महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा।। १३।।
पुंनाम्नो नरकात् पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः।
तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम।। १४।।
श्रुतिका कथन है कि पुत्र 'पुत्' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है। अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये।। १४।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्।
क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत्।। १५।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा-विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी।। १५।।
स चिन्तयन्नभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान्।
शार्ङ्गिकां शार्ङ्गिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्।। १६।।
यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ङ्गिक होकर जरिता नामवाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया।। १६।।
तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः।
तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति।। १७।।
बालान् स तानण्डगतान् सह मात्रा मुनिर्वने।
जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया। अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये।। १७ १/२ ।।
तस्मिन् गते महाभागे लपितां प्रति भारत।। १८।।
अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत्।
भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई।। १८ १/२ ।।
तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान् वने।। १९।।
न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्।
बभार चैतान् संजातान् स्ववृत्त्या स्नेहविप्लवा।। २०।।
अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्वल होकर अपनी वृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही।। १९-२०।।
ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः।