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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1345, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1345

पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः
प्रियः सखा चात्मसमो बभूव ।
तस्यैष कामो दुहिता ममेयं
स्नुषां प्रदास्यामि हि कौरवाय ॥ १८ ॥
‘महाराज पाण्डु राजा द्रुपदके आत्माके समान प्रिय मित्र थे। इसलिये उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह पाण्डुकुमारसे करूँ। इसे राजा पाण्डुको पुत्रवधूके रूपमें समर्पित करूँ’ ॥ १८ ॥
अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो
हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः ।
यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहु-
र्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् ॥ १९ ॥
सर्वांगसुन्दर शूरवीरो! राजा द्रुपदके हृदयमें नित्य निरन्तर यह कामना रही है कि मोटी एवं विशाल भुजाओंवाले अर्जुन मेरी इस पुत्रीका धर्मपूर्वक पाणि-ग्रहण करें ॥ १९ ॥
कृतं हि तत् स्यात् सुकृतं ममेदं
यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् ।
‘उनका यह कहना है कि यदि मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय, तो मैं समझूँगा कि यह मेरे शुभ कर्मोंका फल प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिये यश, पुण्य और हितकी बात होगी’ ॥ १९ १/२ ॥
अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं
ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥ २० ॥
समीपतो भीममिदं शशास
प्रदीयतां पाद्यमर्घ्यं तथास्मै ।
मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ-
स्तस्मै प्रयोज्याभ्यधिका हि पूजा ॥ २१ ॥
जब विनयशील पुरोहितजी यह बात कह चुके, तब राजा युधिष्ठिरने उनकी ओर देखकर पास बैठे हुए भीमसेनको यह आज्ञा दी कि ‘इन्हें पाद्य और अर्घ्य समर्पित करो। ये महाराज द्रुपदके माननीय पुरोहित हैं। अतः इनका हमें विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये’ ॥ २०-२१ ॥
भीमस्ततस्तत् कृतवान् नरेन्द्र
तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् ।
सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा
युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥ २२ ॥