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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

(वैवाहिकपर्व)

(वैवाहिकपर्व)

द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और युधिष्ठिरकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः
पित्रे शशंसार्थ स राजपुत्रः ।
धृष्टद्युम्नः सोमकानां प्रबर्हो
वृत्तं यथा येन हृता च कृष्णा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर सोमकशिरोमणि राजकुमार धृष्टद्युम्न अत्यन्त हर्षमें भरकर वहाँ जो वृत्तान्त हुआ था एवं जो कृष्णाको ले गया, वह कौन था, वह सब समाचार कहने लगे ॥ १ ॥

धृष्टद्युम्न उवाच

योऽसौ युवा व्यायतलोहिताक्षः
कृष्णाजिनी देवसमानरूपः ।
यः कार्मुकाग्र्यं कृतवानधिज्यं
लक्ष्यं च यः पातितवान् पृथिव्याम् ॥ २ ॥
असज्जमानश्च ततस्तरस्वी
वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः ।
चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु
सर्वैश्च देवै ऋषिभिश्च जुष्टः ॥ ३ ॥

धृष्टद्युम्न बोले— महाराज! जिन विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले, कृष्णमृगचर्मधारी तथा देवताके समान मनोहर रूपवाले तरुण वीरने श्रेष्ठ धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और लक्ष्यको वेधकर पृथ्वीपर गिराया था, वे किसीका भी साथ न करके अकेले ही बड़े वेगसे आगे बढ़े। उस समय बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरे हुए थे और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। सम्पूर्ण देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित देवराज इन्द्र जैसे दैत्योंकी सेनाके भीतर निःशंक

होकर विचरते हैं, उसी प्रकार वे नवयुवक वीर निर्भीक होकर राजाओंके बीचसे निकले ॥ २-३ ॥

कृष्णा प्रगृह्याजिनमन्वयात् तं
नागं यथा नागवधूः प्रहृष्टा ।
अमृष्यमाणेषु नराधिपेषु
क्रुद्धेषु वै तत्र समापतत्सु ॥ ४ ॥

ततोऽपरः पार्थिवसङ्घमध्ये
प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् ।
प्रकालयन्नेव स पार्थिवौघान्
क्रुद्धोऽन्तकः प्राणभृतो यथैव ॥ ५ ॥

उस समय राजकुमारी कृष्णा अत्यन्त प्रसन्न हो उनका मृगचर्म थामकर ठीक उसी तरह उनके पीछे-पीछे जा रही थी, जैसे गजराजके पीछे हथिनी जा रही हो। यह देख राजा लोग सहन न कर सके और क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके लिये उसपर चारों ओरसे टूट पड़े। तब एक दूसरा वीर बहुत बड़े वृक्षको उखाड़कर राजाओंकी उस मण्डलीमें कूद पड़ा और जैसे कोपमें भरे हुए यमराज समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार वह उन नरेशोंको मानो कालके गालमें भेजने लगा ॥ ४-५ ॥

तौ पार्थिवानां मिषतां नरेन्द्र
कृष्णामुपादाय गतौ नराग्र्यौ ।
विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यो
बाह्यां पुराद् भार्गवकर्मशालाम् ॥ ६ ॥

नरेन्द्र! चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ सब राजाओंके देखते-देखते द्रौपदीको साथ ले नगरसे बाहर कुम्हारके घरमें चले गये ॥ ६ ॥

तत्रोपविष्टार्चिरिवानलस्य
तेषां जनित्रीति मम प्रतर्कः ।
तथाविधैरेव नरप्रवीरै-
रुपोपविष्टैस्त्रिभिरग्निकल्पैः ॥ ७ ॥

उस घरमें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक स्त्री बैठी हुई थीं। मेरा अनुमान है कि वे उन वीरोंकी माता रही होंगी। उनके आस-पास अग्नितुल्य तेजस्वी वैसे ही तीन श्रेष्ठ नरवीर और बैठे हुए थे ॥ ७ ॥

