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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०३

सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त
जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटना-
को भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं, तथा
कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें
जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी
कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमे लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं ॥ १६ ॥
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता।
य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥
सः हि=वही, तन्मयः=तन्मय, अमृतः=अमृतरूप, ईशसंस्थः=ईश्वरों (लोकपालों) मे भी आत्मरूपसे स्थित,
ज्ञः=सर्वज्ञ, सर्वगः=सर्वत्र परिपूर्ण, (और) अस्य=इस, भुवनस्य=ब्रह्माण्डका, गोप्ता=रक्षक है, यः=जो, अस्य=
इस, जगतः=सम्पूर्ण जगत्‌का; नित्यम्=सदा, एव=ही, ईशे=शासन करता है, (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत्‌पर
शासन करनेके लिये, अन्यः=दूसरा कोई भी, हेतुः=हेतु, न=नहीं, विद्यते=है ॥ १७ ॥
व्याख्या—जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमे वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही तन्मय—स्व-स्वरूपमें स्थित, अमृत-
स्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्‌के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त
लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही
इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं, वे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और सञ्चालन करते हैं। दूसरा कोई
भी इस जगत्‌पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता, क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ
नहीं है ॥ १७ ॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त परमेश्वरको जानने और पानेके किये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥
यः=जो परमेश्वर, वै=निश्चय ही, पूर्वम्=सबसे पहले; ब्रह्माणम्=ब्रह्माको, विदधाति=उत्पन्न करता है,
च=और, यः=जो, वै=निश्चय ही, तस्मै=उस ब्रह्माको, वेदान्=समस्त वेदोंका ज्ञान, प्रहिणोति=प्रदान करता है;
तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम्=उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले, ह देवम्=प्रसिद्ध देव परमेश्वरको,
अहम्=मैं, मुमुक्षुः=मोक्षकी इच्छावाला साधक, शरणम्=शरणरूपमे, प्रपद्ये=ग्रहण करता हूँ ॥ १८ ॥
व्याख्या—उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एव सुगम उपाय सर्वतोभावसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी
शरणमें चले जाना है। अतः साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये ।
जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभि कमलमेसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें निःसन्देह समस्त वेदोंका ज्ञान
प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमे तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता
१०। १०), उन पूर्वमन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मै मोक्षकी अभिलाषासे युक्त होकर शरण
ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें ॥ १८ ॥
निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥
निष्कलम्=कलाओंसे रहित, निष्क्रियम्=क्रियारहित, शान्तम्=सर्वथा शान्त, निरवद्यम्=निर्दोष;
निरञ्जनम्=निर्मल, अमृतस्य=अमृतके, परम्=परम; सेतुम्=सेतुरूप, (तथा) दग्धेन्धनम्=जले हुए ईंधनसे युक्त,
अनलम् इव=अग्निकी भाँति (निर्मल ज्योतिःस्वरूप उन परमात्माका मैं चिन्तन करता हूँ ) ॥ १९ ॥

५०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
व्याख्या-निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना करनेवाले साधकको इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये कि जो (पहले
बतायी हुई) सोलह कलाओंसे अर्थात् संसारके सम्बन्धसे रहित, सर्वथा क्रियाशून्य, परम शान्त और सब प्रकारके दोषोंसे
रहित है, जो अमृतस्वरूप मोक्षके परम सेतु है अर्थात् जिनका आश्रय लेकर मनुष्य अत्यन्त सुगमतापूर्वक इस संसार-समुद्रसे
पार हो सकता है, जो लकड़ीका पार्थिव अंश जल जानेके बाद धधकते हुए अंगारोंवाली अग्निकी भाँति सर्वथा निर्विकार,
निर्मल प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परम चेतन हैं, उन निर्विशेष निर्गुण निराकार परमात्माको तत्त्वसे जाननेके लिये उन्हींको लक्ष्य
बनाकर उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १९ ॥
सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही गयी थी कि इस संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये उन परमात्माको जान लेनेके सिवा दूसरा कोई
उपाय नहीं है, उसीको दृढ़ किया जाता है—
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥
यदा=जब; मानवाः=मनुष्यगण; आकाशम्=आकाशको; चर्मवत्=चमड़ेकी भाँति; वेष्टयिष्यन्ति=लपेट सकेंगे;
तदा=तब; देवम्=उन परमदेव परमात्माको; अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त;
भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥
व्याख्या-जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लपेटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर
भी इस कार्यको नहीं कर सकते; उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःख-समुद्रसे पार नहीं हो सकता।
अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हीं
को जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥
तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान्।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥
ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपःप्रभावात्=तपके प्रभावसे, च=और;
देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्घ-
जुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके
अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=उत्तमरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥
व्याख्या-यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयम-
मय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान
लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा
अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी
कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥२२॥
[इदम्=यह;] परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्पे=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम
भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो,
ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा=
अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो; उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥
व्याख्या-यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषदोंमें भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०५
    यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय
    और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—'जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो,
    ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये, तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना
    चाहिये।' भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो,
    उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है, अतः वह पहलेसे ही
    अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥
    यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
    तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।
    प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥
    यस्य = जिसकी, देवे = परमदेव परमेश्वरमे; परा = परम, भक्तिः = भक्ति है; (तथा) यथा = जिस प्रकार;
    देवे = परमेश्वरमें है, तथा = उसी प्रकार, गुरौ = गुरुमे भी है, तस्य महात्मनः = उस महात्मा पुरुषके हृदयमे, हि = ही;
    एते = ये; कथिताः = बताये हुए, अर्थाः = रहस्यमय अर्थ, प्रकाशन्ते = प्रकाशित होते हैं, प्रकाशन्ते महात्मनः = उसी
    महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥
    व्याख्या-जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमे परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमे होती है, उसी प्रकार
    अपने गुरुमे भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते ह । अतः जिज्ञासु-
    को पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये । जिसमे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमे ये गूढ अर्थ प्रकाशित
    होते हैं। इस मन्त्रमे अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥
    ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
    ॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥
    शान्तिपाठ
    ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा
    विद्विषावहै ।
    ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
    इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
छान्दोग्योपनिषद्
यह उपनिषद् सामवेदकी तलवकार शाखाके अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मणका भाग है । छान्दोग्य ब्राह्मणमे कुल दस
अध्याय हैं, उनमेंसे पहले और दूसरे अध्यायोंको छोड़कर शेष आठ अध्यायोंका नाम छान्दोग्योपनिषद् है ।
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौ-
पनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते
य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है ।
प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
ओंकारकी व्याख्या

ॐ-रूप इस अक्षरकी उद्गीथ शब्द-वाच्य परमात्माके
रूपमे उपासना करनी चाहिये । क्योंकि यज्ञमें उद्गाता 'ॐ'
इस अक्षरका ही सर्व प्रथम उच्चस्वरसे गान करता है। उस
ओङ्कारकी व्याख्या आरम्भ की जाती है ॥ १ ॥
इन चराचर जीवोंका रस—आधार पृथ्वी है, पृथ्वीका
रस—आधार अथवा कारण जल है, जलका रस—उसपर
निर्भर करनेवाली ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—उनसे
पोषण पानेवाला मनुष्य शरीर है, मनुष्यका रस—प्रधान अङ्ग
वाणी है, वाणीका रस—सार ऋचा * है, ऋचाका रस साम
है और सामका रस उद्गीथ (ओंकार) है । इनमें जो आठवाँ
(सबसे अन्तिम) रस उद्गीथरूप ओंकार है, वह समस्त रसोंमें
उत्कृष्ट रस है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ एव परब्रह्म परमात्माका
धाम—आश्रय है । अब कौन-कौन ऋचा है, कौन कौन साम
है तथा कौन कौन उद्गीथ है—यह विचार किया जाता है ।
वाणी ही ऋचा है, प्राण साम है, 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ
है । जो वाणी और प्राण तथा ऋचा और साम ह, यह एक
ही जोड़ा है—दो नहीं हैं । अर्थात् वाणी अथवा ऋचा तथा
प्राण अथवा साम एक दूसरेके पूरक हैं । वाणी और प्राणका
अथवा ऋचा और सामका यह जोड़ा ॐ-रूप इस अक्षरमें
भलीभाँति सयुक्त किया जाता है । जिस समय स्त्री और पुरुष
आपसमे प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उस समय वे अवश्य ही एक
दूसरेकी कामना पूर्ण करते हैं । इसी प्रकार यह वाणी और
प्राणका जोड़ा जब ओंकारमे लगाया जाता है, तब वह सदाके
लिये पूर्णकाम—कृतकृत्य हो जाता है । इस रहस्यको जानने-
वाला जो कोई उपासक इस उद्गीथस्वरूप अविनाशी परमेश्वरकी
उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति
करानेमें समर्थ होता है ॥ २-७ ॥
यह ॐ-रूप अक्षर अनुज्ञा अर्थात् अनुमतिसूचक भी है,
क्योंकि मनुष्य जब किसी बातके लिये अनुमति देता है तब
'ओम्' इस शब्दका ही उच्चारण करता है । किसीको कुछ

  • जिनके अक्षर, पाद और समाप्ति—ये नियत सख्याके
    अनुसार होते हैं, उन मन्त्रोंको 'ऋक्' कहते हैं, जिनके अक्षर आदिकी
    कोई नियत सख्या या क्रम न हो, उन्हें 'यजु' कहते हैं । 'ऋक्'
    सज्ञक मन्त्रोंमें ही जो गीतप्रधान हैं—गाये जा सकते हैं, उनकी
    'साम' सज्ञा है । साम-मन्त्रोंद्वारा विभिन्न देवताओंकी स्तुति की
    जाती है ।

