महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 400)
आस्तीकने तक्षकको अग्निकुण्डमें गिरनेसे रोक दिया
तक्षकस्य कुले जातान् प्रवक्ष्यामि निबोध तान्।
पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डसेक्ता रभेणकः॥ ८॥
उच्छिखः शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहणः।
शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्रवेपनः॥ ९॥
मुद्गरः शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनुः।
एते तक्षकजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम्॥ १०॥
अब तक्षकके कुलमें उत्पन्न नागोंका वर्णन करूँगा, उनके नाम सुनो—पुच्छाण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक, उच्छिख, शरभ, भंग, बिल्वतेजा, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेपन, मुद्गर, शिशुरोमा, सुरोमा और महाहनु—ये तक्षकके वंशज नाग थे, जो सर्पसत्रकी आगमें समा गये॥ ८—१०॥
पारावतः पारिजातः पाण्डरो हरिणः कृशः।
विहङ्गः शरभो मेदः प्रमोदः संहतापनः॥ ११॥
ऐरावतकुलादेते प्रविष्टा हव्यवाहनम्।
पारावत, पारिजात, पाण्डर, हरिण, कृश, विहंग, शरभ, मेद, प्रमोद और संहतापन—ये ऐरावतके कुलसे आकर आगमें आहुति बन गये थे॥ ११ १/२॥
कौरव्यकुलजान् नागाञ्छृणु मे त्वं द्विजोत्तम॥ १२॥
द्विजश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे कौरव्यके कुलमें उत्पन्न हुए नागोंके नाम सुनो॥ १२॥
एरकः कुण्डलो वेणी वेणीस्कन्धः कुमारकः।
बाहुकः शृंगवेरश्च धूर्तकः प्रातरातकौ॥ १३॥
कौरव्यकुलजास्त्वेते प्रविष्टा हव्यवाहनम्।
एरक, कुण्डल, वेणी, वेणीस्कन्ध, कुमारक, बाहुक, शृंगवेर, धूर्तक, प्रातर और आतक—ये कौरव्य-कुलके नाग यज्ञाग्निमें जल मरे थे॥ १३ १/२॥
धृतराष्ट्रकुले जाताञ्छृणु नागान् यथातथम्॥ १४॥
कीर्त्यमानान् मया ब्रह्मन् वातवेगान् विषोल्बणान्।
शङ्कुकर्णः पिठरकः कुठारमुखसेचकौ॥ १५॥
पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहासः शकुनिर्दरिः।
अमाहठः कामठकः सुषेणो मानसोऽव्ययः॥ १६॥
भैरवो मुण्डवेदाङ्गः पिशङ्गश्चोद्रपारकः।
ऋषभो वेगवान् नागः पिण्डारकमहाहनू॥ १७॥
रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धपटवासकौ।
वराहको वीरणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः॥ १८॥
पराशरस्तरुणको मणिः स्कन्धस्तथारुणिः।
इति नागा मया ब्रह्मन् कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः॥ १९॥
प्राधान्येन बहुत्वात् तु न सर्वे परिकीर्तिताः ।
एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ॥ २० ॥
न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः ।
त्रिशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च दशशीर्षास्तथापरे ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! अब धृतराष्ट्रके कुलमें उत्पन्न नागोंके नामोंका मुझसे यथावत् वर्णन सुनो। वे
वायुके समान वेगशाली और अत्यन्त विषैले थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) शंकुकर्ण,
पिठरक, कुठार, मुखसेचक, पूर्णांगद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि, अमाहठ, कामठक,
सुषेण, मानस, अव्यय, भैरव, मुण्डवेदांग, पिशंग, उद्रपारक, ऋषभ, वेगवान् नाग,
पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारंग, समृद्ध, पटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र,
चित्रवेगिक, पराशर, तरुणक, मणि, स्कन्ध और आरुणि—(ये सभी धृतराष्ट्रवंशी नाग
सर्पसत्रकी आगमें जलकर भस्म हो गये थे।) ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने अपने कुलकी कीर्ति
बढ़ानेवाले मुख्य-मुख्य नागोंका वर्णन किया है। उनकी संख्या बहुत है, इसलिये सबका
नामोल्लेख नहीं किया गया है। इन सबकी संतानोंकी और संतानोंकी संततिकी, जो
प्रज्वलित अग्निमें जल मरी थीं, गणना नहीं की जा सकती। किसीके तीन सिर थे तो
किसीके सात तथा कितने ही दस-दस सिरवाले नाग थे ॥ १४—२१ ॥
कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः ।
महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्रयाः ॥ २२ ॥
उनके विष प्रलयाग्निके समान दाहक थे। वे नाग बड़े ही भयंकर थे। उनके शरीर
विशाल और वेग महान् थे। वे ऊँचे तो ऐसे थे, मानो पर्वतके शिखर हों। ऐसे नाग लाखोंकी
संख्यामें यज्ञाग्निकी आहुति बन गये ॥ २२ ॥
योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः ।
कामरूपाः कामबला दीप्तानलविषोल्बणाः ॥ २३ ॥
दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपीडिताः ॥ २४ ॥
उनकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक, दो-दो योजनतककी थी। वे इच्छानुसार रूप धारण
करनेवाले तथा इच्छानुरूप बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे सब-के-सब धधकती हुई आगके
समान भयंकर विषसे भरे थे। माताके शापरूपी ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण वे उस
महासत्रमें जलकर भस्म हो गये ॥ २३-२४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक
सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