तस्यास्ततस्तावभिवाद्य पादौ
उक्ता च कृष्णा त्वभिवादयेति ।
स्थितां च तत्रैव निवेद्य कृष्णां
भिक्षाप्रचाराय गता नराग्र्याः ॥ ८ ॥

इन दोनों वीरोंने माताके चरणोंमें प्रणाम करके द्रौपदीसे भी उन्हें प्रणाम करनेके लिये कहा। प्रणाम करके वहीं खड़ी हुई कृष्णाको उन्होंने माताको सौंप दिया और स्वयं वे नरश्रेष्ठ वीर भिक्षा लानेके लिये चले गये ॥ ८ ॥

तेषां तु भैक्षं प्रतिगृह्य कृष्णा
दत्त्वा बलिं ब्राह्मणसाच्च कृत्वा ।
तां चैव वृद्धां परिवेष्य तांश्च
नरप्रवीरान् स्वयमप्यभुङ्क्त ॥ ९ ॥
जब वे लौटे तब उनकी भिक्षामें मिले हुए अन्नको लेकर (उनकी माताके आज्ञानुसार) द्रौपदीने देवताओंको बलि समर्पित की, ब्राह्मणोंको दिया और उन वृद्धा स्त्री तथा उन प्रमुख नरवीरोंको अलग-अलग भोजन परोसकर अन्तमें स्वयं भी बचे हुए अन्नको खाया ॥ ९ ॥

सुप्तास्तु ते पार्थिव सर्व एव
कृष्णा च तेषां चरणोपधाने ।
आसीत् पृथिव्यां शयनं च तेषां
दर्भाजिनाग्रास्तरणोपपन्नम् ॥ १० ॥
राजन्! भोजनके बाद वे सब सो गये। कृष्णा उनके पैरोंके समीप सोयी। धरतीपर ही उनकी शय्या बिछी थी। नीचे कुशकी चटाइयाँ थीं और ऊपर मृगचर्म बिछा हुआ था ॥ १० ॥

ते नर्दमाना इव कालमेघाः
कथा विचित्राः कथयाम्बभूवुः ।
न वैश्यशूद्रौपयिकीः कथास्ता
न च द्विजानां कथयन्ति वीराः ॥ ११ ॥
सोते समय वे वर्षाकालके मेघके समान गम्भीर गर्जना करते हुए आपसमें बड़ी विचित्र बातें करने लगे। वे पाँचों वीर जो बातें कह रहे थे, वे वैश्यों, शूद्रों तथा ब्राह्मणों-जैसी नहीं थीं ॥ ११ ॥

निःसंशयं क्षत्रियपुङ्गवास्ते
यथा हि युद्धं कथयन्ति राजन् ।
आशा हि नो व्यक्तमियं समृद्धा
मुक्तान् हि पार्थाञ्छृणुमोऽग्निदाहात् ॥ १२ ॥
राजन्! जिस प्रकार वे युद्धका वर्णन करते थे, उससे यह मान लेनेमें तनिक भी संदेह नहीं रह जाता कि वे लोग क्षत्रियशिरोमणि हैं। हमने सुना है, कुन्तीके पुत्र लाक्षागृहकी आगमें जलनेसे बच गये हैं। अतः हमारे मनमें जो पाण्डवोंसे सम्बन्ध करनेकी अभिलाषा थी, अवश्य वही सफल हुई जान पड़ती है ॥ १२ ॥

यथा हि लक्ष्यं निहतं धनुश्च
सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य ।
यथा हि भाषन्ति परस्परं ते
छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ॥ १३ ॥
जिस प्रकार उन्होंने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी, जिस तरह दुर्भेद्य लक्ष्यको बेध गिराया और जिस प्रकार वे सभी भाई आपसमें बातें करते हैं, उससे यह निश्चय हो जाता है कि कुन्तीके पुत्र ही ब्राह्मणवेषमें छिपे हुए विचर रहे हैं ॥ १३ ॥

ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः
पुरोहितं प्रेषयामास तेषाम् ।
विद्याम युष्मानिति भाषमाणो
महात्मानः पाण्डुसुतास्तु कच्चित् ॥ १४ ॥
जनमेजय! इस समाचारसे राजा द्रुपदको बड़ी प्रसन्नता हुई, उन्होंने उसी समय उनके पास अपने पुरोहितको भेजते हुए कहा—'आप उन लोगोंसे कहियेगा कि मैं आपलोगोंका परिचय जानना चाहता हूँ। क्या आपलोग महात्मा पाण्डुके पुत्र हैं?' ॥ १४ ॥

गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा
गत्वा प्रशंसामभिधाय तेषाम् ।
वाक्यं समग्रं नृपतेर्यथाव-
दुवाच चानुक्रमविक्रमेण ॥ १५ ॥
राजाका अनुरोध मानकर पुरोहितजी गये और उन सबकी प्रशंसा करके राजा द्रुपदके वचनोंको ठीक-ठीक एकके बाद एक करके क्रमशः कहने लगे— ॥ १५ ॥

विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः
पाञ्चालराजो वरदो वरार्हाः ।
लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा
हर्षस्य नान्तं प्रतिपद्यते सः ॥ १६ ॥
'वरदानके योग्य वीर पुरुषो! वर देनेमें समर्थ पांचालदेशके राजा द्रुपद आपलोगोंका परिचय जानना चाहते हैं। इन वीर पुरुषको लक्ष्यवेध करते देखकर उन्हें हर्षकी सीमा नहीं रह गयी है ॥ १६ ॥

आख्यात च ज्ञातिकुलानुपूर्वीं
पदं शिरस्सु द्विषतां कुरुध्वम् ।
प्रह्लादयध्वं हृदयं ममेदं
पाञ्चालराजस्य च सानुगस्य ॥ १७ ॥
'आपलोग अपनी जाति और कुल आदिका यथावत् वर्णन करें, शत्रुओंके माथेपर पैर रखें और मेरे तथा अनुचरोंसहित पांचालराजके हृदयको आनन्द प्रदान करें ॥ १७ ॥

पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः
प्रियः सखा चात्मसमो बभूव ।
तस्यैष कामो दुहिता ममेयं
स्नुषां प्रदास्यामि हि कौरवाय ॥ १८ ॥
‘महाराज पाण्डु राजा द्रुपदके आत्माके समान प्रिय मित्र थे। इसलिये उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह पाण्डुकुमारसे करूँ। इसे राजा पाण्डुको पुत्रवधूके रूपमें समर्पित करूँ’ ॥ १८ ॥
अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो
हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः ।
यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहु-
र्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् ॥ १९ ॥
सर्वांगसुन्दर शूरवीरो! राजा द्रुपदके हृदयमें नित्य निरन्तर यह कामना रही है कि मोटी एवं विशाल भुजाओंवाले अर्जुन मेरी इस पुत्रीका धर्मपूर्वक पाणि-ग्रहण करें ॥ १९ ॥
कृतं हि तत् स्यात् सुकृतं ममेदं
यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् ।
‘उनका यह कहना है कि यदि मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय, तो मैं समझूँगा कि यह मेरे शुभ कर्मोंका फल प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिये यश, पुण्य और हितकी बात होगी’ ॥ १९ १/२ ॥
अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं
ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥ २० ॥
समीपतो भीममिदं शशास
प्रदीयतां पाद्यमर्घ्यं तथास्मै ।
मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ-
स्तस्मै प्रयोज्याभ्यधिका हि पूजा ॥ २१ ॥
जब विनयशील पुरोहितजी यह बात कह चुके, तब राजा युधिष्ठिरने उनकी ओर देखकर पास बैठे हुए भीमसेनको यह आज्ञा दी कि ‘इन्हें पाद्य और अर्घ्य समर्पित करो। ये महाराज द्रुपदके माननीय पुरोहित हैं। अतः इनका हमें विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये’ ॥ २०-२१ ॥
भीमस्ततस्तत् कृतवान् नरेन्द्र
तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् ।
सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा
युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥ २२ ॥