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०७
करनेके लिये जो यह अनुज्ञा—अनुमति देना है, वही समृद्धि—
बड़प्पनका लक्षण है, अतः इस रहस्यको जाननेवाला जो साधक
उद्गीथके रूपमें उस परम अक्षर परमात्माकी उपासना करता
है, वह अपनी और दूसरोंकी समस्त कामनाओं—भोग्यवस्तुओं-
को बढानेमें समर्थ होता है। ओंकारसे ही ऋक्, यजुः और
साम—ये तीनों वेद अथवा इन तीनों वेदोंमें वर्णित यज्ञादि
कर्म आरम्भ होते है। इस ओंकाररूप अक्षरकी अर्थात् इसके
अर्थभूत अविनाशी परमात्माकी पूजा—प्रीतिकाके लिये, इसीकी
महिमा (प्रभाव) एव रस (शक्ति) से 'ॐ' इस प्रकार
कहकर 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विक् 'आश्रावण' करता है—मन्त्र
सुनाता है, 'ॐ' यों कहकर ही होता नामका ऋत्विक् 'शसन'
करता है—मन्त्रोंका पाठ करता है और 'ॐ' यों कहकर ही
'उद्गाता' उद्गीथका गान करता है। जो इस रहस्यको इस
प्रकार जानता है और जो नहीं जानता, दोनों इस ओंकारसे
ही यज्ञादि कर्म करते हैं, परंतु जानना और न जानना दोनों
अलग-अलग हैं । साधक जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक, उसके
वास्तविक रहस्यको बतानेवाली विद्याके द्वारा अर्थात् उसके
तत्त्वको समझकर करता है, वही अधिक-से-अधिक सामर्थ्ययुक्त
होता है। यही इस ओंकाररूप अक्षरकी प्रसिद्ध व्याख्या—
उसकी महिमाका वर्णन है ॥ ८–१० ॥

द्वितीय खण्ड
ओंकारकी आध्यात्मिक उपासना

यह प्रसिद्ध है कि प्रजापतिकी संतान—देवता और असुर
दोनों जब आपसमें लड़ रहे थे, उसी समय देवताओंने उद्गीथ
(ओंकार) को ध्येय बनाकर उसकी उपासनारूप यज्ञ किया।
उनका उद्देश्य यह था कि 'इस अनुष्ठानद्वारा हमलोग इन
असुरोंको परास्त कर देंगे।' उन्होंने नासिकामें रहनेवाले
घ्राणेन्द्रियरूप प्राणको उद्गीथ बनाकर उपासना की। तब उस
घ्राणेन्द्रियको असुरोंने राग-द्वेषरूप पापसे युक्त कर दिया।
घ्राणेन्द्रिय राग-द्वेषसे युक्त है, इसीलिये उसके द्वारा यह जीव
अच्छी और बुरी—दोनों प्रकारकी गन्धको ग्रहण करता है।
तदनन्तर उन प्रसिद्ध देवताओंने उद्गीथरूपसे वाणीकी उपासना
की। असुरोंने उसे भी राग द्वेषसे कलुषित कर दिया। वाणी
राग-द्वेषसे कलुषित है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य सत्य और
झूठ दोनों बोलता है। इसके बाद देवताओंने उद्गीथरूपसे
नेत्रकी उपासना की। उसे भी असुरोंने राग-द्वेषसे मलिन कर
दिया। चक्षु-इन्द्रिय राग-द्वेषसे मलिन हो रही है, इसीलिये
उसके द्वारा मनुष्य देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य—शुभ
और अशुभ दोनों प्रकारके दृश्य देखता है। अबकी बार
देवताओंने श्रोत्रकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी
असुरोंने राग द्वेषसे दूषित कर दिया। श्रोत्र इन्द्रिय राग-
द्वेषसे दूषित है, इसीलिये मनुष्य उसके द्वारा सुननेयोग्य और
न सुननेयोग्य—दोनों प्रकारके शब्द सुनता है। फिर देवताओंने
मनकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग-
द्वेषसे अभिभूत कर दिया। मन राग-द्वेषसे अभिभूत है,
इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य मनमें लानेयोग्य और मनमें
न लानेयोग्य—दोनो प्रकारके सकल्प करता है। तब देवताओं-
ने जो यह मुख्य प्राण है, उसीकी उद्गीथरूपसे उपासना
की। उसे भी असुरोंने राग द्वेषसे युक्त करना चाहा,
परंतु उसके समीप जाते ही वे उसी प्रकार छिन्न-भिन्न
हो गये, जैसे खोदे न जा सकनेवाले सुदृढ पत्थरसे टकराकर
मिट्टीका ढेला चूर-चूर हो जाता है। जिस प्रकार अच्छेद्य
पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला छिन्न-भिन्न हो जाता है, ठीक
वैसे ही वह मनुष्य भी विध्वस हो जाता है, जो उद्गीथका
रहस्य जाननेवालेके विषयमें अहित कामना करता है तथा जो
उसे पीड़ा पहुँचाता है, क्योंकि उद्गीथके रहस्यको जाननेवाला
मनुष्य मानो अच्छेद्य पत्थर ही है ॥ १–८ ॥
प्राणके द्वारा मनुष्य न तो सुगन्धका अनुभव करता है
और न दुर्गन्धका ही, क्योंकि इसके सम्पर्कमें आकर तो राग-द्वेष
नष्ट हो जाते हैं। इसके द्वारा मनुष्य जो कुछ खाता और जो
कुछ पीता है, उससे वह मन-इन्द्रियादि अन्य प्राणोंकी भी रक्षा
करता है। अन्तकालमें इसीको न पाकर अर्थात् इसके न
रहनेपर इसके साथ ही अन्य सब प्राणोंको लेकर जीवात्मा भी
शरीरसे उत्क्रमण कर जाता है—उसे छोड़कर अन्यत्र चला
जाता है। इसीलिये अन्त समयमे जीव अपना मुँह अवश्य खोल
देता है। यही प्राणकी महिमा है ॥ ९ ॥
यह प्रसिद्ध है कि अङ्गिरा ऋषिने प्राणको ही प्रतीक बना-
कर ओंकारस्वरूप परमात्माकी उपासना की थी। अतः लोग
इसीको 'आङ्गिरस'—अङ्गिराका उपास्य मानते हैं, क्योंकि
यह समस्त अङ्गोंका रस—पोषक है । इसीसे बृहस्पतिने भी
प्राणरूपसे उद्गीथकी—ओंकारवाच्य परमात्माकी उपासना की
थी। परंतु लोग प्राणको ही 'बृहस्पति' मानते हैं, क्योंकि
वाणीका एक नाम बृहती भी है और उसका यह पति—रक्षक
है। इसीसे आयास्य नामके प्रसिद्ध ऋषिने भी प्राणके रूपमे

