महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१६८-
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यासजीका पाण्डवोंको द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच
वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु ।
आजगामाथ तान् द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा पाण्डव जब गुप्तरूपसे वहाँ निवास कर रहे थे, उसी समय सत्यवतीनन्दन व्यासजी उनसे मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ १ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परंतपाः ।
प्रणिपत्याभिवाद्यैनं तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ २ ॥
समनुज्ञाप्य तान् सर्वानसीनान् मुनिरब्रवीत् ।
प्रच्छन्नं पूजितः पार्थैः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥ ३ ॥
उन्हें आया देख शत्रुसंतापन पाण्डवोंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और प्रणामपूर्वक उनका अभिवादन करके वे सब उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। कुन्तीपुत्रोंद्वारा गुप्तरूपसे पूजित हो मुनिवर व्यासने उन सबको आज्ञा देकर बिठाया और जब वे बैठ गये, तब उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार पूछा— ॥ २-३ ॥
अपि धर्मेण वर्तेध्वं शास्त्रेण च परंतपाः ।
अपि विप्रेषु पूजा वः पूजार्हेषु न हीयते ॥ ४ ॥
‘शत्रुओंको संतप्त करनेवाले वीरो! तुमलोग शास्त्रकी आज्ञा और धर्मके अनुसार चलते हो न? पूजनीय ब्राह्मणोंकी पूजा करनेमें तो तुम्हारी ओरसे कभी भूल नहीं होती?’ ॥ ४ ॥
अथ धर्मार्थवद् वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः ।
विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर महर्षि भगवान् व्यासने उनसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कहीं। फिर विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाकर वे पुनः उनसे इस प्रकार बोले ॥ ५ ॥
व्यास उवाच
आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः ।
विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता ॥ ६ ॥
व्यासजीने कहा— पहलेकी बात है, तपोवनमें किसी महात्मा ऋषिकी कोई कन्या रहती थी, जिसकी कटि कृश तथा नितम्ब और भौंहें सुन्दर थीं। वह कन्या समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थी ॥ ६ ॥
कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत ।
नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ७ ॥
परंतु अपने ही किये हुए कर्मोंके कारण वह कन्या दुर्भाग्यके वश हो गयी, इसलिये वह रूपवती और सदाचारिणी होनेपर भी कोई पति न पा सकी ॥ ७ ॥
ततस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः ।
तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम् ॥ ८ ॥
तब पतिके लिये दुःखी होकर उसने तपस्या प्रारम्भ की और कहते हैं उग्र तपस्याके द्वारा उसने भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लिया ॥ ८ ॥
तस्याः स भगवांस्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम् ।
वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शङ्करः ॥ ९ ॥
उसपर संतुष्ट हो भगवान् शंकरने उस यशस्विनी कन्यासे कहा—'शुभे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ' ॥ ९ ॥
अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् ।
पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ॥ १० ॥
तब उसने भगवान् शंकरसे अपने लिये हितकर वचन कहा—'प्रभो! मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ।' इस वाक्यको उसने बार-बार दुहराया ॥ १० ॥
तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः ।
पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति भारताः ॥ ११ ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् शिवने उससे कहा—'भद्रे! तुम्हारे पाँच भरतवंशी पति होंगे' ॥ ११ ॥
एवमुक्ता ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत् ।
एकमिच्छाम्यहं देव त्वत्प्रसादात् पतिं प्रभो ॥ १२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर वह कन्या उन वरदायक देवता भगवान् शिवसे इस प्रकार बोली—'देव! प्रभो! मैं आपकी कृपासे एक ही पति चाहती हूँ' ॥ १२ ॥
पुनरेवाब्रवीद् देव इदं वचनमुत्तमम् ।
पञ्चकृत्वस्त्वया ह्युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः ॥ १३ ॥
तब भगवान्ने पुनः उससे यह उत्तम बात कही—'भद्रे! तुमने मुझसे पाँच बार कहा है कि मुझे पति दीजिये ॥ १३ ॥
देहमन्यं गतायास्ते यथोक्तं तद् भविष्यति ।
द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी ॥ १४ ॥
'अतः दूसरा शरीर धारण करनेपर तुम्हें जैसा मैंने कहा है, वह वरदान प्राप्त होगा।' वही देवरूपिणी कन्या राजा द्रुपदके कुलमें उत्पन्न हुई है ॥ १४ ॥
निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ।
पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसध्वं महाबलाः ।
सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः ॥ १५ ॥
वह महाराज पृषतकी पौत्री सती-साध्वी कृष्णा तुमलोगोंकी पत्नी नियत की गयी है; अतः महाबली वीरो! अब तुम पांचालनगरमें जाकर रहो। द्रौपदीको पाकर तुम सब लोग सुखी होओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १५ ।।
एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान् स पितामहः ।
पार्थानमन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ।। १६ ।।
महान् सौभाग्यशाली और महातपस्वी पितामह व्यासजी पाण्डवोंसे ऐसा कहकर उन सबसे और कुन्तीसे विदा ले वहाँसे चल दिये ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीजन्मान्तरकथने
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीजन्मान्तरकथनविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६८ ।।