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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1608)

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द्वितीयोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी द्वारकायात्रा

वैशम्पायन उवाच

उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः ।
पार्थैः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! परम पूजनीय भगवान् श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे ॥ १ ॥

गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः ।
धर्मराजमथामन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः ॥ २ ॥
तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ २ ॥

ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः ।
स तया मूर्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ॥ ३ ॥
जगद्वन्द्य केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया ॥ ३ ॥

ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशाः ।
तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या बाष्पसमन्वितः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले। उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ४ ॥

अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम् ।
उवाच भगवान् भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ॥ ५ ॥
भगवान्‌ने मङ्गलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी (और उसे ढाढ़स बँधाया) ॥ ५ ॥

तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः ।
सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः ॥ ६ ॥
सुभद्राने बार-बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता-पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये ॥ ६ ॥

तामनुज्ञाय वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम् ।
ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः ॥ ७ ॥

भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले ।। ७ ।।
ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तमः ।
द्रौपदीं सान्त्वयित्वा च आमन्त्र्य च जनार्दनः ॥ ८ ॥
भ्रातृनभ्यगमद् विद्वान् पार्थेन सहितो बली ।
भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवामरैः ॥ ९ ॥
पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ८-९ ॥
यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः ।
कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान् समलंकृतः ॥ १० ॥
तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया ॥ १० ॥
अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः ।
माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ११ ॥
फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प-माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की ॥ ११ ॥
स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वरः ।
उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्यकक्षाद् विनिर्गतः ॥ १२ ॥
प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले ॥ १२ ॥
स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् दधिपात्रफलाक्षतैः ।
वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १३ ॥
उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवान्‌ने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ उन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥
काञ्चनं रथमास्थाय तार्क्ष्यकेतनमाशुगम् ।
गदाचक्रासिशाङ्गैर्द्यायुधैरावृतं शुभम् ॥ १४ ॥
तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते ।
प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥ १५ ॥
इसके बाद गरुडचिह्नित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शार्ङ्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो

कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की॥ १४-१५॥

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः।
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम्॥ १६॥
उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्‌के साथ रथपर जा बैठे॥ १६॥

अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा।
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम्॥ १७॥
रुक्मदण्डं बृहद्बाहुर्विधुधाव प्रदक्षिणम्।
कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे॥ १७ १/२॥

तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो बली॥ १८॥
पृष्ठतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैः सह।
(छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्।
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्॥
दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गिधन्वने।

उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।।
नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ।)
स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा ।। १९ ।।
अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियैः ।
इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्य-मणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों ।। १८-१९½ ।।

पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ।। २० ।।
युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा ।
परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः ।। २१ ।।
श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्‌को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवान्‌ने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया) ।। २०-२१ ।।

योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरंजयः ।
युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत ।। २२ ।।
भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि ‘अब आप लौट जाइये’ ।। २२ ।।

ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित् ।
उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्त्युपाघ्राय केशवम् ।। २३ ।।
पाण्डवो यादवश्रेष्ठं कृष्णं कमलोचनम् ।
गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २४ ।।
तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और ‘जाओ’ कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी ।। २३-२४ ।।

ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।
निवर्त्य च तथा कृच्छ्रात् पाण्डवान् सपदानुगान् ।। २५ ।।
स्वां पुरीं प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम् ।

लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे ॥ २५-२६ ॥
मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् ।
अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७ ॥
क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः ।
अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥
अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया ॥ २७-२८ ॥
निवृत्योपययुस्तूर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः ।
स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥
अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे ॥ २९ ॥
सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा ।
दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः ।
स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मवानिव वेगवान् ॥ ३० ॥
सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः ।
सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ३१ ॥
विसृज्य सुहृदः सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् ।
मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥

राजन्! वहाँ पुरुषसिंह धर्मराजने समस्त सुहृदों, भाइयों और पुत्रोंको विदा करके राजमहलमें द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ३२ ॥

केशवोऽपि मुदा युक्तः प्रविवेश पुरोत्तमम् ।
पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा ॥ ३३ ॥
इधर भगवान् केशव भी उग्रसेन आदि श्रेष्ठ यादवोंसे सम्मानित हो प्रसन्नतापूर्वक द्वारकापुरीके भीतर गये ॥ ३३ ॥

आहुकं पितरं वृद्धं मातरं च यशस्विनीम् ।
अभिवाद्य बलं चैव स्थितः कमललोचनः ॥ ३४ ॥
कमलनयन श्रीकृष्णने राजा उग्रसेन, बूढ़े पिता वसुदेव और यशस्विनी माता देवकीको प्रणाम करके बलरामजीके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ ३४ ॥

प्रद्युम्नसाम्बनिशठांश्चारुदेष्णं गदं तथा ।
अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दनः ॥ ३५ ॥
स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवनं ययौ ।
तत्पश्चात् जनार्दनने प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, चारुदेष्ण, गद, अनिरुद्ध तथा भानु आदिको स्नेहपूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा लेकर रुक्मिणीजीके महलमें प्रवेश किया ॥ ३५ १/२ ॥

मयोऽपि स महाभागः सर्वरत्नविभूषिताम् ।
विधिवत् कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै ॥ ३६ ॥
इधर महाभाग मयने भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सभामण्डप बनानेकी मन-ही-मन कल्पना की ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि भगवद्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकायात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