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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

६१६ महोपनिषद् [ अध्याय ५

६१६ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५
थका सा विश्रामको प्राप्त हुआ । चिन्मात्रके अतिरिक्त और कुछ
है नहीं, इस प्रकार समझो । इस समस्त जागतिक लीलासे
विरत होकर तथा असन्दिग्ध भावसे चिन्मात्रको
देखो ॥ ४८-५९ ॥
'जिन्होंने सङ्कल्प-जालको निरस्त कर दिया है, जो चित्तत्व-
हीन परम पदको प्राप्त है, वे ही समस्त दोषोंसे निवृत्त हो ब्रह्म-
को प्राप्त करते हैं, जो विमनस्कताको प्राप्त हो चुके हैं, वे
शान्त चित्तवाले महाबुद्धिमान् हैं। वेदान्तविचारशील प्राणी,
जिनके चित्तकी वृत्तियाँ क्षीण हो गयी हैं, मनश्चिन्तनके
त्यागका अभ्यास करते-करते जिनका मन कुछ परिपक्व हो गया
है, जो मोक्षका उपाय खोजनेवाले पुरुष हेय तथा उपादेय-
दोनों प्रकारके दृश्योंका त्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात्
आत्मतत्त्वके साक्षात्कारमे लगे हैं तथा अद्रष्टा अर्थात्
प्रपञ्चको नहीं देखते, जो विशेषरूपसे ज्ञातव्य परम तत्त्वमें
जागरूक होकर जीवन धारण कर रहे हैं, जो रसमय तथा रस-
हीन पदार्थोंमें अत्यन्त परिपक्व वैराग्यके कारण घने मोहसे
युक्त संसार-पथमें सोये हुए हैं, वैराग्यकी तीव्रताके कारण पक्षीके
जालके समान जिनका संसार-वासनाका जाल टूट गया है तथा
हृदयकी ग्रन्थि शिथिल हो गयी है, ऐसे साधकोंका स्वभाव
विज्ञानके द्वारा उसी प्रकार सशुद्ध हो जाता है, जिस प्रकार
कातक (निर्मली) फलके द्वारा जल स्वच्छ हो जाता है।
मन जब रागादिहीन, अनासक्त, द्वन्द्वातीत तथा निरालम्ब
हो जाता है, तब वह पिंजड़ेसे छूटे हुए पक्षीके समान
मोहजालसे बाहर निकल जाता है । सन्देहरूप दुरात्मापन
जिनका शान्त हो गया है, जो प्रपञ्चात्मक कुतूहलसे विरत हैं,
उनका चित्त सब प्रकारसे पूर्ण होकर पूर्णचन्द्रके समान
सुशोभित होता है ॥ ६०-६८ ॥
'न मैं हूँ और न यहाँ दूसरा कुछ है, मैं सब दोषोंसे
रहित ब्रह्मस्वरूप हूँ- जो इस प्रकार सत् और असत्के
मध्यसे देखता है, वही वस्तुतः देखता है । जिस प्रकार सहज
ही प्राप्त हुए दर्शन, द्रष्टा तथा दृश्योंमें मन बिना रागके ही
जाता है, उसी प्रकार धीर बुद्धिवाले कर्तव्य कर्मोंमें बिना
आसक्तिके ही लगे रहते हैं। भलीभाँति जानकर भोगा गया
भोग उसी प्रकार तुष्टिका कारण बनता है, जिस प्रकार जानकर
सेवा किया गया चोर चोरी छोड़कर मैत्रीका ही निर्वाह
करता है। जिसकी मनमें शङ्का भी नहीं है, ऐसे गाँवके मार्गमे
आ जानेपर पथिक जिस दृष्टिसे उसे देखता है, उसी दृष्टिसे ज्ञानी
पुरुष भोगके ऐश्वर्योको देखते है। निग्रह किया हुआ मन
अनायास प्राप्त हुए थोड़े-से भी भोगको, जो विस्तार-
को नहीं प्राप्त हुआ है, क्लेशदायक होनेके कारण,
बहुत अधिक समझता है । बन्धनसे मुक्त हुआ राजा
भोजनके एक ग्रासमात्रसे सन्तुष्ट हो जाता है, परन्तु वह यदि
शत्रुके द्वारा आबद्ध न हो तथा आक्रान्त न हो तो राष्ट्र भी
उसके लिये उपेक्षणीय हो जाता है। हाथसे हाथको
समर्दितकर, दाँत से दाँत पीसकर तथा अङ्गोंसे अङ्गोंको
दबाकर, अर्थात् अपने सम्पूर्ण पराक्रम और उत्साहसे,
पहले मनपर विजय प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इस
संसार-समुद्रमे मनपर विजय करनेके अतिरिक्त कोई दूसरी
गति नहीं है । इस महानरकके साम्राज्यमे दुष्कृतरूपी
मतवाले हाथी घूम रहे हैं। आशारूपी बाणो और बरछोंसे सजे-
धजे इन्द्रियरूपी शत्रुओका जीतना दुष्कर है। जिन्होंने चित्तके
दर्पको नष्ट कर दिया है तथा इन्द्रियरूपी शत्रुओको वशमें कर
लिया है, उनकी भोग वासना उसी प्रकार नष्ट हो जाती
है, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमलका पौधा नष्ट हो जाता है। रात्रिमें
बेतालके समान हृदयमें वासनाका तभीतक निवास है,
जबतक एकाग्रताके अभ्यासद्वारा मनको जीत नहीं लिया
जाता। विवेकी पुरुषका मन अभीष्ट कार्य करनेके कारण
भृत्यके समान है, सारे प्रयोजनोंको सिद्ध करनेके कारण
मन्त्रीरूप है और मेरे विचारसे समस्त इन्द्रियोको वशमे
करनेके कारण सामन्तरूप है। मेरे विचारसे मनीषी पुरुषका
मन लालन करनेके कारण स्नेहशील ललनास्वरूप है तथा पालन
करनेके कारण पालन करनेवाला पिता है। मनरूपी पिता
शास्त्रदृष्टिसे तथा आत्मप्रकाश, आत्मबुद्धि एव आत्मानुभवके
द्वारा परम सिद्धिको प्रदान करता है । अत्यन्त हृष्ट,
अत्यन्त दृढ, स्वच्छ, भलीभाँति वशमें किया हुआ,
भलीभाँति जाग्रत्, आत्मगुणोंसे तेजस्वी बनाया हुआ मनोरम
मनरूपी मणि हृदयमें सुशोभित होता है । ब्रह्मन् !
भाँति-भाँतिके पङ्कोंसे मलिन इस मनरूपी मणिको
सिद्धिके लिये विवेकरूपी जलसे धोकर आलोकवान् बनो ।
श्रेष्ठ विवेकका आश्रय लेकर बुद्धिसे सत्यका साक्षात् (निश्चय)
करके, इन्द्रियरूपी शत्रुओंको पूर्णतः छिन्नकर संसार-सागर-
से पार हो जाओ ॥ ६९-८४ ॥
'केवल आस्थाको-संसारकी आशाको ही अनन्त दुःखोंका
कारण जानो, और सर्वत्र केवल अनास्थाको सुखका घर समझो ।
वासनाके सूत्रसे बँधा हुआ यह संसार बारबार होता है। वह
प्रसिद्ध वासना अत्यन्त दुःखका कारण बनती है और मनका