४०८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ १
उद्गीथकी उपासना की थी । परंतु लोग इस प्राणको ही 'आयास्य'
मानते हैं, क्योंकि यह आस्य अर्थात् मुखके द्वारा आता-जाता
है । दल्भके पुत्र वक नामक ऋषिने प्राणकी उपासनारूप
साधनसे उद्गीथ अर्थात् ओंकारके अर्थरूप परमात्माको जाना
था । वे प्रसिद्ध ऋषि नैमिषारण्यमे यज्ञ करनेवाले ऋषियोंके
उद्गाता हुए थे और उन्होंने इन यज्ञ करनेवालोंके लिये
उनकी कामना पूर्तिके उद्देश्यसे उद्गीथका गान किया था ।
प्राणके महत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला जो उपासक अक्षर-
ओंकाररूप उद्गीथकी उपासना करता है, वह निस्संदेह ओंकारके
गानद्वारा अपनी मनोवाञ्छित वस्तुको आकर्षित करनेमें समर्थ
होता है । इस प्रकार अध्यात्मविषयक--शरीरसे सम्बन्ध रखने-
वाली उपासनाका प्रकरण समाप्त हुआ ॥ १०-१४ ॥
तृतीय खण्ड
ओंकारकी आधिदैविक उपासना
अब ओंकारकी आधिदैविक उपासनाका वर्णन किया जाता
है। जो यह सूर्य तपता है, उसीकी उद्गीथके रूपमे उपासना करनी
चाहिये । यह सूर्य उदय होते ही मानो समस्त प्रजाके लिये
अन्न आदिकी उत्पत्तिके उद्देश्यसे उद्गान करता है-उनकी
उन्नतिमें कारण बनता है, इसीलिये यह 'उद्गीथ' है । इतना
ही नहीं, यह उदय होते ही अन्धकार और भयका नाश कर
देता है । अतः जो इस प्रकार सूर्यके प्रभावको जानता है, वह
स्वयं जन्म मृत्युके भय एव अज्ञानरूप अन्धकारका नाशक
बन जाता है ॥ १ ॥
यह प्राण और वह सूर्य दोनों समान ही हैं; क्योकि यह
मुख्य प्राण उष्ण है और सूर्य भी गरम है । इस प्राणको लोग
'स्वर' ( क्रियाशक्तिसम्पन्न ) कहकर पुकारते हैं और उस
सूर्यको 'स्वर' ( स्वयं क्रियाशक्तिवाला ) एव 'प्रत्यास्वर'
( दूसरोंको क्रियाशक्ति प्रदान करनेवाला ) दोनो नामोसे पुकारते
हैं । इसीलिये इस प्राण एव उस सूर्यके रूपमें उस उद्गीथकी
उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥
इसके बाद दूसरे प्रकारकी उपासना बतलायी जाती है ।
व्यानके रूपमें भी उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये । मनुष्य
जो श्वासके द्वारा भीतरकी वायुको बाहर निकालता है,
वह प्राण है, और जो बाहरकी वायुको भीतर ले जाता है, वह
अपान है । तथा जो प्राण और अपानकी संधि है, अर्थात्
जिसमें ये दोनों मिल जाते हैं, वह व्यान है । जो व्यान है,
वही वाणी है* । इसीलिये मनुष्य श्वासको बाहर निकालने
और भीतर खींचनेकी क्रिया न करता हुआ ही वाणीका स्पष्ट
उच्चारण करता है । अर्थात् सामान्यतया बोलते समय श्वास-
प्रश्वासकी क्रिया बंद हो जाती है ॥ ३ ॥
जो वाणी है, वही ऋचा है, इसलिये मनुष्य प्राण और
अपानकी क्रिया न करता हुआ ही वेदकी ऋचाओका भली-
भाँति उच्चारण करता है । जो ऋचा है, वही साम है, क्योंकि
'ऋक्'का ही अशविशेष साम है । इसलिये मनुष्य प्राण और
अपानकी क्रिया न करता हुआ ही सामका गान करता है ।
जो साम है, वही उद्गीथ है; क्योंकि सामका ही मुख्य भाग
'उद्गीथ' है । इसलिये मनुष्य प्राण और अपानकी क्रिया न
करता हुआ ही उच्चस्वरसे उद्गीथका गान करता है । अर्थात्
तीनोंमे ही व्यानकी ही प्रधानता है । व्यान ही तीनोंका आधार
है । इनके अतिरिक्त जो विशेष सामर्थ्यकी अपेक्षा रखनेवाले
कर्म है--जैसे काष्ठ मन्थनद्वारा अग्निको प्रकट करना, एक
नियत सीमातक दौड़ लगाना, कठोर धनुषको खींचना इत्यादि-
इन सबको मनुष्य प्राण और अपानकी क्रियाको रोककर व्यानके
बलसे ही करता है । इस प्रकार व्यानकी श्रेष्ठता सिद्ध हो
जानेके कारण व्यानके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना करनी
चाहिये ॥ ४-५ ॥
अब एक और प्रकारकी उपासना बतायी जाती है। वह यह
है कि 'उद्गीथ' शब्दके जो तीन अक्षर हैं, उनके रूपमें उद्गीथ
शब्दवाच्य परमात्माकी उपासना करनी चाहिये । इनमें पहला
'उत्' ही प्राण है, क्योंकि मनुष्य प्राणसे ही उत्थान करता है
और 'उत्' उत्थानका वाचक है । दूसरा 'गी' वाणीका द्योतक
है, क्योकि वाणीको 'गीः' इस नामसे पुकारते हैं । और तीसरा
'थ' अन्नका वाचक है, क्योंकि यह समस्त जगत् अन्नके ही
आधार स्थित है और 'थ' स्थितिका बोधक है । 'उत्' ही
स्वर्गलोक है, 'गी' अन्तरिक्षलोक है और 'थ' भूलोक है ।
'उत्' ही आदित्य है, 'गी' वायु है और 'थ' अग्नि है । 'उत्'
ही सामवेद है, 'गी' यजुर्वेद है और 'थ' ऋग्वेद है । इस

  • प्रथम खण्डमें जिस प्राणकी वाणी और ऋचाके साथ एकता
    की गयी है, वही प्राण यहाँ व्यानके नामसे कहा गया है । वहाँ
    'प्राण' शब्दसे प्राणके समष्टिरूपका वर्णन है, केवल श्वासको बाहर
    निकालनेकी क्रियाका नाम ही वहाँ प्राण नहीं है-यह बात
    ध्यानमें रखनी चाहिये ।

खण्ड ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०९
प्रकार जाननेवाला जो साधक 'उद्गीथ' शब्दके इन तीनों
अक्षरोंकी उद्गीथ—ओंकारवाच्य परमात्माके रूपमें उपासना
करता है, उसके लिये वाणी अपना सारा रहस्य प्रकट कर देती
है, अर्थात् उसके सामने समस्त वेदोंका तात्पर्य अपने-आप
प्रकट हो जाता है । तथा वह सब प्रकारकी भोग सामग्रीसे एव
उसे भोगनेकी शक्तिसे भी सम्पन्न हो जाता है ॥ ६-७ ॥
अब कामनाओंकी उत्तम सिद्धिका निश्चित साधन बताया
जाता है । इसके लिये उपासनाके जो सात अङ्ग आगे बताये
जानेवाले हैं, उन्हें ध्यानमें रखना चाहिये । उनमेंसे पहला
अङ्ग यह है कि जिस सामके द्वारा साधक अपने इष्टदेवकी
स्तुति करना चाहता हो, उसे सदा याद रक्खे । दूसरी बात
यह है कि वह साम—गाये जानेवाला मन्त्र जिस ऋचामे
प्रतिष्ठित हो, उस ऋचाको भी ध्यानमें रक्खे । तीसरी बात
यह है कि जिस ऋषिके द्वारा उस मन्त्रका साक्षात्कार किया
गया हो, उस ऋषिको स्मरण रक्खे । चौथी बात यह है कि
उस सामगानके द्वारा जिस देवताकी स्तुति करना उपासकको
अभीष्ट हो, उस देवताका भलीभाँति स्मरण रक्खे । पाँचवीं
बात यह है कि जिस छन्दवाले मन्त्रसे वह स्तुति करना चाहता
हो, उस छन्दको स्मरण रक्खे और छठी बात यह है कि
सामवेदके जिस स्तोत्र-समूहसे स्तुति की जानेवाली हो, उस
स्तुति-समूहको भी ध्यानमें रक्खे । सातवीं बात यह है कि
जिस ओर मुख करके स्तुति करनेका विचार हो, उस दिशाका
भी ध्यान रक्खे। अन्तमें प्रमादरहित अर्थात् सावधान होकर
अपनी अभिलाषाको याद रखते हुए परमात्माके समीप जाकर
अर्थात् ध्यानके द्वारा उनमें स्थित होकर स्तुति करनी चाहिये।
क्योंकि इस प्रकार स्तुति करनेवाला उपासक जिस कामनासे
स्तुति करता है, उसकी वह कामना शीघ्र ही पूर्णतया सफल
हो जाती है ॥ ८-१२ ॥
चतुर्थ खण्ड
ओंकारके आश्रयसे अमृतत्वकी प्राप्ति
'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, यों समझकर उसकी
उपासना करनी चाहिये, क्योंकि यज्ञमें उद्गाता नामक ऋत्विज्
'ॐ' इस अक्षरका ही उच्चस्वरसे गान करता है । उस
ओंकारकी व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि मृत्युसे डरते हुए देवताओंने ऋक्,
यजुः और सामरूप तीनों वेदोंमें प्रवेश किया—उनका आश्रय
लिया । उन्होंने गायत्री आदि भिन्न-भिन्न छन्दोंके मन्त्रोंसे
अपनेको ढक लिया—उन्हें अपना कवच बनाया। उन्होंने जो
भिन्न भिन्न छन्दोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा अपनेको आच्छादित कर
लिया, इसीसे वे 'छन्द' कहलाये । जो आच्छादन करे, वही
छन्द—यह 'छन्दस्' शब्दकी व्युत्पत्ति है ॥ २ ॥
जिस प्रकार मछली पकड़नेवाला धीवर जलके भीतर भी
मछलीको देख लेता है, उसी प्रकार देवताओंको मृत्युने उन
ऋक्, साम एव यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ओटमें भी देख लिया—
वहाँ भी उसने इनका पिण्ड नहीं छोड़ा । वे देवतालोग भी
इस बातको जान गये, अतः ऋक्, साम और यजुर्वेदके
मन्त्रोंसे ऊपर उठकर वे स्वरमें अर्थात् ओंकारमें ही प्रविष्ट हो
गये ॥ ३ ॥
जब कोई ऋक्‌का—ऋग्वेदके मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर
लेता है, तब वह निःसन्देह 'ॐ' इस प्रकार ही उच्चस्वरसे
उच्चारण करता है । इसी प्रकार सामको और वैसे ही
यजुर्वेदको जाननेवाला भी 'ॐ' का ही गान करता है । इस
प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जो यह ओंकाररूप अक्षर अर्थात्
उसका वाच्यभूत परमात्मा है, वही ऊपर बताया हुआ स्वर
है, वही अमृत—मृत्युसे छुड़ानेवाला एव भयरहित स्थान है ।
उसका आश्रय लेकर देवतालोग अमर और निर्भय हो गये ।
जो ओंकारको इस रूपमें जानकर उसके अर्थभूत अविनाशी
परमेश्वरकी स्तुति एव उपासना करता है तथा एकमात्र इसी
अमृतरूप, सर्वथा भयरहित एव अविनाशी परमात्माके
स्वरूपभूत इस स्वरमें प्रविष्ट हो जाता है—उसकी शरणमें
चला जाता है, वह उसमें प्रवेश करके उसी अमृतको प्राप्त कर
लेता है, जिस अमृतको पूर्वोक्त प्रकारसे देवताओंने प्राप्त किया
था ॥ ४-५ ॥
पञ्चम खण्ड
सूर्य एवं प्राणके रूपमें ओंकारकी उपासना
अब ओंकारकी उपासनाका अन्य प्रकार बताया जाता है।
निश्चय ही जो उद्गीथ—गाने योग्य परमात्मा है, वही प्रणव—
ओंकार है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—यों समझना
चाहिये, क्योंकि नाम और नामीमें कोई भेद नहीं होता ।
उ० अ० ५२—५३—

