कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
४३० * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ४
'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी
इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें।
मैंने श्रीमान् जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या
ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी
विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून
नहीं हुआ [अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ १-३ ॥
दशम खण्ड
उपकोसलको अग्नियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश
उपकोसल नामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके
यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक
उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की, किंतु आचार्यने अन्य
ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल
इसीका नहीं किया। आचार्यसे उसकी भार्या ने कहा- 'यह
ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियों-
की सेवा की है। देखिये, अग्नियां आपकी निन्दा न करें। अतः
इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किंतु वह उसे उपदेश
किये बिना ही बाहर चला गया। उस उपकोसलने मानसिक
खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने
कहा- 'अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन
करता ?' वह बोला-'माताजी ! इस मनुष्यमें अनेक ओर
जानेवाली बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मैं व्याधियोंसे परिपूर्ण
हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा' ॥ १-३ ॥
फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा- 'यह ब्रह्मचारी
तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है।
अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले-
'प्राण' ब्रह्म है, 'कं' ब्रह्म है, 'खं' ब्रह्म है। वह बोला-'यह
तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को
नहीं जानता।' तब वे बोले- 'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख'
है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे
प्राण और उसके [आश्रयभूत] आकाशका उपदेश किया ॥४-५॥
एकादश खण्ड
अकेले गार्हपत्याग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी- 'पृथ्वी, अग्नि, अन्न
और आदित्य-ये मेरे चार शरीर हैं। आदित्यके अन्तर्गत जो
यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष,
जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको
नष्ट कर देता है, अभिलोकान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती
पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोकमें भी
पालन करते हैं ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
अन्वाहार्यपचन नामक दूसरे अग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे अन्वाहार्यपचनने शिक्षा दी- 'जल, दिशा,
नक्षत्र और चन्द्रमा-ये मेरे चार शरीर हैं। चन्द्रमामें जो यह
पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो
इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि)
की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान्
होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन
व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है
हम उसका इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
ॐ आहवनीय-अग्निद्वारा शिक्षा
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया- 'प्राण,
आकाश, द्युलोक और विद्युत्-ये मेरे चार शरीर हैं। यह
जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।'
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें
विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता
है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है, उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२॥
खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३१
चतुर्दश खण्ड
आचार्य और उपकोसलका संवाद
उन्होंने कहा—'उपकोसल ! सौम्य ! यह अपनी विद्या
और आत्मविद्या तेरे प्रति कही । आचार्य तुझे इसके फलकी
प्राप्तिका मार्ग बतलायेंगे ।' तदनन्तर उसके आचार्य आये ।
उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल !' उसने 'भगवन् !'
ऐसा उत्तर दिया । [ आचार्य बोले—] 'सौम्य ! तेरा मुख
ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?'
'गुरुजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो
उसे छिपाने लगा । [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके
बोला—] 'निश्चय इन्होंने उपदेश किया है जो अन्य प्रकारके
थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोको बतलाया ।
[ तब आचार्यने पूछा—] 'सौम्य ! इन्होंने तुझे क्या
बतलाया है ?' तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर
दिया । [ इसपर आचार्यने कहा—] 'हे सौम्य ! इन्होंने तो
तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है, अब मै तुझे वह
बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पाप-कर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध
नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह
बोला—'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे
बोले ॥ १-३ ॥
पञ्चदश खण्ड
आचार्यद्वारा उपदेश, ब्रह्मवेत्ताकी गतिका वर्णन
'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है, यह आत्मा है'—
ऐसा उसने कहा 'यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है। उस
( पुरुषके स्थानरूप नेत्र ) में यदि घृत या जल डाले तो वह
पलकोंमें ही चला जाता है। इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं,
क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसीको प्राप्त होती हैं;
जो इस प्रकार जानता है, उसे सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब
ओरसे प्राप्त होती हैं। यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण
वामोंका वहन करता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण
वामोंको वहन करता है। यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण
लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण
लोकोंमें भासमानी होता है ॥ १-४ ॥
अब [ श्रुति पूर्वोक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलाती है—]
इसके लिये शवकर्म करें अथवा न करें—वह अर्चि-अभिमानी
देवताको ही प्राप्त होता है। फिर अर्चि-अभिमानी देवतासे
दिवसाभिमानी देवताको, दिवसाभिमानीसे शुक्लपक्षाभिमानी
देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायणके छः मासोंको
प्राप्त होता है। मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको,
आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है।
वहाँसे अमानव पुरुष इसे ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह
देवमार्ग—ब्रह्ममार्ग है। इससे जानेवाले पुरुष इस मानव-
मण्डलमें नहीं लौटते, नहीं लौटते ॥ ५ ॥
षोडश खण्ड
पवनकी यज्ञरूपमें उपासना
यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ
निश्चय ही इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है, क्योंकि यह
गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है
इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग
हैं। इनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा सस्कार करता है
तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणीद्वारा दूसरे मार्गका
संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर
परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो
वह केवल एक मार्गका ही सस्कार करता है, दूसरा मार्ग नष्ट
हो जाता है। जिस प्रकार एक पैरसे चलनेवाला पुरुष अथवा
एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार
इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके
पश्चात् यजमानका नाश होता,है, इस प्रकारका यज्ञ करनेपर
वह और भी अधिक पापी हो जाता है। और यदि
प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे
पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो समस्त ऋत्विक् मिलकर दोनों
ही मागोंका सस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं
होता। जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा
दोनों पहियोंसे चलनेवाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार
इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी
स्थित रहता है। वह ऐसा यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥१—५॥
४३२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ४
सप्तदश खण्ड
यज्ञमें योग्य ब्रह्माकी आवश्यकता
प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया ।
उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले । पृथ्वीसे
अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको निकाला ।
फिर उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन
तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे
ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ।
तदनन्तर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया ।
उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक्-
श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन
रसोंको ग्रहण किया। उस यज्ञमें यदि ऋक्-श्रुतियोंके सम्बन्धसे
क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन
करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा
ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि
यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर
दक्षिणाग्निमे हवन करे । इस प्रकार वह यजुओंके रससे
यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है।
और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा
कहकर आहवनीयाग्निमे हवन करे। इस प्रकार वह सामके
रससे सामके वीर्यद्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतिकी पूर्ति करता
है। इस विषयमे ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लवण
(क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको,
त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको और लोहेसे काष्ठको अथवा
चमड़ेमे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक,
देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसन्धान किया
जाता है। जिसमे इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह
यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोद्वारा संस्कृत होता है। जहाँ
इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता
है। इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाया
प्रसिद्ध है कि 'जहाँ जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच
जाता है' ॥ १-९॥
एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें
घोड़ी योद्धाओकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला
ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब
ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही
ब्रह्मा बनाये, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवाले-
को नहीं ॥ १० ॥
॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