जनमेजय! तब भीमसेनने पाद्य, अर्घ्य निवेदन करके उनका विधिवत् पूजन किया। उनकी दी हुई पूजाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके पुरोहितजी जब बड़े सुखसे आसनपर बैठ गये, तब राजा युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणदेवतासे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

पाञ्चालराजेन सुता निसृष्टा
स्वधर्मदृष्टेन यथा न कामात् ।
प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा
सा तेन वीरेण तथानुवृत्ता ॥ २३ ॥
‘ब्रह्मन्! पाञ्चालराज द्रुपदने यह कन्या अपनी इच्छासे नहीं दी है, उन्होंने अपने धर्मके अनुसार लक्ष्यवेधकी शर्त करके अपनी कन्या देनेका निश्चय किया था। उस वीर पुरुषने उसी शर्तको पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है ॥ २३ ॥
न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा
न चापि शीले न कुले न गोत्रे ॥
कृतेन सज्येन हि कार्मुकेण
विद्धेन लक्ष्येण हि सा विसृष्टा ॥ २४ ॥
सेयं तथानेन महात्मनेह
कृष्णा जिता पार्थिवसङ्घमध्ये ।

नैवंगते सौमकिरद्य राजा
संतापमर्हत्यसुखाय कर्तुम् ॥ २५ ॥
‘राजाने वहाँ वर्ण, शील, कुल और गोत्रके विषयमें कोई अभिप्राय नहीं व्यक्त किया था। धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्यवेध कर देनेपर ही कन्यादानकी घोषणा की थी। इस महात्मा वीरने उसी घोषणाके अनुसार राजाओंकी मण्डलीमें राजकुमारी कृष्णापर विजय पायी है। ऐसी दशामें सोमकवंशी राजा द्रुपदको अब सुखका अभाव करनेवाला संताप नहीं करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥

कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः
स चापि सम्पत्स्यति पार्थिवस्य ।
सम्प्राप्यरूप्रां हि नरेन्द्रकन्या-
मिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये ॥ २६ ॥
‘ब्राह्मण! राजा द्रुपदकी जो पहलेकी अभिलाषा है, वह भी पूरी होगी। इस राजकन्याको हम सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य एवं उत्तम मानते हैं ॥ २६ ॥

न तद् धनुर्मन्दबलेन शक्यं
मौर्व्या समायोजयितुं तथा हि ।
न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन
लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥ २७ ॥
‘कोई बलहीन पुरुष उस विशाल धनुषपर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता था। जिसने अस्त्रविद्याकी पूर्ण शिक्षा न पायी हो, ऐसे पुरुषके अथवा किसी नीच कुलके मनुष्यके लिये भी उस लक्ष्यको गिराना असम्भव था ॥ २७ ॥

तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं
पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य ।
न चापि तत्पातनमन्यथेह
कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥ २८ ॥
‘अतः पांचालराजको अब अपनी पुत्रीके लिये पश्चात्ताप करना उचित नहीं है। इस पृथ्वीपर उस वीरके सिवा ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो उस लक्ष्यको वेध सके’ ॥ २८ ॥

एवं ब्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु
पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः ।
तत्राजगामाशु नरो द्वितीयो
निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥ २९ ॥
राजा युधिष्ठिर यों कह ही रहे थे कि पांचालराज द्रुपदके पाससे एक दूसरा मनुष्य यह समाचार देनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आया कि ‘राजभवनमें आपलोगोंके लिये भोजन तैयार है’ ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पुरोहितयुधिष्ठिरसंवादे
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पुरोहितयुधिष्ठिरविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