४१० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

४१० * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय १
वह आकाशमें विचरनेवाला सूर्य ही उद्गीथ है और यही प्रणव
भी है। अर्थात् सूर्यमें ही परमात्मा और उनके वाचक 'ॐ'
की भावना करनी चाहिये, क्योंकि यह 'ॐ' इस प्रकार
उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। यहाँ 'स्वरन् एति'
(उच्चारण करता हुआ गमन करता है)—इस प्रकार 'सूर्य'
शब्दकी व्युत्पत्ति की गयी है ॥ १ ॥
एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे इस प्रकार
कहा—'बेटा ! मैने इसी सूर्यको लक्ष्य करके ओंकारका भली-
भाँति गान किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। तू सूर्यकी
किरणोंका सब ओरसे आवर्तन कर—उन सबके रूपमें
ओंकारका बार-बार चिन्तन कर; निःसन्देह तेरे बहुत-से पुत्र
हो जायेंगे।' इस प्रकार यह आधिदैविक—देवतासम्बन्धी
उपासना है ॥ २ ॥
अब पुनः आध्यात्मिक (शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली)
उपासनाका प्रकार बताया जाता है। जो यह श्वासके रूपमें
चलनेवाला मुख्य प्राण है, उसीके रूपमें उद्गीथकी—गानेयोग्य
परमात्माकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि वह 'ॐ' इस
प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। प्राण सूर्यरूप
है, इसीलिये 'स्वरन् एति' इसी प्रकार यहाँ भी व्युत्पत्ति की
गयी है। अर्थात् हमारे प्राणके द्वारा निरन्तर ओंकारकी ध्वनि
हो रही है—ऐसी भावना करते हुए उसमें ओंकाररूप
परमात्माका ध्यान करना चाहिये ॥ ३ ॥
एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे यह बात कही
कि "बेटा ! मैने इस प्राणको ही लक्ष्य करके—इसीमें
परमात्माकी भावना करते हुए ओंकारका भलीभाँति गान—
आवर्तन किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। 'निश्चय
ही मेरे बहुत से पुत्र होंगे' इस सङ्कल्पसे तू अनेक रूपोंमें
प्रतिष्ठित प्राणरूप परमात्माका भलीभाँति गान कर—
उपासना कर"*॥ ४ ॥
अब कहते हैं कि निश्चय ही सामका जो उद्गीथ नामक
भाग है, वही प्रणव है, क्योंकि प्रणव उसका सार है। और
जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। अर्थात् दोनोंमें कोई भेद नहीं
है। इस रहस्यको जाननेवाला निःसन्देह होताके आसनसे ही
उद्गाताद्वारा किये गये दोषयुक्त उद्गानको प्रणवके उच्चारणसे
पीछे सुधार लेता है, क्योंकि भगवान्‌के नामोच्चारणसे यज्ञकी
सारी त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। यह इस ज्ञानकी महिमा
है ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
विविध रूपोंमें उद्गीथोपासना
यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह
अग्निरूप साम इस पृथिवीरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है—भलीभाँति
स्थित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता
है। पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है, वे दोनों मिलकर
'साम' हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम
है। वह यह वायुरूप साम इस अन्तरिक्षरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित
है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
अन्तरिक्ष ही मानो 'सा' है और वायु 'अम' है, वे दोनों
मिलकर साम हैं। पुनः द्युलोक—स्वर्गलोक ही ऋक् और
सूर्य ही साम है। वह यह सूर्यरूप साम इस स्वर्गरूप ऋक्‌में
प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया
जाता है। द्युलोक ही मानो 'सा' है और सूर्य मानो 'अम' है,
वे दोनों मिलकर साम हैं। समस्त नक्षत्रमण्डल ही ऋक् है
और चन्द्रमा साम है। वही यह चन्द्रमारूप साम इस नक्षत्र-
रूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका
गान किया जाता है। नक्षत्रमण्डल ही मानो 'सा' है और
चन्द्रमा 'अम' है, दोनों मिलकर साम हैं ॥१-४ ॥
अब दूसरी बात कहते हैं। जो यह प्रत्यक्ष दीखनेवाली
सूर्यकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो उसके भीतर
छिपा हुआ नीलापन और अतिशय श्यामता है, वह साम है।
वह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित
है, इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
इसके सिवा यह जो सूर्यकी श्वेत प्रभा—उज्ज्वल प्रकाश है,
वही 'सा' है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम प्रभा है, वह
'अम' है। वे दोनों मिलकर साम हैं। तथा सूर्यमें जो यह
उसका अन्तर्यामी स्वर्णसदृश प्रकाशस्वरूप पुरुष दिखायी देता
है—जिसकी दाढी सुवर्णकी भाँति प्रकाशमय है तथा केश भी
सोनेकी ही भाँति चमचमाते हैं और जो नखके अग्रभागसे
लेकर चोटीतक सब का सब स्वर्णमय प्रकाशयुक्त है, वह
परमपुरुष परमेश्वर ही है। उस सुवर्णसदृश प्रकाशयुक्त पुरुषके
दोनों नेत्र ऐसे हैं, जैसे कोई लाल कमल हो। उसका 'उत'

  • जो बात इन्हीं ऋषिने दूसरे मन्त्रमें सूर्यके सम्बन्धमें कही थी, वही यहाँ प्राणके सम्बन्धमें कही गयी है। इससे भी प्राण और
    सूर्यकी एकता प्रतिपादित होती है। प्रश्नोपनिषद्‌में प्राण और सूर्यकी एकताका भलीभाँति निरूपण हुआ है।

खण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४११.
(सबसे ऊपर उठा हुआ) यह नाम है। वह यह परमेश्वर
समस्त पापोंसे ऊपर उठा हुआ है। जो कोई उपासक इस
प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब पापोंसे ऊपर उठ
जाता है ॥ ५-७ ॥
ऋग्वेद और सामवेद उस परमात्माके ही गुणगान हैं,
इसलिये वह उद्गीथ है, तथा इसीलिये जो उद्गाता है, वह
वास्तवमें उसीका गान करनेवाला है। जो स्वर्गलोकसे भी
ऊपरके लोक हैं, उनका भी तथा देवताओंके भोगोंका भी
शासन वह परमात्मा ही करता है। यह आधिदैविक उपासना
समाप्त हुई ॥ ८ ॥
सप्तम खण्ड
शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना
अब वही बात शरीरकी दृष्टिसे समझायी जाती है। वाक्-
इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण साम है। वही यह प्राणरूप साम
वाणीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये
ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। वाणी ही ‘सा’
है, प्राण ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र
ही ऋक् है और उसके भीतरकी काली पुतली साम है। वही
यह आँखकी पुतलीरूप साम इस नेत्ररूप ऋक्में प्रतिष्ठित
है। इसीलिये ऋक्मे प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
नेत्र ही ‘सा’ है और पुतली ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम
हैं। पुन श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही यह मनरूप
साम श्रोत्ररूप ऋक्मे प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। श्रोत्र ही ‘सा’ है, मन ‘अम’
है, दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रोंकी श्वेत आभा
है, वही ऋक् है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम आभा
है, वह साम है। वही यह श्याम आभारूप साम इस श्वेत
आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रकी श्वेत आभा
है, वही ‘सा’ है; और जो नील और अतिशय श्याम आभा
है, वह ‘अम’ है, उन दोनोंका सम्मिलित रूप साम है।
तथा यह जो नेत्रके भीतर पुरुष दिखायी देता है, वही ऋक्
है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह
है और वही ब्रह्म है। इस पुरुषका वही रूप है, जो छठे
खण्डमें वर्णित आदित्यमण्डलमें स्थित पुरुषका रूप है। जो
उसके गुणगान हैं, वे ही इसके गुणगान हैं और जो उसका
नाम (उत्) है, वही इसका भी नाम है। पृथिवीसे नीचे
जो भी लोक हैं, उनका यही पुरुष शासन करता है तथा
मनुष्योंके भोग भी उसीके अधीन हैं। इसलिये जो लोग
वीणापर गाते हैं, वे इन्हीं परमेश्वरका गुणगान करते हैं, इसीसे
वे धनलाभ करते हैं—अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं। तथा
इस रहस्यको इस रूपमें जाननेवाला जो उपासक साम-गान
करता है, वह नेत्रस्थित तथा आदित्यमण्डलवर्ती दोनों ही
पुरुषोंका गुणगान करता है, वह उन परमेश्वरसे ही अभीष्ट
लाभ करता है। जो भी उस सूर्यलोकसे ऊपरके लोक हैं, उन
सबको तथा देवताओंके भोगोंको भी वह प्राप्त कर लेता है।
तथा सूर्यलोक अथवा मनुष्यलोकसे नीचेके जो भी लोक हैं,
उनको तथा मनुष्योंके भोगोंको भी वह इन परमपुरुषसे ही
प्राप्त कर लेता है। इसलिये निस्सन्देह इस प्रकार जाननेवाला
उद्गाता यजमानसे यों कहे—'मैं तेरे लिये कौन-सी अभीष्ट
वस्तुका गानके द्वारा आवाहन करूँ?' क्योंकि जो इस रहस्यको
इस प्रकार जानकर सामका गान करता है, वही वाञ्छित
भोगोंका गानद्वारा आवाहन करनेमें समर्थ होता है ॥ १-९ ॥
अष्टम खण्ड
उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और दाल्भ्यका संवाद
प्रसिद्ध है, तीन ऋषि उद्गीथका तत्त्व जाननेमें कुशल थे—
एक तो शालावान्के पुत्र शिलक, दूसरे चिकितायनके पुत्र
दाल्भ्य* और तीसरे जीवळके पुत्र प्रवाहण। एक बार वे
तीनों आपसमें इस प्रकार कहने लगे—‘निश्चय ही हमलोग
उद्गीथविद्यामें कुशल हैं, इसलिये यदि सबकी सम्मति हो तो
हम उद्गीथके विषयमें बातचीत करें।' 'बहुत ठीक है, ऐसा
ही हो' यों कहकर वे सब एक स्थानपर सुखसे बैठ गये।
तब प्रसिद्ध राजर्षि जीवळके पुत्र प्रवाहण ऋषि श्रेष्ठ दोनोंसे;

