कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४१८ * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय २
चतुर्दश खण्ड
बृहत्सामोपासना
उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव
है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्नकालिक प्रतिहार
है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है वह निधन है।
यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है। वह पुरुष, जो इस प्रकार
इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और
अन्नका भोग करनेवाला होता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और
पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी
महान् होता है। तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
पञ्चदश खण्ड
वैरूप-सामोपासना
बादल एकत्रित होते हैं यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता
है यह प्रस्ताव है। जल बरसता है यह उद्गीथ है। बिजली
चमकती और कड़कती है यह प्रतिहार है तथा दृष्टिका उप-
संहार होता है यह निधन है। यह वैरूपसाम मेघमें अनुस्यूत
है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूपसामको पर्जन्यमें
अनुस्यूत जानता है, विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध
करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत
करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा
कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न
करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
षोडश खण्ड
वैराज-सामोपासना
वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद्
ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराजसाम ऋतुओं-
में अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराजसामको
ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके
कारण शोभित होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी
निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
सप्तदश खण्ड
शक्वरी-सामोपासना
पृथ्वी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है,
दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शक्वरीसाम
लोकोंमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शक्वरी-
सामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है। वह
सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
अष्टादश खण्ड
रेवती-सामोपासना
बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े
प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें
अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको
पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है। वह पूर्ण
आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है,
प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण
भी महान् होता है। पशुओंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १ २ ॥