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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1553, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1553

तदनन्तर, पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसका निर्माण किया था, उस दिव्य एवं श्रेष्ठ गाण्डीव धनुषको हाथमें लेकर अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए। पराक्रमी धनंजयने अग्निदेवको सामने रखकर उस धनुषको हाथमें उठाया और बल लगाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। महाबली पाण्डुकुमारके उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाते समय जिन लोगोंने उसकी टंकार सुनी, उनका हृदय व्यथित हो उठा ॥ १९—२१ १/२ ॥
लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ २२ ॥
बभूव कल्पः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि ।
वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः ॥ २३ ॥
वह रथ, धनुष तथा अक्षय तरकस पाकर कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निकी सहायता करनेमें समर्थ हो गये। तदनन्तर पावकने भगवान् श्रीकृष्णको एक चक्र दिया, जिसका मध्यभाग वज्रके समान था ॥ २२-२३ ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं स च कल्योऽभवत् तदा ।
अब्रवीत् पावकश्चैवमेतेन मधुसूदन ॥ २४ ॥
अमानुषानपि रणे जेष्यसि त्वमसंशयम् ।
अनेन तु मनुष्याणां देवानार्माप चाहवे ॥ २५ ॥
रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाधिकस्तथा ।
भविष्यसि न संदेहः प्रवरोऽपि निबर्हणे ॥ २६ ॥
उस अग्निप्रदत्त प्रिय अस्त्र चक्रको पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय सहायताके लिये समर्थ हो गये। उनसे अग्निदेवने कहा—'मधुसूदन! इस चक्रके द्वारा आप युद्धमें अमानव प्राणियोंको भी जीत लेंगे, इसमें संशय नहीं है। इसके होनेसे आप युद्धमें मनुष्यों, देवताओं, राक्षसों, पिशाचों, दैत्यों और नागोंसे भी अधिक शक्तिशाली होंगे तथा इन सबका संहार करनेमें भी निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होंगे ॥ २४—२६ ॥
क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत् त्वया माधव शत्रुपु ।
हत्वाप्रतिहतं संख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ॥ २७ ॥
'माधव! युद्धमें आप जब-जब इसे शत्रुओंपर चलायेंगे, तब-तब यह उन्हें मारकर और स्वयं किसी अस्त्रसे प्रतिहत न होकर पुनः आपके हाथमें आ जायगा' ॥ २७ ॥
वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् ।
दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं प्रभुः ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् भगवान् वरुणने भी बिजलीके समान कड़कड़ाहट पैदा करनेवाली कौमोदकी नामक गदा भगवान्‌को भेंट की, जो दैत्योंका विनाश करनेवाली और भयंकर थी ॥ २८ ॥
ततः पावकमब्रूतां प्रहृष्टावर्जुनाच्युतौ ।
कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ॥ २९ ॥