो गया ।। १३ ।।
काम्यं हि रूपं पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वयं ।
बभूवाधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ।। १४ ।।
विधाताने पांचालीका कमनीय रूप स्वयं ही रचा और सँवारा था। वह संसारकी अन्य स्त्रियोंसे बहुत अधिक आकर्षक और समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाला था ।। १४ ।।
तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनवचः कृत्स्नं सस्मार मनुजर्षभः ।। १५ ।।
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उनकी आकृति देखकर ही उनके मनका भाव समझ लिया। फिर उन्हें द्वैपायन वेदव्यासजीके सारे वचनोंका स्मरण हो आया ।। १५ ।।
अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् मिथोभेदभयान्नृपः ।
सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ।। १६ ।।
द्रौपदीको लेकर हम सब भाइयोंमें फूट ना पड़ जाय, इस भयसे राजाने अपने सभी बन्धुओंसे कहा—‘कल्याणमयी द्रौपदी हम सब लोगोंकी पत्नी होगी’ ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
भ्रातुर्वचस्तत् प्रसमीक्ष्य सर्वे
ज्येष्ठस्य पाण्डोस्तनयास्तदानीम् ।
तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभिः
सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वाः ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाईका यह वचन सुनकर उदार हृदयवाले समस्त पाण्डव मन-ही-मन उसीका चिन्तन करते हुए चुपचाप बैठे रह गये ।। १७ ।।
वृष्णिप्रवीरस्तु कुरुप्रवीरा-
नाशंसमानः सहरौहिणेयः ।
जगाम तां भार्गवकर्मशालां
यत्रासते ते पुरुषप्रवीराः ॥ १८ ॥
इधर वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ कुरुकुलके प्रमुख वीर पाण्डवोंको पहचानकर कुम्हारके घरमें, जहाँ वे नरश्रेष्ठ निवास करते थे, मिलनेके लिये गये ।। १८ ।।
तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घबाहुं
ददर्श कृष्णः सहरौहिणेयः ।
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्चा-
प्युपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ॥ १९ ॥
वहाँ बलरामसहित श्रीकृष्णने मोटी और विशाल भुजाओंसे सुशोभित अजातशत्रु युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी अन्य चारों भाइयोंको देखा ।। १९ ।।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽभिगम्य
कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ
युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ २० ॥
वहाँ जाकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे 'मैं श्रीकृष्ण हूँ' यों कहकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिरके दोनों चरणोंका स्पर्श किया ।। २० ।।
तथैव तस्याप्यनु रौहिणेय-
स्तौ चापि हृष्टाः कुरवोऽभ्यनन्दन् ।
पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरा-
वगृह्णतां भारतमुख्य पादौ ॥ २१ ॥
उन्हींके साथ उसी प्रकार बलरामजीने भी (अपना नाम बताकर) उनके चरण छूए। पाण्डव भी उन दोनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। जनमेजय! फिर उन यदुवीरोंने अपनी बूआ कुन्तीके भी चरणोंका स्पर्श किया ।। २१ ।।
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः
पप्रच्छ कृष्णं कुशलं विलोक्य ।
कथं वयं वासुदेव त्वयेह
गूढा वसन्तो विदिताश्च सर्वे ॥ २२ ॥
कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर अजातशत्रु युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको देखकर कुशल-समाचार पूछा और कहा—'वसुदेवनन्दन! हम तो यहाँ छिपकर रहते हैं, फिर आपने हम सब लोगोंको कैसे पहचान लिया?' ॥ २२ ॥
तमब्रवीद् वासुदेवः प्रहस्य
गूढोऽप्यग्निज्ञायित एव राजन् ।
तं विक्रमं पाण्डवेयानतीत्य
कोऽन्यः कर्ता विद्यते मानुषेषु ॥ २३ ॥
तब भगवान् वासुदेवने हँसकर उत्तर दिया—'राजन्! आग कितनी ही छिपी क्यों न हो, वह पहचानमें आ ही जाती है। भला, पाण्डवोंको छोड़कर मनुष्योंमें कौन ऐसा है, जो वैसा अद्भुत कर्म कर दिखाता ॥ २३ ॥
दिष्ट्या सर्वे पावकाद् विप्रमुक्ता
यूयं घोरात् पाण्डवाः शत्रुसाहाः ।
दिष्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः
सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् ॥ २४ ॥
'बड़े सौभाग्यकी बात है कि शत्रुओंका सामना करनेकी शक्ति रखनेवाले आप सभी पाण्डव उस भयंकर अग्निकाण्डसे जीवित बच गये। पापी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अपने मन्त्रियोंसहित इस षड्यन्त्रमें सफल न हो सका, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥ २४ ॥
भद्रं वोऽस्तु निहितं यद् गुहायां
विवर्धध्वं ज्वलना इवैधमानाः ।
मा वो विदुः पार्थिवाः केचिदेव
यास्यावहे शिबिरायैव तावत् ॥
सोऽनुज्ञातः पाण्डवेनाव्ययश्रीः
प्रायाच्छीघ्रं बलदेवेन सार्धम् ॥ २५ ॥
'हमारे अन्तःकरणमें जो कल्याणकी भावना निहित है, वह आपको प्राप्त हो। आपलोग सदा प्रज्वलित अग्निकी भाँति बढ़ते रहें। अभी आपलोगोंको कोई भी राजा पहचान न सकें, इसलिये हमलोग भी अपने शिविरको ही लौट जायँगे।' यों कहकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अक्षय शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीके साथ शीघ्र वहाँसे चल दिये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि रामकृष्णगमने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका आगमनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