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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 346

स त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितॄणां हितकाम्यया ।
उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ॥ १३ ॥
वनमें जानेपर विद्वान् जरत्कारुने पितरोंके हितकी कामनासे तीन बार धीरे-धीरे यह बात कही—'मैं कन्या माँगता हूँ' ॥ १३ ॥
यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च ।
अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ॥ १४ ॥
(फिर जोरसे बोले—) 'यहाँ जो स्थावर-जंगम, दृश्य या अदृश्य प्राणी हैं, वे सब मेरी बात सुनें— ॥ १४ ॥
उग्रे तपसि वर्तन्ते पितरश्चोदयन्ति माम् ।
निविशस्वेति दुःखार्ताः संतानस्य चिकीर्षया ॥ १५ ॥
'मेरे पितर भयंकर कष्टमें पड़े हैं और दुःखसे आतुर हो संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखकर मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि 'तुम विवाह कर लो' ॥ १५ ॥
निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भोः ।
दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनियोजितः ॥ १६ ॥
'अतः विवाहके लिये मैं सारी पृथ्वीपर घूमकर कन्याकी भिक्षा चाहता हूँ। यद्यपि मैं दरिद्र हूँ और सुविधाओंके अभावमें दुःखी हूँ, तो भी पितरोंकी आज्ञासे विवाहके लिये उद्यत हूँ ॥ १६ ॥
यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः ।
ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतोदिशम् ॥ १७ ॥
'मैंने यहाँ जिनका नाम लेकर पुकारा है, उनमेंसे जिस किसी भी प्राणीके पास विवाहके योग्य विख्यात गुणोंवाली कन्या हो, वह सब दिशाओंमें विचरनेवाले मुझ ब्राह्मणको अपनी कन्या दे ॥ १७ ॥
मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् ।
भरेयं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रयच्छत ॥ १८ ॥
'जो कन्या मेरे ही जैसे नामवाली हो, भिक्षाकी भाँति मुझे दी जा सकती हो और जिसके भरण-पोषणका भार मुझपर न हो, ऐसी कन्या कोई मुझे दे' ॥ १८ ॥
ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारौ समाहिताः ।
तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ॥ १९ ॥
तब उन नागोंने जो जरत्कारु मुनिकी खोजमें लगाये गये थे, उनका यह समाचार पाकर उन्होंने नागराज वासुकिको सूचित किया ॥ १९ ॥
तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् ।
प्रगृह्यारण्यमगमत् समीपं तस्य पन्नगः ॥ २० ॥