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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1009, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1009

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उन पाण्डवने यज्ञसेन द्रुपदको मन्त्रियोंसहित संग्रामभूमिमें बंदी बनाकर द्रोणाचार्यको उपहारके रूपमें दे दिया ।। ६३ ।।
भग्नदर्प हृतधनं तं तथा वशमागतम् ।
स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ।। ६४ ।।
उनका अभिमान चूर्ण हो गया था, धन छीन लिया गया था और वे पूर्णरूपसे वशमें आ चुके थे; उस समय द्रोणाचार्यने मन-ही-मन पिछले वैरका स्मरण करके राजा द्रुपदसे कहा — ।। ६४ ।।
विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया ।
प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ।। ६५ ।।
‘राजन्! मैंने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्रको रौंद डाला। तुम्हारी राजधानी मिट्टीमें मिला दी। अब तुम शत्रुके वशमें पड़े हुए जीवनको लेकर यहाँ आये हो। बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या?’ ।। ६५ ।।
एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित् स पुनरब्रवीत् ।
मा भैः प्राणभयाद् वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ।। ६६ ।।
यों कहकर द्रोणाचार्य कुछ हँसे। उसके बाद फिर उनसे इस प्रकार बोले—‘वीर! प्राणोंपर संकट आया जानकर भयभीत न होओ। हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं ।। ६६ ।।
आश्रमे क्रीडितं यत् तु त्वया बाल्ये मया सह ।
तेन संवर्द्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ।। ६७ ।।
‘क्षत्रियशिरोमणे! तुम बचपनमें मेरे साथ आश्रममें जो खेले-कूदे हो, उससे तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह एवं प्रेम बहुत बढ़ गया है ।। ६७ ।।
प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप ।
वरं ददामि ते राजन् राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ।। ६८ ।।
‘नरेश्वर! मैं पुनः तुमसे मैत्रीके लिये प्रार्थना करता हूँ। राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम इस राज्यका आधा भाग मुझसे ले लो ।। ६८ ।।
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हसि ।
अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव ।। ६९ ।।
‘यज्ञसेन! तुमने कहा था—जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; इसीलिये मैंने तुम्हारा राज्य लेनेका प्रयत्न किया है ।। ६९ ।।
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ।
सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ।। ७० ।।
‘गंगाके दक्षिण प्रदेशके तुम राजा हो और उत्तरके भूभागका राजा मैं हूँ। पांचाल! अब यदि उचित समझो तो मुझे अपना मित्र मानो’ ।। ७० ।।
द्रुपद उवाच