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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय

ॐ
द्वितीय अध्याय
सम्बन्ध—प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतरूपसे
कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है । अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न
करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है—
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतः तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं
बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनञ्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥
अयम् = यह (संसारी जीव) ह = निश्चयपूर्वक आदितः = पहले-पहल पुरुषे = पुरुष-शरीरमे वै = ही गर्भः भवति =
वीर्यरूपसे गर्भ बनता है यत् = जो एनत् = यह (पुरुषमें) रेतः = वीर्य है तत् = वह एतत् = यह (पुरुषके)
सर्वेभ्यः = सम्पूर्ण अङ्गेभ्यः = अङ्गोंसे सम्भूतम् = उत्पन्न हुआ तेजः = तेज है आत्मानम् = ( यह पुरुष पहले तो )
अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यरूप तेजको आत्मनि = अपने शरीरमे एव = ही बिभर्ति = धारण करता है ( फिर )
यदा = जब (यह) तत् = उसको स्त्रियाम् = स्त्रीमे सिञ्चति = सिंचन करता है, अथ = तब एनत् = इसको,
जनयति = गर्भरूपमे उत्पन्न करता है तत् = वह अस्य = इसका प्रथमम् = पहला जन्म = जन्म है ॥ १ ॥
व्याख्या—यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमे (पिताके शरीरसे) वीर्यरूपमे गर्भ बनता है—प्रकट होता है ।
पुरुषके शरीरमे जो यह वीर्य है वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने
स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमे ही धारण-पोषण करता है—ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है;
फिर जब वह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिंचन (स्थापित) करता है, तब उसे गर्भरूपमे उत्पन्न करता है। वह माताके शरीरमें
प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥
तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति । यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । सास्यैतमात्मानमत्र-
गतं भावयति ॥ २ ॥
तत् = वह (गर्भ) स्त्रियाः = स्त्रीके आत्मभूतम् = आत्मभावको गच्छति = प्राप्त हो जाता है यथा = जैसे,
स्वम् = अपना अङ्गम् = अङ्ग होता है तथा = वैसे ही (हो जाता है), तस्मात् = इसी कारणसे एनाम् = इस स्त्रीको,
न हिनस्ति = वह पीड़ा नहीं देता, सा = वह स्त्री (माता), अत्रगतम् = यहाँ (अपने शरीरमें) आये हुए, अस्य = उस
( अपने पति ) के आत्मानम् = आत्मरूप (स्वरूपभूत) एतत् भावयति = इस गर्भका पालन-पोषण करती है ॥ २ ॥
व्याख्या—उस स्त्री (माता) के शरीरमे आया हुआ वह गर्भ—पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके
आत्मभावको प्राप्त हो जाता है—अर्थात् जैसे उसके दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा
ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको पीड़ा नहीं पहुँचाता—उसे
भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमे आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही
भोजनके रससे पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है ॥२॥
सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधि-
भावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या । एवं
सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
सा = वह भावयित्री = उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री. भावयितव्या = पालन-पोषण करनेयोग्य,

३०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको, अग्रे=प्रसवके पहलेतक, स्त्री=स्त्री (माता), बिभर्ति=धारण करती है;
जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद, सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले, एव=ही; कुमारम्=उस
कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है, सः=वह (पिता);
यत्=जो, जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद, अग्रे [एव]=पहले ही, कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता
है; तत्=वह, (मानो) एषाम्=इन, लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको), संतत्या=बढ़ानेके द्वारा, आत्मानम् एव
भावयति=अपनी ही उन्नति करता है, हि=क्योंकि, एवम्=इसी प्रकार, इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य);
संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं, तत्=वह, अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा, जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥
व्याख्या-अपने पतिस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और
विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि
वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले
अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है, फिर जन्म लेनेके बाद--जन्म लेते ही वह उसका
पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर
जबतक वह सर्वथा योग्य न बन जाय, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन पोषण करता है--नाना प्रकारकी विद्या और
शिल्पाद्दिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके
पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको
बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है, क्योंकि इसी प्रकार एक-से एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं।
यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है।
इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि
उसपर अपने माता पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है। और पिताको इस
प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वर यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि
करके अपने कर्तव्यका पालन किया है ॥ ३ ॥
सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स
इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥
सः=वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ), अयम्=यह, आत्मा=(पिताका ही) आत्मा, अस्य=इस पिताके (द्वारा
आचरणीय); पुण्येभ्यः=शुभकर्मोंके लिये; प्रतिधीयते=उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है, अथ=उसके अनन्तर;
अस्य=इस (पुत्र) का; अयम्=यह (पितारूप); इतरः=दूसरा, आत्मा=आत्मा; कृतकृत्यः=अपना कर्तव्य पूरा करके;
वयोगतः=आयु पूरी होनेपर, प्रैति=(यहाँसे) मरकर चला जाता है, सः=वह; इतः=यहाँसे, प्रयन्=जाकर; एव=ही;
पुनः=पुनः; जायते=उत्पन्न हो जाता है, तत्=वह, अस्य=इसका, तृतीयम्=तीसरा, जन्म=जन्म है ॥ ४ ॥
व्याख्या-पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करने योग्य हो जाता है, तब वह
पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है--अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी
शुभ कर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है।
अर्थात् अपनेको पितृ ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे
विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है।
इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है।
जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टकी आलोचना करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें
चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस
प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

  • ऐतरेयोपनिषद् * ३०९ -
    सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है, और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझ-
    कर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा, तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा-
    यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है-
    तदुक्तमृषिणा-
    गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ।
    शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति ।
    गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५॥
    तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा, उक्तम् = कही गयी है; नु=अहो, अहम् = मैंने, गर्भे =
    गर्भमें, सन् = रहते हुए ही, एषाम् = इन, देवानाम् = देवताओंके, विश्वा = बहुत से, जनिमानि = जन्मोंको, अन्ववेदम् =
    भलीभाँति जान लिया, मा= मुझे, शतम् = सैकड़ों, आयसीः = लोहेके समान कठोर, पुरः = शरीरोंने, अरक्षन् = अवरुद्ध कर
    रक्खा था, अधः = अब (मै), श्येनः = बाज पक्षी (की भाँति), जवसा = वेगसे, निरदीयम् इति = उन सबको तोड़कर उनसे
    अलग हो गया हूँ, गर्भे = गर्भमें, एव = हीः शयानः = सोये हुए, वामदेवः = वामदेव ऋषिने; एवम् = उक्त प्रकारसे; एतत् =
    यह बात, उवाच = कही ॥ ५ ॥
    व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात्
    गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था- 'अहो !
    कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्त करण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका
    रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके
    ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर
    रक्खा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी
    भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध
    नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ ॥ ५ ॥
    स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत्
    समभवत् ॥ ६ ॥
    एवम् = इस प्रकार, विद्वान् = (जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः = वह वामदेव ऋषि, अस्मात् = इस;
    शरीरभेदात् = शरीरका नाश होनेपर, ऊर्ध्वः उत्क्रम्य = संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा, अमुष्मिन् = उस,
    स्वर्गे लोके = परमधाममें (पहुँचकर), सर्वान् = समस्त, कामान् = कामनाओंको, आप्त्वा = प्राप्त करके, अमृतः = अमृत;
    समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ६ ॥
    व्याख्या-इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है,
    शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको बार-बार नाना योनियोंमें
    जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं-इस रहस्यको समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर
    अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्‌के परमधाममें पहुँचकर वहाँ समस्त
    कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया ! अमृत हो गया ! जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट
    गया। 'समभवत्' पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है ॥ ६ ॥
    ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