  • दाल्भ्यका अर्थ है दल्भकी सन्तान। यहाँ उनके पिताका नाम चिकितायन दिया गया है। ऐसी दशामें सम्भव है ये दल्भ-
    गोत्रमें उत्पन्न रहे हों, इसीलिये दाल्भ्य कहलाये हों। अथवा सम्भव है, ये द्वयामुष्यायण रहे हों। 'द्वयामुष्यायण' उन्हें कहते हैं, जो
    किसी दूसरेके गोद आये हों और जिन्होंने अपने जन्म देनेवाले पिताका उत्तराधिकार भी न छोड़ा हो। इस प्रकार वे दो पिताओंके
    पुत्र होते हैं। दो पिताओंके पुत्रकी ही हिंदू धर्म-शास्त्रोंमें 'द्वयामुष्यायण' संज्ञा है।

४१२ \ छान्दोग्योपनिषद् \ [ अध्याय १

४१२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १


बोले--'पहले आप दोनो पूज्यजन बातचीत आरम्भ करें। उपदेश देते हुए आप दोनों ब्राह्मणोंके वचनोंको मैं सुनूँगा।' यों कहकर वे चुप हो गये ॥ १-२ ॥

कहा जाता है, तब वे शालावान्के पुत्र शिलक ऋषि चिकितायनके पुत्र दाल्भ्यसे बोले--'कहिये तो मै ही आपसे प्रश्न करूँ?' इसपर दाल्भ्यने कहा--'पूछो।' शिलकने पूछा--'सामका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर ही सामका आश्रय है।' 'स्वरका आश्रय कौन है?' इस प्रकार पूछे जानेपर उन्होंने कहा--'प्राण ही स्वरका आश्रय है।' फिर प्रश्न हुआ--'प्राणका आश्रय कौन है?' उत्तर मिला--'अन्न ही प्राणका आश्रय है।' शिलकने फिर प्रश्न किया--'अन्नका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने उत्तर दिया--'जल ही अन्नका आश्रय है।' शिलकने पुनः पूछा--'जलका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर्गलोक ही जलका आश्रय है।' 'उस लोकका आश्रय कौन है?' शिलक पूछते ही गये। इसपर दाल्भ्य बोले--'स्वर्गलोकसे आगे नहीं जाना चाहिये, उसके परेकी बात नहीं पूछनी चाहिये। हम स्वर्गलोकमे ही सामकी पूर्णतया स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको स्वर्गलोक कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है'* ॥ ३-५ ॥

चिकितायन-पुत्र दाल्भ्यसे शालावान्के पुत्र सुप्रसिद्ध शिलक ऋषिने कहा--'दाल्भ्य ! तुम्हारा बताया हुआ साम निःसन्देह प्रतिष्ठाहीन है अर्थात् तुमने जो सामका अन्तिम आश्रय स्वर्ग बताया, वह ठीक नहीं है। स्वर्गका भी कोई और आश्रय अवश्य होना चाहिये। यदि कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् तुम्हारे इस अधूरे उत्तरपर झुंझलाकर तुम्हें यह कह दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा, तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा--यह निश्चय समझो।' दाल्भ्यने कहा--'क्या मै सामका तत्त्व श्रीमान्से जान सकता हूँ?' शिलकने कहा--'हाँ, जानो।' तब दाल्भ्यने पूछा--'स्वर्गलोकका आधार कौन है?' 'यह मनुष्यलोक ही उसका आधार है,' शिलकने स्पष्ट उत्तर दिया। 'मनुष्यलोकका आधार कौन है?' दाल्भ्यका अगला प्रश्न था। इसपर शिलक बोले--'जो सबकी प्रतिष्ठा है, उस लोकमे आगे प्रश्न नहीं करना चाहिये। सबकी प्रतिष्ठारूप मनुष्यलोकमे ही हम सामकी भलीभाँति स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको सबकी प्रतिष्ठारूप पृथ्वी कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है।'† तब जीवला-पुत्र प्रवाहणने शिलकसे कहा--'शालावान्के पुत्र शिलक ! तुम्हारा समझा हुआ साम भी निःसन्देह अन्तवाला ही है। अत यदि ऐसी स्थितिमें कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष तुम्हे शाप दे दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर सकता है।' इसपर शिलकने कहा--'क्या मैं इस रहस्यको श्रीमान्से जान सकता हूँ ?' प्रवाहणने उत्तर दिया--'जान लो' ॥ ६-८ ॥


नवम खण्ड

उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और प्रवाहणका संवाद

शिलकने प्रवाहणसे पूछा--'इस मनुष्यलोकका आश्रय कौन है?' इसपर प्रवाहणने उत्तर दिया--'आकाश अर्थात् सर्वत्र प्रकाशित परमात्मा ही इसके आश्रय हैं। निःसदेह ये समस्त जीव आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं; क्योंकि आकाश ही इन सबसे बड़ा है और आकाश ही सबका परम आश्रय है। वे आकाशस्वरूप परमात्मा ही बड़े से-बड़े और उद्गीथ (गानेयोग्य) हैं। वे सर्वथा असीम हैं। जो कोई उपासक इस प्रकार समझकर इस बड़े-से बड़े उद्गीथरूप परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका जीवन निःसन्देह ऊँचे-से-ऊँचा हो जाता है और वह निश्चय ही बड़े-से-बड़े लोकोंको जीत लेता है--प्राप्त कर लेता है।' एक बार शौनकके पुत्र अतिधन्वा नामक ऋषिने उदरशाण्डिल्य नामके ऋषिको इस ऊपर बताये हुए उद्गीथका रहस्य बताकर कहा था--'तेरी संतानोंमे लोग जबतक इस उद्गीथको जानते रहेंगे, तबतक इस लोकमें उनका जीवन इन सब साधारण मनुष्योंसे अवश्य ही अत्यन्त श्रेष्ठ बना रहेगा। तथा मरनेके बाद उन्हें उस लोकमे--परलोकमे उत्तम स्थान मिलेगा।' इस प्रकार समझना चाहिये। इस रहस्यको जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है, उसका जीवन इस मनुष्यलोकमें निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। तथा मरनेके बाद परलोकमें उसे सर्वोपरि स्थान मिलता है--यह निश्चित बात है ॥ १-४ ॥


* श्रुति कहती है--'स्वर्गो वै लोक सामवेद ।'
† श्रुतिका वचन है--'इयं वै रथन्तरम्' (यह पृथ्वी ही रथन्तरसाम है)।

