महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१३७-
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान् प्रसमीक्ष्य सः ।
गुर्वर्थं दक्षिणाकाले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देख द्रोणाचार्यने गुरु-दक्षिणा लेनेका समय आया जान मन-ही-मन कुछ निश्चय किया ॥ १ ॥
ततः शिष्यान् समानीय आचार्योऽर्थमचोदयत् ।
द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते ॥ २ ॥
जनमेजय! तदनन्तर आचार्यने अपने शिष्योंको बुलाकर उन सबसे गुरुदक्षिणाके लिये इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
पञ्चालराजं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि ।
पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात् परमदक्षिणा ॥ ३ ॥
‘शिष्यो! पांचालराज द्रुपदको युद्धमें कैद करके मेरे पास ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। यही मेरे लिये सर्वोत्तम गुरुदक्षिणा होगी’ ॥ ३ ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्ण प्रहारिणः ।
आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः ॥ ४ ॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर शीघ्रतापूर्वक प्रहार करनेवाले वे सब राजकुमार (युद्धके लिये उद्यत हो) रथोंमें बैठकर गुरुदक्षिणा चुकानेके लिये आचार्य द्रोणके साथ ही वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४ ॥
ततोऽभिजग्मुः पञ्चालान् निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः ।
ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः ॥ ५ ॥
दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः ।
दुःशासनो विकर्णश्च जलसंधः सुलोचनः ॥ ६ ॥
एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः ॥ ७ ॥
तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध तथा सुलोचन—ये और दूसरे भी बहुत-से महापराक्रमी नरश्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि राजकुमार 'पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा' इस प्रकार कहते हुए पांचालदेशमें जा पहुँचे और वहाँके निवासियोंको मारते-पीटते हुए महाबली राजा द्रुपदकी राजधानीको भी रौंदने लगे ॥ ५—७ ॥
ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह ।
प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः ॥ ८ ॥
उत्तम रथोंपर बैठे हुए वे सभी राजकुमार घुड़सवारोंके साथ नगरमें घुसकर वहाँके राजपथपर चलने लगे ॥ ८ ॥
तस्मिन् काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद् बलम् ।
भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात् ॥ ९ ॥
जनमेजय! उस समय पांचालराज द्रुपद कौरवोंका आक्रमण सुनकर और उनकी विशाल सेनाको अपनी आँखों देखकर बड़ी उतावलीके साथ भाइयोंसहित राजभवनसे बाहर निकले ॥ ९ ॥
ततस्तु कृतसंनाहा यज्ञसेनसहोदराः ।
शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥ १० ॥
महाराज यज्ञसेन (द्रुपद) और उनके सब भाइयोंंने कवच धारण किये। फिर वे सभी लोग बाणोंकी बौछार करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥
ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् ।
यज्ञसेनः शरान् घोरान् ववर्ष युधि दुर्जयः ॥ ११ ॥
राजा द्रुपदको युद्धमें जीतना बहुत कठिन था। वे चमकीले रथपर सवार हो कौरवोंके सामने जा पहुँचे और भयानक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
पूर्वमेव तु सम्मन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाब्रवीत् ।
दर्पोद्रेकात् कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम् ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरवों तथा अन्य राजकुमारोंको अपने बल और पराक्रमका बड़ा घमंड था; इसलिये अर्जुनने पहले ही अच्छी तरह सलाह करके विप्रवर द्रोणाचार्यसे कहा— ॥ १२ ॥
एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् ।
एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि ॥ १३ ॥
'गुरुदेव! इनके पराक्रम दिखानेके पश्चात् हमलोग युद्ध करेंगे। हमारा विश्वास है, ये लोग युद्धमें पांचालराजको बंदी नहीं बना सकते' ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद् बहिरैव सः ॥ १४ ॥
यों कहकर पापरहित कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने भाइयोंके साथ नगरसे बाहर ही आधे कोसकी दूरीपर ठहर गये थे ॥ १४ ॥
द्रुपदः कौरवान् दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः ।
