महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सभापर्व
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
सभापर्व
सभाक्रियापर्व
प्रथमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा-नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ ।
प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! खाण्डवदाहके अनन्तर मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णके पास बैठे हुए अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा करके हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें उनसे कहा ॥ २ ॥
मय उवाच
अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षतः ।
त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३ ॥
**मयासुर बोला—**कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है। अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले) आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३ ॥
अर्जुन उवाच
कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर ।
प्रीतिमान् भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ४ ॥
**अर्जुनने कहा—**असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। मुझपर प्रेम बनाये रखना। हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे ॥ ४ ॥
मय उवाच
युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ ।
प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत ॥ ५ ॥
मयासुर बोला—प्रभो! पुरुषोत्तम! आपने जो बात कही है, वह आप-जैसे महापुरुषके अनुरूप ही है; परंतु भारत! मैं बड़े प्रेमसे आपके लिये कुछ करना चाहता हूँ ।। ५ ।।
अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः ।
सोऽहं वै त्वत्कृते कर्तुं किंचिदिच्छामि पाण्डव ।। ६ ।।
पाण्डुनन्दन! मैं दानवोंका विश्वकर्मा एवं शिल्प-विद्याका महान् पण्डित हूँ। अतः मैं आपके लिये किसी वस्तुका निर्माण करना चाहता हूँ ।। ६ ।।
(दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृताः ।
रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रशः ।।
उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च ।
विचित्राणि च शस्त्राणि रथाः कामगमास्तथा ।।
नगराणि विशालानि साट्टप्राकारतोरणैः ।
वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रशः ।।
बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् ।
एतत् कृतं मया सर्वं तस्मादिच्छामि फाल्गुन ।।)
कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें मैंने दानवोंके बहुत-से महल बनाये हैं। इसके सिवा देखनेमें रमणीय, सुख और भोगसाधनोंसे सम्पन्न अनेक प्रकारके रमणीय उद्यानों, भाँति-भाँतिके सरोवरों, विचित्र अस्त्र-शस्त्रों, इच्छानुसार चलनेवाले रथों, अट्टालिकाओं, चहारदीवारियों और बड़े-बड़े फाटकोंसहित विशाल नगरों, हजारों अद्भुत एवं श्रेष्ठ वाहनों तथा बहुत-सी मनोहर एवं अत्यन्त सुखदायक सुरंगोंका मैंने निर्माण किया है। अतः अर्जुन! मैं आपके लिये भी कुछ बनाना चाहता हूँ।
अर्जुन उवाच
प्राणकृच्छ्राद् विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मया ।
एवं गते न शक्ष्यामि किंचित् कारयितुं त्वया ।। ७ ।।
अर्जुन बोले—मयासुर! तुम मेरे द्वारा अपनेको प्राणसंकटसे मुक्त हुआ मानते हो और इसीलिये कुछ करना चाहते हो। ऐसी दशामें मैं तुमसे कोई काम नहीं करा सकूँगा ।। ७ ।।
न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव ।
कृष्णस्य क्रियतां किंचित् तथा प्रतिकृतं मयि ।। ८ ।।
दानव! साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारा यह संकल्प व्यर्थ हो। इसलिये तुम भगवान् श्रीकृष्णका कोई कार्य कर दो, इससे मेरे प्रति तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हो जायगा ।। ८ ।।
चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ ।
मुहूर्तमिव संदध्यौ किमयं चोद्यतामिति ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! तब मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णसे काम बतानेका अनुरोध किया। उसके प्रेरणा करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अनुमानतः दो घड़ीतक विचार किया कि 'इसे कौन-सा काम बताया जाय?' ।। ९ ।।
ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः ।
चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ।। १० ।।
यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर ।
धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे ।। ११ ।।
तदनन्तर मन-ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा—‘शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्यराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो ।। १०-११ ।।
यां कृतां नानुकुर्वन्ति मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः ।
मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम् ।। १२ ।।
‘वह सभाभवन ऐसा बनाओ, जिसके बन जानेपर सम्पूर्ण मनुष्यलोकके मानव देखकर विस्मित हो जायँ एवं कोई उसकी नकल न कर सके ।। १२ ।।
यत्र दिव्यानभिप्रायान् पश्येम हि कृतांस्त्वया ।
आसुरान् मानुषांश्चैव सभां तां कुरु वै मय ।। १३ ।।
‘मयासुर! तुम ऐसे सभाभवनका निर्माण करो, जिसमें हम तुम्हारे द्वारा अंकित देवता, असुर और मनुष्योंकी शिल्पनिपुणताका दर्शन कर सकें’ ।। १३ ।।
वैशम्पायन उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा ।
विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके मयासुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके लिये विमान-जैसी सुन्दर सभाभवन बनानेका निश्चय किया ।। १४ ।।
ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
सर्वमेतत् समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ।। १५ ।।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको ये सब बातें बताकर मयासुरको उनसे मिलाया ।। १५ ।।
तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत् तदा ।
स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ।। १६ ।।
भारत! राजा युधिष्ठिरने उस समय मयासुरका यथायोग्य सत्कार किया और मयासुरने भी बड़े आदरके साथ उनका वह सत्कार ग्रहण किया ॥ १६ ॥
स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते ।
कथयामास दैतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत ॥ १७ ॥
जनमेजय! दैत्यराज मयने उस समय वहाँ पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाये ॥ १७ ॥
स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु ।
सभां प्रचक्रे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥
कुछ दिनोंतक वहाँ आरामसे रहकर दैत्योंके विश्वकर्मा मयासुरने सोच-विचारकर महात्मा पाण्डवोंके लिये सभाभवन बनानेकी तैयारी की ॥ १८ ॥
अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः ।
पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकौतुकमङ्गलः ॥ १९ ॥
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान् पायसेन सहस्रशः ।
धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ॥ २० ॥
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् ।
दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वतः ॥ २१ ॥
उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी ॥ १९—२१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)