खण्ड ११] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१३
दशम खण्ड
उपस्तिका आख्यान
एक बार ओले गिरनेसे कुरुदेशकी खेती चौपट हो गयी
थी। उन दिनों चक्र मुनिके पुत्र उपस्ति ऋषि अपनी धर्मपत्नी
आटिकीके साथ (जिसने अभी युवावस्था में प्रवेश नहीं किया
था) बड़ी दीन अवस्थामें-पराश्रित होकर किसी हाथीवालोंके
गाँवमें रहते थे। एक दिन अन्नके लिये भीख माँगते हुए
उपस्तिने अत्यन्त निकृष्ट कोटिके उड़द खाते हुए एक महावतसे
याचना की। उन प्रसिद्ध मुनिसे हाथीवान् इस प्रकार बोला कि
'जितने और जो उड़द मेरे इस पात्रमें रक्खे हैं, उनके सिवा
ओर उड़द मेरे पास नहीं हैं।' ऋषिने कहा-'इन्हींमेंसे
मुझे दे दे।' महावतने अपने पात्रमें बचे हुए सारे उड़द
उन्हें दे दिये। महावत बोला- 'उड़द खाकर जल भी पी
लीजिये।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'नहीं, ऐसा करनेपर
मेरेद्वारा तुम्हारा जूठा जल पिया जायगा।' 'क्या ये उड़द भी
जूठे नहीं हैं?' महावतके यों पूछनेपर उन प्रसिद्ध ऋषिने
उत्तर दिया-'अवश्य ही इन उड़दोंको न खानेपर मैं जीवित
न रहता। पर पीनेका जल तो मुझे यथेष्ट मिल जाता
है' ॥ १-४ ॥
उपस्ति ऋषि खानेसे बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके
लिये ले आये। उसने पहले ही अच्छी भिक्षा पा ली थी,
इसलिये उसने उन उड़दोंको अपने पतिसे लेकर रख दिया।
दूसरे दिन प्रातः काल शय्यात्याग करते समय उपस्तिने कहा-
'हाय, यदि हमें थोड़ा-सा भी अन्न मिल जाता तो हम कुछ
धन कमा लाते। अमुक राजा यज्ञ करनेवाला है। वह मुझे
ऋत्विजोंके सभी प्रकारके कार्योंके लिये वरण कर लेगा।'
ऋषिसे उनकी पत्नीने कहा- 'स्वामिन् ! लीजिये, कल जो
उड़द आप मुझे दे गये थे, वे ही मेरे पास बचे हुए हैं।' बस,
उन्हें खाकर उपस्ति उस विशाल यज्ञमें चले गये ॥ ५-७ ॥
उस यज्ञमें पहुँचकर जहाँ उद्गातालोग स्तुति करते हैं,
उस स्थानपर स्तुति करनेके लिये उद्यत उद्गाता आदि ऋत्विजों-
के समीप वे बैठ गये। फिर उन्होंने स्तुति करनेवाले प्रस्तोता
ऋत्विक्से कहा- 'प्रस्तोता ! जिस देवताका प्रस्तावसे सम्बन्ध
है, अर्थात् जिनकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना
जाने यदि तुम स्तुति करोगे तो याद रखना, तुम्हारा मस्तक
गिर जायगा।' इसी प्रकार उन्होंने उद्गातासे कहा-'उद्गाता !
जिस देवताका उद्गीथसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिसका तुम उद्गीथ-
द्वारा गान करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम उद्गान
करोगे तो निश्चय समझो, तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा।'
तदनन्तर उन्होंने प्रतिहर्तासे कहा- 'प्रतिहर्ता ! जिस देवताका
प्रतिहारसे सम्बन्ध है, उसे न जानते हुए यदि तुम प्रतिहार-
क्रिया करोगे तो समझ लो कि तुम्हारा सिर तुम्हारी गर्दनपर
नहीं रहेगा।' इसपर वे सब ऋत्विक् अपने-अपने कार्यसे उपरत
होकर चुपचाप बैठ गये ॥ ८-११ ॥
एकादश खण्ड
प्रस्ताव आदि कर्मोंसे सम्बद्ध देवताओंका वर्णन
तब इन उपस्ति ऋषिसे यज्ञ करानेवाले राजाने कहा-
'मैं श्रीमान्‌का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ।'
इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति नामका
ऋषि हूँ।' राजाने कहा- 'सच मानिये, मैंने इन समस्त
ऋत्विज् सम्बन्धी कर्मोंके लिये श्रीमान्‌की सब जगह खोज की
थी। श्रीमान्‌के न मिलनेपर ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंको चुना
है। परन्तु अब मेरे सम्पूर्ण ऋत्विज्-सम्बन्धी कर्मोंपर श्रीमान्
ही रहें।' ऋषिने 'बहुत अच्छा' कहकर राजाके प्रस्तावका
अनुमोदन किया और फिर कहा- 'तब मेरी आज्ञा पाकर ये
पहलेवाले ऋत्विज् ही स्तुति आरम्भ करें। परन्तु एक बात
है-जितना धन आप इन लोगोंको दें, उतना ही मुझे भी
दें।' राजाने 'यही होगा' कहकर अपनी स्वीकृति दे दी ॥१-३॥
तदनन्तर प्रस्तोता उन प्रसिद्ध ऋषिके पास आकर बोला-
“श्रीमान्‌ने मुझे यह कहा था कि 'प्रस्तोता ! जिस देवताकी
तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति-
पाठ करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' सो वह
देवता कौन है-मैं यह जानना चाहता हूँ।" इसपर ऋषि
बोले-“वह देवता प्राण है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी प्रलय-
के समय प्राणमे ही प्राणरूप होकर विलीन हो जाते हैं और
पुनः सृष्टिकालमें प्राणसे ही प्रकट होते हैं। वही यह प्राण
प्रस्ताव अर्थात् स्तुतिमें अनुगत देवता है, उसको बिना जाने
यदि तुम स्तुति आरम्भ कर देते तो मेरे यह कहनेपर कि
'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय,' वैसा अवश्य हो
जाता” ॥ ४५ ॥
तदनन्तर उद्गाता उपस्तिके पास आकर बोला-
“श्रीमान्‌ने मुझसे यह कहा था कि 'उद्गाता ! जो उद्गीथसे

४१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

४१४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १
सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे न जानकर यदि तुम उद्गान
करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' अतः वह
देवता कौन है—यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।” इसपर
उन प्रसिद्ध ऋषि उपस्तिने कहा—“वह देवता सूर्य है।
निश्चय ही ये समस्त प्राणी आकाशमें स्थित सूर्यका यशोगान
किया करते हैं। वही यह सूर्य उद्गीथसे सम्बन्ध रखनेवाला
देवता है। उसे बिना जाने यदि तुमने उद्गान किया होता तो
मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा
अवश्य हो जाता” ॥ ६-७ ॥
इसके बाद प्रतिहर्त्ता उपस्तिके पास आकर यों कहने लगा—
“श्रीमान्‌ने मुझसे यह कहा था कि 'प्रतिहर्ता ! जो प्रतिहारसे
सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे बिना जाने यदि तुम प्रतिहार-
की क्रिया करोगे तो तुम्हारा सिर अलग होकर गिर पड़ेगा।'
अतः वह देवता कौन है, यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।”
ऋषिने प्रतिहर्ताके प्रश्नका उत्तर इस प्रकार दिया—“जिस
देवताकी बात तुमने पूछी है, वह अन्न है। निःसन्देह ये समस्त
प्राणी अन्नको ही खाकर जीवन धारण करते हैं। वही यह
अन्न प्रतिहारसे सम्बन्ध रखनेवाला देवता है। उसे बिना
जाने यदि तुम प्रतिहारकी क्रिया करते तो मेरे यह कहनेपर कि
'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा अवश्य हो
जाता” ॥ ८-९ ॥
द्वादश खण्ड
शौव उद्गीथका वर्णन
अब यहाँसे कुत्ते (का रूप धारण करनेवाले ऋषियों)
द्वारा प्रत्यक्ष किये हुए उद्गीथका वर्णन किया जाता है। यह
बात इस रूपमें प्रसिद्ध है कि दल्भ ऋषिके पुत्र बक अथवा
मित्राके पुत्र ग्लाव ऋषि स्वाध्याय करनेके लिये गाँवसे बाहर किसी
निर्जन स्थानमें गये। उक्त ऋषिपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ
श्वेत रंगका एक अलौकिक कुत्ता (कुत्तेके रूपमें ऋषि)
प्रकट हुआ। तत्पश्चात् दूसरे भी कई कुत्ते उस पहले प्रकट
हुए कुत्तेके पास आकर उससे बोले—'श्रीमान् उद्गीथका
गान करके हमारे लिये अन्न प्रस्तुत करें, क्योंकि हमलोग
निश्चित ही भूखे हैं।' उनसे वह श्वेत रंगका कुत्ता बोला—
'कल प्रातः इसी स्थानमें तुमलोग मेरे पास आना।' उनकी इस
बातको सुनकर दल्भपुत्र बक अथवा मित्रापुत्र ग्लाव ऋषि
कौतूहलसे भर गये और यह देखनेके लिये कि वह कुत्ता किस
प्रकार अन्न जुटाता है, वहीं उसके द्वारा निर्दिष्ट समयकी
प्रतीक्षा करने लगे ॥ १-३ ॥
निर्दिष्ट समयपर वे अलौकिक कुत्ते वहाँ एकत्रित हुए
और जिस प्रकार यज्ञकर्ममें उद्गाता बहिष्पवमान नामक स्तोत्र-
द्वारा स्तुति आरम्भ करनेसे पूर्व एक दूसरेसे मिलकर चलते
हैं, ठीक उसी प्रकार वे भी एक दूसरेसे जुड़कर परिभ्रमण
करने लगे, फिर उन्होंने एक जगह आरामसे बैठकर
हिंकार आरम्भ किया। अर्थात् 'हिं' स्तोभ* का प्रयोग
करते हुए साम-गान आरम्भ किया। गान इस आशयका था—
'हे सबकी रक्षा करनेवाले परमात्मन् ! हम भोजन और
जलपानके इच्छुक हैं। परमात्मन् ! आप प्रकाशस्वरूप देव
हैं, अभीष्ट वस्तुकी वर्षा करनेवाले वरुण हैं, समस्त प्रजाका
पालन करनेवाले प्रजापति हैं और सबको उत्पन्न करनेवाले
सविता हैं। अत हमारे लिये यहाँ अन्न ला दीजिये। हे अन्नके
स्वामी ! यहाँ अन्न लाइये, परमेश्वर ! यहाँ अन्न प्रस्तुत
कीजिये' ॥ ४-५ ॥
त्रयोदश खण्ड
तेरह प्रकारके स्तोभोंका वर्णन
इस प्रकरणमें बताये जानेवाले तेरह प्रकारके स्तोभोंमें
निश्चय ही 'हाउ' शब्द मनुष्यलोकका वाचक है, 'हाइ'
वायुलोक है, 'अथ' चन्द्रलोक है, 'इह' आत्मा है और
'ईं' अग्निरूप है। इनके अतिरिक्त 'ऊ' सूर्यरूप है, 'ए'
आवाहनका बोधक है, 'औहोयि' विश्वेदेवा हैं, 'हिं' प्रजापति-
स्वरूप है, 'स्वर' प्राणरूप है, 'या' अन्नरूप है तथा 'वाक्'
विराट्रूप है। तेरहवाँ और अन्तिम स्तोभ 'हुं' है, वह सबमें
व्याप्त रहनेवाला वर्णनातीत निर्विशेष ब्रह्म है ॥ १-३ ॥
जो सामके रहस्यको जान लेता है, उसके लिये वाणी स्वयं
अपना रहस्य प्रकट कर देती है। वह भोग-सामग्रीसे तथा
उसे भोगनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