शरजालेन महता मोहयन् कौरवीं चमूम् ॥ १५ ॥
तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।
अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १६ ॥
राजा द्रुपदने कौरवोंको देखकर उनपर सब ओरसे धावा बोल दिया और बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर कौरव-सेनाको मूर्च्छित कर दिया। युद्धमें फुर्ती दिखानेवाले राजा द्रुपद रथपर बैठकर यद्यपि अकेले ही बाण-वर्षा कर रहे थे, तो भी अत्यन्त भयके कारण कौरव उन्हें अनेक-सा मानने लगे ॥ १५-१६ ॥
द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतो दिशम् ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः ॥ १७ ॥
प्रावाद्यन्त महाराज पाञ्चालानां निवेशने ।
सिंहनादश्च संजज्ञे पाञ्चालानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥
धनुर्ज्यातालशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान् ।
द्रुपदके भयंकर बाण सब दिशाओंमें विचरने लगे। महाराज! उनकी विजय होती देख पांचालोंके घरोंमें शंख, भेरी और मृदंग आदि सहस्रों बाजे एक साथ बज उठे। महान् आत्मबलसे सम्पन्न पांचाल-सैनिकोंका सिंहनाद बड़े जोरोंसे होने लगा। साथ ही उनके धनुषोंकी प्रत्यंचाओंका महान् टंकार आकाशमें फैलकर गूँजने लगा ॥ १७-१८ १/२ ॥
दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुर्दीर्घलोचनः ॥ १९ ॥
दुःशासनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ।
सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्षतो युधि दुर्जयः ॥ २० ॥
व्यधमत् तान्यनीकानि तत्क्षणादेव भारत ।
दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम् ॥ २१ ॥
नानानृपसुतान् वीरान् सैन्यानि विविधानि च ।
अलातचक्रवत् सर्वं चरन् बाणैरतर्पयत् ॥ २२ ॥
उस समय दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन और दुःशासन बड़े क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। भारत! युद्धमें परास्त न होनेवाले महान् धनुर्धर द्रुपदने अत्यन्त घायल होकर तत्काल ही उन सबकी सेनाओंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। वे अलातचक्रकी भाँति सब ओर घूमकर दुर्योधन, विकर्ण, महाबली कर्ण, अनेक वीर राजकुमार तथा उनकी विविध सेनाओंको बाणोंसे तृप्त करने लगे ॥ १९—२२ ॥
(दुःशासनं च दशभिर्विकर्णं विंशकैः शरैः ।
शकुनिं विंशकैस्तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥
कर्णदुर्योधनौ चोभौ शरैः सर्वाङ्गसंधिषु ।
अष्टाविंशतिभिः सर्वैः पृथक् पृथगरिन्दमः ॥
सुबाहुं पञ्चभिर्विद्ध्वा तथान्यान् विविधैः शरैः ।
विव्याध सहसा भूयो ननाद बलवत्तरम् ॥
विनद्य कोपात् पाञ्चालः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
धनूंषि रथयन्त्रं च हयांश्चित्रध्वजानपि ।
चकर्त सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् ॥)
ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा ।
अभ्यवर्षन्त कौरव्यान् वर्षमाणा घना इव ॥ २३ ॥
उन्होंने दुःशासनको दस, विकर्णको बीस तथा शकुनिको अत्यन्त तीखे तीस मर्मभेदी बाण मारकर घायल कर दिया। तत्पश्चात् शत्रुदमन द्रुपदने कर्ण और दुर्योधनके सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें पृथक्-पृथक् अट्ठाईस बाण मारे। सुबाहुको पाँच बाणोंसे घायल करके अन्य योद्धाओंको भी अनेक प्रकारके सायकोंद्वारा सहसा बींध डाला और तब बड़े जोरसे सिंहनाद किया। इस प्रकार क्रोधपूर्वक गर्जना करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पंचालराज द्रुपदने शत्रुओंके धनुष, रथ, घोड़े तथा रंग-बिरंगी ध्वजाओंको भी काट दिया। तत्पश्चात् सारे पांचाल सैनिक सिंह-समूहके समान गर्जना करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी निवासी कौरवोंपर टूट पड़े और बरसनेवाले बादलोंकी भाँति उनपर मूसल एवं डंडोंकी वर्षा करने लगे ॥ २३ ॥
सबालवृद्धास्ते पौराः कौरवानभ्यायुस्तदा ।
श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥ २४ ॥
द्रवन्ति स्म नदन्ति स्म क्रोशन्तः पाण्डवान् प्रति ।
(पाञ्चालशरभिन्नाङ्गो भयमासाद्य वै वृषः ।
कर्णो रथादवप्लुत्य पलायनपरोऽभवत् ॥)
पाण्डवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥
अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा ।
युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥ २६ ॥
