कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४०८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ १
उद्गीथकी उपासना की थी । परंतु लोग इस प्राणको ही 'आयास्य'
मानते हैं, क्योंकि यह आस्य अर्थात् मुखके द्वारा आता-जाता
है । दल्भके पुत्र वक नामक ऋषिने प्राणकी उपासनारूप
साधनसे उद्गीथ अर्थात् ओंकारके अर्थरूप परमात्माको जाना
था । वे प्रसिद्ध ऋषि नैमिषारण्यमे यज्ञ करनेवाले ऋषियोंके
उद्गाता हुए थे और उन्होंने इन यज्ञ करनेवालोंके लिये
उनकी कामना पूर्तिके उद्देश्यसे उद्गीथका गान किया था ।
प्राणके महत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला जो उपासक अक्षर-
ओंकाररूप उद्गीथकी उपासना करता है, वह निस्संदेह ओंकारके
गानद्वारा अपनी मनोवाञ्छित वस्तुको आकर्षित करनेमें समर्थ
होता है । इस प्रकार अध्यात्मविषयक--शरीरसे सम्बन्ध रखने-
वाली उपासनाका प्रकरण समाप्त हुआ ॥ १०-१४ ॥
तृतीय खण्ड
ओंकारकी आधिदैविक उपासना
अब ओंकारकी आधिदैविक उपासनाका वर्णन किया जाता
है। जो यह सूर्य तपता है, उसीकी उद्गीथके रूपमे उपासना करनी
चाहिये । यह सूर्य उदय होते ही मानो समस्त प्रजाके लिये
अन्न आदिकी उत्पत्तिके उद्देश्यसे उद्गान करता है-उनकी
उन्नतिमें कारण बनता है, इसीलिये यह 'उद्गीथ' है । इतना
ही नहीं, यह उदय होते ही अन्धकार और भयका नाश कर
देता है । अतः जो इस प्रकार सूर्यके प्रभावको जानता है, वह
स्वयं जन्म मृत्युके भय एव अज्ञानरूप अन्धकारका नाशक
बन जाता है ॥ १ ॥
यह प्राण और वह सूर्य दोनों समान ही हैं; क्योकि यह
मुख्य प्राण उष्ण है और सूर्य भी गरम है । इस प्राणको लोग
'स्वर' ( क्रियाशक्तिसम्पन्न ) कहकर पुकारते हैं और उस
सूर्यको 'स्वर' ( स्वयं क्रियाशक्तिवाला ) एव 'प्रत्यास्वर'
( दूसरोंको क्रियाशक्ति प्रदान करनेवाला ) दोनो नामोसे पुकारते
हैं । इसीलिये इस प्राण एव उस सूर्यके रूपमें उस उद्गीथकी
उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥
इसके बाद दूसरे प्रकारकी उपासना बतलायी जाती है ।
व्यानके रूपमें भी उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये । मनुष्य
जो श्वासके द्वारा भीतरकी वायुको बाहर निकालता है,
वह प्राण है, और जो बाहरकी वायुको भीतर ले जाता है, वह
अपान है । तथा जो प्राण और अपानकी संधि है, अर्थात्
जिसमें ये दोनों मिल जाते हैं, वह व्यान है । जो व्यान है,
वही वाणी है* । इसीलिये मनुष्य श्वासको बाहर निकालने
और भीतर खींचनेकी क्रिया न करता हुआ ही वाणीका स्पष्ट
उच्चारण करता है । अर्थात् सामान्यतया बोलते समय श्वास-
प्रश्वासकी क्रिया बंद हो जाती है ॥ ३ ॥
जो वाणी है, वही ऋचा है, इसलिये मनुष्य प्राण और
अपानकी क्रिया न करता हुआ ही वेदकी ऋचाओका भली-
भाँति उच्चारण करता है । जो ऋचा है, वही साम है, क्योंकि
'ऋक्'का ही अशविशेष साम है । इसलिये मनुष्य प्राण और
अपानकी क्रिया न करता हुआ ही सामका गान करता है ।
जो साम है, वही उद्गीथ है; क्योंकि सामका ही मुख्य भाग
'उद्गीथ' है । इसलिये मनुष्य प्राण और अपानकी क्रिया न
करता हुआ ही उच्चस्वरसे उद्गीथका गान करता है । अर्थात्
तीनोंमे ही व्यानकी ही प्रधानता है । व्यान ही तीनोंका आधार
है । इनके अतिरिक्त जो विशेष सामर्थ्यकी अपेक्षा रखनेवाले
कर्म है--जैसे काष्ठ मन्थनद्वारा अग्निको प्रकट करना, एक
नियत सीमातक दौड़ लगाना, कठोर धनुषको खींचना इत्यादि-
इन सबको मनुष्य प्राण और अपानकी क्रियाको रोककर व्यानके
बलसे ही करता है । इस प्रकार व्यानकी श्रेष्ठता सिद्ध हो
जानेके कारण व्यानके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना करनी
चाहिये ॥ ४-५ ॥
अब एक और प्रकारकी उपासना बतायी जाती है। वह यह
है कि 'उद्गीथ' शब्दके जो तीन अक्षर हैं, उनके रूपमें उद्गीथ
शब्दवाच्य परमात्माकी उपासना करनी चाहिये । इनमें पहला
'उत्' ही प्राण है, क्योंकि मनुष्य प्राणसे ही उत्थान करता है
और 'उत्' उत्थानका वाचक है । दूसरा 'गी' वाणीका द्योतक
है, क्योकि वाणीको 'गीः' इस नामसे पुकारते हैं । और तीसरा
'थ' अन्नका वाचक है, क्योंकि यह समस्त जगत् अन्नके ही
आधार स्थित है और 'थ' स्थितिका बोधक है । 'उत्' ही
स्वर्गलोक है, 'गी' अन्तरिक्षलोक है और 'थ' भूलोक है ।
'उत्' ही आदित्य है, 'गी' वायु है और 'थ' अग्नि है । 'उत्'
ही सामवेद है, 'गी' यजुर्वेद है और 'थ' ऋग्वेद है । इस
- प्रथम खण्डमें जिस प्राणकी वाणी और ऋचाके साथ एकता
की गयी है, वही प्राण यहाँ व्यानके नामसे कहा गया है । वहाँ
'प्राण' शब्दसे प्राणके समष्टिरूपका वर्णन है, केवल श्वासको बाहर
निकालनेकी क्रियाका नाम ही वहाँ प्राण नहीं है-यह बात
ध्यानमें रखनी चाहिये ।