  • साम-गान करते समय उसके स्वर और लयकी पूर्तिके लिये जो 'हा ३ उ' आदि तेरह प्रकारके शब्द उपयोगमें लाये जाते
    हैं, उन्हें 'स्तोम' कहते हैं। इनका अर्थ अगले खण्डमें बताया गया है। 'हिं' प्रजापतिरूप है और प्रजापति ही अन्नका स्वामी है, इसलिये
    उनकी प्रार्थनामें 'हिं'का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय अध्याय

ॐ
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
साधु-दृष्टिसे समस्त सामकी उपासना
ॐ समस्त सामकी उपासना निश्चय ही साधु है। जो ऐसा भी कहते हैं कि हमारा साम ( शुभ ) हुआ। अर्थात्
साधु होता है, उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है, जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते
वह असाम कहलाता है। इसी विषयमे कहते हैं—[ जब कहा हैं, और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात्
जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास साम- जब अशुभ होता है तो 'अरे ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं।
द्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसे इस प्रकार जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' ऐसी
इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] उपासना करता है, उसके समीप साधु धर्म शीघ्र ही आ
वह इसके पास असामद्वारा गया तो [इससे] लोग यही कहते जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ १-४॥
हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ। इसके अनन्तर
द्वितीय खण्ड
पञ्चविध सामोपासना
लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है
पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, और पृथ्वी निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष
आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है—इस प्रकार लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है, उसके प्रति ऊर्ध्व
ऊपरके लोकोंमें सामदृष्टि करे । अब अधोगत लोकोंमें और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ॥ १-३ ॥
सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है,
तृतीय खण्ड
वृष्टिमें सामोपासना
वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। पूर्ववायु जल ग्रहण करता है यह निधन है। जो इसे ( इस उपासनाको )
हिंकार है, मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है, बरसता है यह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी
उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी
उद्गीथ है, चमकता और गर्जन करता है यह प्रतिहार है, वर्षा करा लेता है ॥ १-२ ॥
चतुर्थ खण्ड
जलमें सामोपासना
सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । प्रतिहार है और समुद्र निधन है। जो इसे इस प्रकार
मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है यह हिंकार है, वह जो जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी
बरसता है यह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलवान्
हैं वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती है वह होता है ॥ १-२ ॥
पञ्चम खण्ड
ऋतुओंमें सामोपासना
ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। वसन्त पुरुष ऋतुओमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे
हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान्
है और हेमन्त निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला (ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न) होता है ॥ १-२ ॥

४१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

४१६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय २
षष्ठ खण्ड
पशुओंमें सामोपासना
पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे वाला पुरुष पशुओंमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना
हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव है, गौएँ उद्गीथ है, अश्व प्रतिहार करता है उसे पशु प्राप्त होते ह और वह पशुमान्
हैं और पुरुष निधन है। जो इसे इस प्रकार जानने- होता है ॥ १-२ ॥
सप्तम खण्ड
प्राणोंमें सामोपासना
प्राणोंमें पाँच प्रकारकेपरोवरीय गुणविशिष्ट सामकी उपासना वाला पुरुष प्राणोंमे पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी
करे। उनमें प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता
श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है। यह
परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) हैं। जो इसे इस प्रकार जानने- पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ १-२ ॥
अष्टम खण्ड
वाणीमें सप्तविध सामोपासना
अब सप्तविध सामकी उपासना [ प्रारम्भ की जाती ] 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा
है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें शब्दरूप है वह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला
जो कुछ 'हुं' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' पुरुष वाणीमें सात प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे
ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार) है उसे देती है तथा
है वह आदि है, जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है ॥१-३॥
है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ
नवम खण्ड
आदित्य-दृष्टिसे सप्तविध सामोपासना
अब निश्चय ही इस आदित्यकी दृष्टिसे सप्तविध सामकी अनुगत पक्षिगण है। क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन
उपासना करनी चाहिये । आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमे अपनेको निराधाररूपसे
वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा होनेके कारण वह सब ओर ले जाते हैं। तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका
सबके प्रति सम है, इसलिये साम है। उस आदित्यमें ये रूप होता है वह उद्गीथ है। इसके उस रूपके देवता लोग
सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने । जो उस आदित्यके अनुगत हैं। इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें
उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी है।
उसके पशु अनुगत हैं, इसीसे वे हिंकार करते हैं। अत वे ही तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व
इस आदित्यरूप सामके हिंकार भाजन हैं। तथा सूर्यके पहले- होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ
पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है। उसके हैं। इसीसे वे ऊपरकी ओर आकृष्ट किये जानेपर नीचे नहीं
उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं अत वे प्रस्तुति (प्रत्यक्षस्तुति) गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं। तथा
और प्रशांस (परोक्षस्तुति) की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता
इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं। तत्पश्चात् है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु है।
आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें (सूर्योदयके तीन मुहूर्त इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग
पश्चात् कालमे) रहता है वह आदि है। उसके उस रूपके जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं।

खण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१७
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन
है । उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [ श्राद्ध-
कालमें ] उन्हें [ पितृ पितामह आदि रूपसे दर्भपर ] स्थापित
करते हैं, क्योंकि वे पितृगण निश्चय ही इस सामकी निधन-
भक्तिके पात्र है। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सात प्रकारके
सामकी उपासना करते है ॥ १-८ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना
अब निश्चय ही [ यह बतलाया जाता है कि ] अपने
समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
करे । 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी
तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है। 'आदि' यह दो
अक्षरोंवाला नाम है, और 'प्रतिहार' यह चार अक्षरोंवाला
नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे
समान हो जाते हैं। 'उद्गीथ' यह तीन अक्षरोंका और
'उपद्रव' यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनो तीन-तीन
अक्षरोंमें तो समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः
[ 'अक्षर' होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह
[ एक ] भी उनके समान ही है। 'निधन' यह नाम तीन
अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस
अक्षर हैं। इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोक प्राप्त
करता है, क्योंकि इस लोकसे आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है।
बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं
शोकरहित लोकको जीत लेता है। [ वह पुरुष ] आदित्यलोक-
की जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्यविजयसे भी उत्कृष्ट
जय प्राप्त होती है। जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला
होकर आत्मसमित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी
उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ १-६ ॥
एकादश खण्ड
गायत्र-सामोपासना
मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र
प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसञ्ज्ञक साम
प्राणोंमें प्रतिष्ठित है । वह, जो इस प्रकार गायत्रसञ्ज्ञक
सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है,
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता
है, प्रजा और पशुओंद्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके
द्वारा भी महान् होता है। वह महान् मनस्वी होवे—यही
उसका व्रत है ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
रथन्तर-सामोपासना
अभिमन्थन करता है यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है
यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं
यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है यह निधन है और
सर्वथा शान्त हो जाता है यह भी निधन है। यह रथन्तरसाम
अग्निमें प्रतिष्ठित है। वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तर-
सामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और
अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता
है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। अग्निकी ओर मुख
करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
वामदेव्य-सामोपासना
स्त्री-पुरुषका संकेत हिंकार है, पारस्परिक सन्तोष प्रस्ताव
है, सहशयन उद्गीथ है, अभिमुखशयन प्रतिहार है, समाप्ति
निधन है, इस प्रकार जोड़ेसे वामदेव्यसामकी उपासना की
जाती है। वह, जो पुरुष इस प्रकार मिथुनमें वामदेव्यसामको
स्थित जानता है, सदा जोड़ेसे रहता है, उसका कभी वियोग
नहीं होता, मिथुनीभावसे उसके सन्तान उत्पन्न होती है। वह
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण महान् होता है। किसी भी पर-स्त्रीका कभी कहींसे भी
अपहरण न करे, कदापि व्यभिचारी न हो—यह व्रत है ॥१-२॥

४१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय २

४१८ * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय २
चतुर्दश खण्ड
बृहत्सामोपासना
उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव
है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्नकालिक प्रतिहार
है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है वह निधन है।
यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है। वह पुरुष, जो इस प्रकार
इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और
अन्नका भोग करनेवाला होता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और
पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी
महान् होता है। तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
पञ्चदश खण्ड
वैरूप-सामोपासना
बादल एकत्रित होते हैं यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता
है यह प्रस्ताव है। जल बरसता है यह उद्गीथ है। बिजली
चमकती और कड़कती है यह प्रतिहार है तथा दृष्टिका उप-
संहार होता है यह निधन है। यह वैरूपसाम मेघमें अनुस्यूत
है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूपसामको पर्जन्यमें
अनुस्यूत जानता है, विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध
करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत
करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा
कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न
करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
षोडश खण्ड
वैराज-सामोपासना
वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद्
ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराजसाम ऋतुओं-
में अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराजसामको
ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके
कारण शोभित होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी
निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
सप्तदश खण्ड
शक्वरी-सामोपासना
पृथ्वी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है,
दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शक्वरीसाम
लोकोंमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शक्वरी-
सामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है। वह
सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
अष्टादश खण्ड
रेवती-सामोपासना
बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े
प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें
अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको
पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है। वह पूर्ण
आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है,
प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण
भी महान् होता है। पशुओंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १ २ ॥