उस समय बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी पुरवासी कौरवोंका सामना कर रहे थे। जनमेजय! गुप्तचरोंके मुखसे यह समाचार सुनकर कि वहाँ तुमुल युद्ध हो रहा है, कौरव वहाँ नहींके बराबर हो गये हैं, पंचालराज द्रुपदके बाणोंसे कर्णके सम्पूर्ण अंग क्षत-विक्षत हो गये, वह भयभीत हो रथसे कूदकर भाग चला है तथा कौरव-सैनिक चीखते-चिल्लाते और कराहते हुए हम पाण्डवोंकी ओर भागते आ रहे हैं; पाण्डवलोग पीड़ित सैनिकोंका
रोमांचकारी आर्तनाद कानमें पड़ते ही आचार्य द्रोणको प्रणाम करके रथोंपर जा बैठे और शीघ्र वहाँसे चल दिये। अर्जुनने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको यह कहकर रोक दिया कि 'आप युद्ध न कीजिये' ।। २४—२६ ।।
माद्रेयौ चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाकरोत् ।
सेनाग्रगो भीमसेनः सदाभूद् गदया सह ।। २७ ।।
उस समय अर्जुनने माद्रीकुमार नकुल और सहदेवको अपने रथके पहियोंका रक्षक बनाया, भीमसेन सदा गदा हाथमें लेकर सेनाके आगे-आगे चलते थे ।। २७ ।।
तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
अयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन् दिशः ।। २८ ।।
तब शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर भाइयोंसहित निष्पाप अर्जुन रथकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ।। २८ ।।
पाञ्चालानां ततः सेनामुद्धूतार्णवनिःस्वनाम् ।
भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ।। २९ ।।
प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा ।
स्वयमभ्यद्रवद् भीमो नागानीकं गदाधरः ।। ३० ।।
पांचालोंकी सेना उत्ताल तरंगोंवाले विक्षुब्ध महासागरकी भाँति गर्जना कर रही थी। महाबाहु भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस विशाल सेनामें घुस गये, ठीक उसी तरह जैसे समुद्रमें मगर प्रवेश करता है। गदाधारी भीम स्वयं हाथियोंकी सेनापर टूट पड़े ।। २९-३० ।।
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः ।
अहनत् कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृत् ।। ३१ ।।
कुन्तीकुमार भीम युद्धमें कुशल तो थे ही, बाहुबलमें भी उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था। उन्होंने कालरूप धारणकर गदाकी मारसे उस गजसेनाका संहार आरम्भ किया ।। ३१ ।।
ते गजा गिरिसं print text: काशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु ।
भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः ।। ३२ ।।
पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः ।
गजानश्वान् रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः ।। ३३ ।।
पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः ।
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।। ३४ ।।
चालयन् रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः ।
भीमसेनकी गदासे मस्तक फट जानेके कारण वे पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज लोहूके झरने बहाते हुए वज्रके आघातसे (पंख कटे हुए) पहाड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। अर्जुनके बड़े भाई पाण्डुनन्दन भीमने हाथियों, घोड़ों एवं रथोंको धराशायी कर दिया। पैदलों तथा रथियोंका संहार कर डाला। जैसे ग्वाला वनमें डंडेसे पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन रथियों और हाथियोंको खदेड़ते हुए उनका पीछा करने लगे ।। ३२ —३४ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ।। ३५ ।।
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात् स पाण्डवः ।
हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ।। ३६ ।।
पातयन् समरे राजन् युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उस समय द्रोणाचार्यका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रुपदपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उनपर चढ़ आये। वे रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके झुंडोंका सब ओरसे संहार करते हुए प्रलयकालीन अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३५-३६ १/२ ।।
ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ३७ ।।
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः ।
सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ।। ३८ ।।
उनके बाणोंसे घायल हुए पांचाल और सृंजय वीरोंने तुरंत ही नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया और मुखसे सिंहनाद करते हुए उनसे लोहा लेना आरम्भ किया ।। ३७-३८ ।।
तद् युद्धमभवद् घोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् ।
सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत् पाकशासनिः ।। ३९ ।।
वह युद्ध अत्यन्त भयानक और देखनेमें बड़ा ही अद्भुत था। शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन न कर सके ।। ३९ ।।
ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान् समरेऽद्रवत् ।
छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ।। ४० ।।
उस युद्धमें किरीटधारी पार्थने बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर पांचालोंको आच्छादित और मोहित-सा करते हुए उनपर सहसा आक्रमण किया ।। ४० ।।
शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।
नान्तरं ददृशे किंचित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ।। ४१ ।।
यशस्वी अर्जुन बड़ी फुर्तीसे बाण छोड़ते और निरन्तर नये-नये बाणोंका संधान करते थे। उनके धनुषपर बाण रखने और छोड़नेमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं दिखायी पड़ता था ।। ४१ ।।
(न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी ।
अदृश्यत महाराज तत्र किंचन संयुगे ।।
बाणान्धकारे बलिना कृते गाण्डीवधन्वना ।)
महाराज! उस युद्धमें न तो दिशाओंका पता चलता था न आकाशका और न पृथ्वी अथवा और कुछ भी ही दिखायी देता था। बलवान् वीर गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा घोर अन्धकार फैला दिया था।
सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रितः ।
ततः पाञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह ।। ४२ ।।
त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा ।
महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत् ।। ४३ ।।
उस समय पाण्डव-दलमें साधुवादके साथ-साथ सिंहनाद हो रहा था। उधर पंचालराज द्रुपदने अपने भाई सत्यजित्को साथ लेकर तीव्र गतिसे अर्जुनपर धावा किया, ठीक उसी तरह जैसे शम्बरासुरने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था। परंतु कुन्तीनन्दन अर्जुनने बाणोंकी भारी बौछार करके पंचालनरेशको ढक दिया ।। ४२-४३ ।।
ततो हलहलाशब्द आसीत् पाञ्चालके बले ।
जिघृक्षति महासिंहो गजानामिव यूथपम् ।। ४४ ।।
और जैसे महासिंह हाथियोंके यूथपतिको पकड़नेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार अर्जुन द्रुपदको पकड़ना ही चाहते थे कि पांचालोंकी सेनामें हाहाकार मच गया ।। ४४ ।।
दृष्ट्वा पार्थं तदाऽऽयान्तं सत्यजित् सत्यविक्रमः ।
पाञ्चालं वै परित्रेप्सुर्धनंजयमुपाद्रवत् ।। ४५ ।।
ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतौ ।
व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ।। ४६ ।।
सत्यपराक्रमी सत्यजित्ने देखा कि कुन्तीपुत्र धनंजय पंचालनरेशको पकड़नेके लिये निकट बढ़े आ रहे हैं, तो वे उनकी रक्षाके लिये अर्जुनपर चढ़ आये; फिर तो इन्द्र और बलिकी भाँति अर्जुन और पांचाल सत्यजित्ने युद्धके लिये आमने-सामने आकर सारी सेनाओंको क्षोभमें डाल दिया ।। ४५-४६ ।।
ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः ।
विव्याध बलवद् गाढं तदद्भुतमिवाभवत् ।। ४७ ।।
तब अर्जुनने दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा सत्यजित्पर बलपूर्वक गहरा आघात करके उन्हें घायल कर दिया। यह अद्भुत-सी बात हुई ।। ४७ ।।
ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत् ।
पार्थस्तु शरवर्षेण छाद्यमानो महारथः ॥ ४८ ॥
वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च ।
ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा राजानमभ्ययात् ॥ ४९ ॥
फिर पांचाल वीर सत्यजित्ने भी शीघ्र ही सौ बाण मारकर अर्जुनको पीड़ित कर दिया। उनके बाणोंकी वर्षासे आच्छादित होकर महान् वेगशाली महारथी अर्जुनने धनुषकी प्रत्यंचाको झाड़-पोंछकर बड़े वेगसे बाण छोड़ना आरम्भ किया और सत्यजित्के धनुषको काटकर वे राजा द्रुपदपर चढ़ आये ॥ ४८-४९ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् ।
साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥ ५० ॥
तब सत्यजित्ने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तुरंत ही घोड़े, सारथि एवं रथसहित अर्जुनको बींध डाला ॥ ५० ॥
स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि ।
ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ ५१ ॥
युद्धमें पांचाल वीर सत्यजित्से पीड़ित हो अर्जुन उनके पराक्रमको न सह सके और उनके विनाशके लिये उन्होंने शीघ्र ही बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ५१ ॥
हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ।
स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५२ ॥
हयेषु विनियुक्तेषु विमुखोऽभवदाहवे ।
स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥ ५३ ॥
वेगेन महता राजन्नभ्यवर्षत पाण्डवम् ।
तदा चक्रे महद् युद्धमर्जुनो जयतां वरः ॥ ५४ ॥
सत्यजित्के घोड़े, ध्वजा, धनुष, मुट्ठी तथा पार्श्वरक्षक एवं सारथि दोनोंको अर्जुनने क्षत-विक्षत कर दिया। इस प्रकार बार-बार धनुषके छिन्न-भिन्न होने और घोड़ोंके मारे जानेपर सत्यजित् समर-भूमिसे भाग गये। राजन्! उन्हें इस तरह युद्धसे विमुख हुआ देख पांचालनरेश द्रुपदने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर बड़े वेगसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की। तब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उनसे बड़ा भारी युद्ध प्रारम्भ किया ॥ ५२—५४ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत् ।
पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५५ ॥
उन्होंने पंचालराजका धनुष काटकर उनकी ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया। फिर पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको घायल कर दिया ॥ ५५ ॥
तत उत्सृज्य तच्चापमाददानं शरावरम् ।
खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् उस कटे हुए धनुषको त्यागकर जब वे दूसरा धनुष और तूणीर लेने लगे, उस समय अर्जुनने म्यानसे तलवार निकालकर सिंहके समान गर्जना की ॥ ५६ ॥
पाञ्चालस्य रथस्येषामान्लुत्य सहसापतत् ।
पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनंजयः ॥ ५७ ॥
विक्षोभ्याम्भोनिधिं पार्थस्तं नागमिव सोऽग्रहीत् ।
ततस्तु सर्वपाञ्चाला विद्रवन्ति दिशो दश ॥ ५८ ॥
और सहसा पांचालनरेशके रथके डंडेपर कूद पड़े। इस प्रकार द्रुपदके रथपर चढ़कर निर्भीक अर्जुनने जैसे गरुड़ समुद्रको क्षुब्ध करके सर्पको पकड़ लेता है, उसी प्रकार उन्हें अपने काबूमें कर लिया। तब समस्त पांचाल सैनिक (भयभीत हो) दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ५७-५८ ॥
दर्शयन् सर्वसैन्यानां स बाह्वोर्बलमात्मनः ।
सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनंजयः ॥ ५९ ॥
समस्त सैनिकोंको अपना बाहुबल दिखाते हुए अर्जुन सिंहनाद करके वहाँसे लौटे ॥ ५९ ॥
आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा ।
ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः ॥ ६० ॥
अर्जुनको आते देख सब राजकुमार एकत्र हो महात्मा द्रुपदके नगरका विध्वंस करने लगे ॥ ६० ॥
अर्जुन उवाच
सम्बन्धी कुरुवीराणां द्रुपदो राजसत्तमः ।
मा वधीस्तद्बलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम् ॥ ६१ ॥
**तब अर्जुनने कहा—**भैया भीमसेन! राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपद कौरववीरोंके सम्बन्धी हैं, अतः इनकी सेनाका संहार न करो; केवल गुरुदक्षिणाके रूपमें द्रोणके प्रति महाराज द्रुपदको ही दे दो ॥ ६१ ॥
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः ।
अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महाबलः ॥ ६२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अर्जुनके मना करनेपर महाबली भीमसेन युद्धधर्मसे तृप्त न होनेपर भी उससे निवृत्त हो गये ॥ ६२ ॥
ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि ।
उपाजहुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ ॥ ६३ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उन पाण्डवने यज्ञसेन द्रुपदको मन्त्रियोंसहित संग्रामभूमिमें बंदी बनाकर द्रोणाचार्यको उपहारके रूपमें दे दिया ।। ६३ ।।
भग्नदर्प हृतधनं तं तथा वशमागतम् ।
स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ।। ६४ ।।
उनका अभिमान चूर्ण हो गया था, धन छीन लिया गया था और वे पूर्णरूपसे वशमें आ चुके थे; उस समय द्रोणाचार्यने मन-ही-मन पिछले वैरका स्मरण करके राजा द्रुपदसे कहा — ।। ६४ ।।
विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया ।
प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ।। ६५ ।।
‘राजन्! मैंने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्रको रौंद डाला। तुम्हारी राजधानी मिट्टीमें मिला दी। अब तुम शत्रुके वशमें पड़े हुए जीवनको लेकर यहाँ आये हो। बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या?’ ।। ६५ ।।
एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित् स पुनरब्रवीत् ।
मा भैः प्राणभयाद् वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ।। ६६ ।।
यों कहकर द्रोणाचार्य कुछ हँसे। उसके बाद फिर उनसे इस प्रकार बोले—‘वीर! प्राणोंपर संकट आया जानकर भयभीत न होओ। हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं ।। ६६ ।।
आश्रमे क्रीडितं यत् तु त्वया बाल्ये मया सह ।
तेन संवर्द्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ।। ६७ ।।
‘क्षत्रियशिरोमणे! तुम बचपनमें मेरे साथ आश्रममें जो खेले-कूदे हो, उससे तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह एवं प्रेम बहुत बढ़ गया है ।। ६७ ।।
प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप ।
वरं ददामि ते राजन् राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ।। ६८ ।।
‘नरेश्वर! मैं पुनः तुमसे मैत्रीके लिये प्रार्थना करता हूँ। राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम इस राज्यका आधा भाग मुझसे ले लो ।। ६८ ।।
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हसि ।
अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव ।। ६९ ।।
‘यज्ञसेन! तुमने कहा था—जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; इसीलिये मैंने तुम्हारा राज्य लेनेका प्रयत्न किया है ।। ६९ ।।
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ।
सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ।। ७० ।।
‘गंगाके दक्षिण प्रदेशके तुम राजा हो और उत्तरके भूभागका राजा मैं हूँ। पांचाल! अब यदि उचित समझो तो मुझे अपना मित्र मानो’ ।। ७० ।।
द्रुपद उवाच
अनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन् विक्रान्तेषु महात्मसु ।
प्रीये त्वयाहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छामि शाश्वतीम् ॥ ७१ ॥
द्रुपदने कहा— ब्रह्मन्! आप-जैसे पराक्रमी महात्माओंमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूँ और आपके साथ सदा बनी रहनेवाली मैत्री एवं प्रेम चाहता हूँ ॥ ७१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स तं द्रोणो मोक्षयामास भारत ।
सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादयत् ॥ ७२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! द्रुपदके यों कहनेपर द्रोणाचार्यने उन्हें छोड़ दिया और प्रसन्नचित्त हो उनका आदर-सत्कार करके उन्हें आधा राज्य दे दिया ॥ ७२ ॥
माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरे जनपदायताम् ।
सोऽध्यावसद् दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम् ॥ ७३ ॥
दक्षिणांश्चापि पञ्चालान् यावच्चर्मण्वती नदी ।
द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः ॥ ७४ ॥
तदनन्तर राजा द्रुपद दीनतापूर्ण हृदयसे गङ्गा-तटवर्ती अनेक जनपदोंसे युक्त माकन्दीपुरीमें तथा नगरोंमें श्रेष्ठ काम्पिल्य नगरमें निवास एवं चर्मण्वती नदीके दक्षिणतटवर्ती पंचालदेशका शासन करने लगे। इस प्रकार द्रोणाचार्यने द्रुपदको परास्त करके पुनः उनकी रक्षा की ॥ ७३-७४ ॥
क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत् स पराजयम् ।
हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेण स बलेन तु ॥ ७५ ॥
पुत्रजन्म परीप्सन् वै पृथिवीमन्वसंचरत् ।
अहिच्छत्रं च विषयं द्रोणः समभिपद्यत ॥ ७६ ॥
द्रुपदको अपने क्षात्रबलके द्वारा द्रोणाचार्यकी पराजय होती नहीं दिखायी दी। वे अपनेको ब्राह्मण-बलसे हीन जानकर (द्रोणाचार्यको पराजित करनेके लिये) शक्तिशाली पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथ्वीपर विचरने लगे। इधर द्रोणाचार्यने (उत्तर-पांचालवर्ती) अहिच्छत्र नामक राज्यको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ७५-७६ ॥
एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदायूता ।
युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता ॥ ७७ ॥
राजन्! इस प्रकार अनेक जनपदोंसे सम्पन्न अहिच्छत्रा नामवाली नगरीको युद्धमें जीतकर अर्जुनने द्रोणाचार्यको गुरु-दक्षिणामें दे दिया ॥ ७७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रुपदशासने
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रुपदपर द्रोणके शासनका वर्णन
करनेवाला एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३७ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ८४ १/३ श्लोक हैं)