खण्ड २२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१९
एकोनविंश खण्ड
यज्ञायज्ञीय-सामोपासना
लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मास उद्गीथ है, अस्थि टेढा-मेढ़ा नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल
प्रतिहार है और मज्जा निधन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। वर्ष भरतक
अनुस्यूत है । वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको मासभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा कभी भी मासभक्षण
अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है, अङ्गवान् होता है। वह अङ्गोंसे न करे—ऐसा व्रत है ॥ १-२ ॥
विंश खण्ड
राजन-सामोपासना
अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, सालोक्य, साष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो
जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन
नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजन साम व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है
देवताओंमे अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न
राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओके करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
एकविंश खण्ड
सबमें अनुस्यूत सामकी उपासना
त्रयीविद्या हिंकार है, ये तीन लोक प्रस्ताव हैं, अग्नि, विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये
वायु और आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है।
ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ
सामोपासना सर्वमें अनुस्यूत है। वह, जो इस प्रकार सबमें बलि समर्पित करती हैं। 'मै सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना
अनुस्यूत इस सामको जानता है, सर्वरूप हो जाता है। इस करे—यह व्रत है, यह व्रत है ॥ १-४ ॥
द्वाविंश खण्ड
अग्नि-सम्बन्धी उद्गीथ
सामके 'विनर्दि' नामक गानका वरण करता हूँ, वह कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे
पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ कहे कि 'मैं इन्द्रके शरणागत हूँ वही तुझे इसका उत्तर देगा।'
है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोम निरुक्त है, वायुका और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे
मृदुल और श्लक्ष्ण (सरलतासे उच्चारण किये जाने योग्य) तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था वही तेरा मर्दन
है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पतिका क्रौञ्च करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमे उलाहना दे
(क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान) है और वरुणका अपध्वान्त तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे
(भ्रष्ट) है। इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे, केवल वरुण- दग्ध करेगा।' सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण
सम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे। मै देवताओंके लिये किये जाने चाहिये, अत. [उनका उच्चारण करते समय]
अमृतत्वका आगान (साधन) करूँ—इस प्रकार चिन्तन 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना
करते हुए आगान करे । पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एव विवृतरूपसे
लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन
जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका करना चाहिये कि] 'मै प्रजापतिको आत्मदान करूँ।' समस्त
आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए स्पर्शवर्णोंको एक-दूसरेसे तनिक भी मिलाये विना ही बोलना
प्रमादरहित होकर स्तुति करे। सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, चाहिये और उस समय 'मै मृत्युसे अपना परिहार करूँ'
समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके [ऐसा चिन्तन करना चाहिये] ॥ १-५ ॥
-आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि

: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २

: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २

त्रयोविंश खण्ड
धर्मके तीन स्कन्ध, ओंकारकी सर्वरूपता

धर्मके तीन स्कन्ध हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह
पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें
रहनेवाला ब्रह्मचारी, जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त
क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है । ये सभी पुण्यलोकके
भागी होते हैं। ब्रह्ममे सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी
सन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है। प्रजापतिने लोकोंके
उद्देश्यसे ध्यानरूप तप किया। उन अभितप्त लोकोंसे त्रयी
विद्याकी उत्पत्ति हुई तथा उन अभितप्त त्रयी विद्यामे 'भूः,
भुव और स्व' ये अक्षर उत्पन्न हुए। [फिर प्रजापतिने ]
उन अक्षरोंका आलोचन किया। उन आलोचित अक्षरोंसे
ओङ्कार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार शङ्कुओ (नसों) द्वारा
सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे सम्पूर्ण वाणी
व्याप्त है। ओंकार ही यह सब कुछ है—ओंकार ही यह सब
कुछ है ॥ १-३ ॥

चतुर्विंश खण्ड
तीनों कालका सवन

ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसवन
रुद्रोंका है तथा तृतीय सवन आदित्य और विश्वेदेवोंका है। तो
फिर यजमानका लोक कहाँ है? जो यजमान उस लोकको नहीं
जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्ठान करेगा ? अतः उसे
जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥ १-२ ॥

प्रातग्नुवाकका आरम्भ करनेसे पूर्व वह (यजमान)
गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवता-
सम्बन्धी सामका गान करता है। [ हे अग्ने ! ] तुम इस
लोकका द्वार खोल दो, जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये
तुम्हारा दर्शन कर लें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ]
हवन करता है—पृथिवीमे रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको
नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [पृथिवी ] लोककी प्राप्ति
कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त
करनेवाला हूँ। इस लोकमे यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके
अनन्तर [ पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर
हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला) को नष्ट करो' ऐसा
कहकर उत्थान करता है । वसुगण उसे प्रातः सवन प्रदान
करते हैं ॥ ३-६ ॥

मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके
पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान
करता है। [ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल
दो जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन
कर सकें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता
है—'अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको
नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [अन्तरिक्ष ] लोककी
प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे
प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर
[ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन
करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर
उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं
॥ ७-१० ॥

तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके
पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी
सामका गान करता है। लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम
स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह
आदित्यसम्बन्धी साम है, अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते
हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये
तुम्हारा दर्शन कर सकें। तत्पश्चात् [यजमान इस मन्त्रद्वारा ]
हवन करता है—स्वर्गमे रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको
और विश्वेदेवोंको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम
पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक
है, मै इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त
होनेपर [मै इसे प्राप्त करूँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन
करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर
उत्थान करता है। उस (यजमान) को आदित्य और
विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता
है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा
(यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ ११-१६ ॥

॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अध्याय

ॐ
तृतीय अध्याय
प्रथम खण्ड
आदित्यकी मधुरूपमें कल्पना
ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है । द्युलोक अमृत ही जल हे । उन इन ऋक् [ -रूप मधुकरो ] ने ही
ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ इस ऋग्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश,
है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमे रहनेवाले ] तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । वह
मक्खियोंके बच्चे हैं । उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणे ( यश आदि रस ) विशेषरूपमे गया । उसने [ जाकर ]
हैं, वे ही इस ( अन्तरिक्षरूप छत्ते ) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र आदित्यके [ पूर्व ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका
हैं । ऋक् ही मधुकर हे, ऋग्वेद ही पुष्प है, वे मोम आदि लाल रूप है, वही यह ( रस ) है ॥ १-४ ॥
द्वितीय खण्ड
आदित्यकी दक्षिणस्थित किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणे ह, वे ही इसकी अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप
दक्षिणदिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजु श्रुतियाँ ही मधुकर ह, रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और
यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। आदित्यके [दक्षिण] भागमे आश्रय लिया। यह जो आदित्यका
उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस शुक्ल रूप है, यह वही है ॥ १-३ ॥
तृतीय खण्ड
पश्चिम ओरकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी अभिताप किया । उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज,
पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर ह, सामवेद- इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने
विहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके [ पश्चिम ] भागमे
जल है । उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है, यह वही है ॥१-३॥
चतुर्थ खण्ड
उत्तर दिशाकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं, वे ही इसकी पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और
उत्तर दिशाकी मधुनाडियाँ है। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई । उस रसने विशेषरूपसे
हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] गमन किया और आदित्यके [ उत्तर ] भागमे आश्रय
अमृत ही जल है। उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस लिया । यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है, यह
इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [इतिहास- वही है ॥ १-३ ॥
पञ्चम खण्ड
ऊर्ध्वरश्मियोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं, वे ही इसकी ऊपरकी उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको
ओरकी मधुनाडियाँ है। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं, [ प्रणवरूप ] अभितप्त किया । उस अभितत्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय,
ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ। उस रसने विशेषरूपसे

४२२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
गमन किया और वह आदित्यके [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृर्तोंके
हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध सा होता है यही वह अमृत हैं--वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत
(मधु) है। वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं ॥ १-४ ॥
षष्ठ खण्ड
वसुओंके जीवनाधार प्रथम अमृतकी उपासना
इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको
होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित
पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। होता है। जितने समयमे आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है
वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और पश्चिम दिशामे अस्त होता है, उतनी ही देर वह
और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस
अमृतको जानता है, वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी वसुओके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
सप्तम खण्ड
रुद्रोंके जीवनाधार द्वितीय अमृतकी उपासना
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। है। जितने समयमे आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और अस्त होता है, उससे दुगुने समयमे वह दक्षिणसे उदित होता
इसीसे उद्यमशील होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको है और उत्तरमे अस्त हो जाता है। इतने समयपर्यन्त वह
जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे रुद्रोंके ही आधिपत्य एव स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
आदित्योंके जीवनाधार तृतीय अमृतकी उपासना
तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही
होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है। वह
खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो आदित्य जितने समयमे दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमे
जाते हैं। वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और अस्त होता है, उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और
इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता पूर्वमें अस्त होता है। इतने समय वह आदित्योंके ही आधिपत्य
है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
नवम खण्ड
मरुतोंके जीवनाधार चतुर्थ अमृतकी उपासना
तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है। वह आदित्य
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। जितने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे है, उससे दूनी देरमें उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त
उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता है, होता है। इतने काल वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और
मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