५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१७


उन्मूलन करनेके लिये आती है। जीव चाहे धीर हो, अत्यन्त बहुश्रुत हो, कुलीन हो, महान् हो, फिर भी वह तृष्णासे उसी प्रकार बँध जाता है, जैसे शृङ्खलासे सिंह बँध जाता है। परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर और भलीभाँति उद्यम करते हुए शास्त्रानुसार शान्तिपूर्वक आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिको नहीं प्राप्त करता । 'मैं ही अखिल विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे सिवा और कुछ नहीं है'—इस प्रकारके ज्ञानद्वारा होनेवाला अहम्भाव ही श्रेष्ठ है। 'मैं समस्त प्रपञ्चसे अतीत हूँ, बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म हूँ'—ब्रह्मन् ! इस प्रकारके ज्ञानसे जो अहङ्कार होता है, वह दूसरा शुभप्रद अहम्भाव है और वह मोक्षका कारण बनता है, बन्धनका नहीं । ऐसा अहम्भाव जीवन्मुक्त पुरुषोंको ही होता है । 'हाथ-पैर आदिसे युक्त यह शरीरमात्र मैं हूँ'—इस प्रकारका निश्चय तीसरा लौकिक अहङ्कार है और यह अत्यन्त तुच्छ है । यह अहङ्कारात्मक दुरात्मा जीव ही संसाररूपी दुःखद वृक्षका मूल है। इससे मारा गया प्राणी अधःपतनकी ओर ही दौड़ता है । इस दुःखद अहङ्कारको त्यागकर और चिरकालतक शुभ अहङ्कारकी भावनामें लगा हुआ प्राणी शमयुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। पहले कहे गये दो अलौकिक अहङ्कारोंको अङ्गीकार करके तीसरे दुःखद लौकिक अहङ्कारको त्याग देना चाहिये । पश्चात् उनको भी छोड़कर जो सब प्रकारके अहङ्कारोंसे रहित होकर स्थित है, वही उच्च पदको प्राप्त होता है ॥ ८५-९६ ॥

'भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है । मनकी उन्नति उसके विनाशमे है। मनोनाश महाभाग्यवान्‌का लक्षण है। ज्ञानी पुरुषके मनका नाश हो जाता है । अज्ञानीके लिये मन बन्धनरूप है । ज्ञानीका मन न आनन्दरूप है न आनन्दरहित है, न चल है, न अचल और न स्थिर ही है; वह न सद्रूप है, न असद्रूप ही और न इनके बीचकी ही स्थितिमें रहता है। जैसे चित्‌से प्रकाशित होनेवाला आकाश सूक्ष्मताके कारण दिखलायी नहीं देता, उसी प्रकार अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापी होते हुए भी दृष्टिगोचर नहीं होती । सारे सङ्कल्पोंसे रहित, सारी सजातोंसे शून्य यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामोंसे व्यक्त किया जाता है । जो ज्ञानियोंकी दृष्टिमें आकाशसे भी सौगुनी स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कल-रूप (अवयवरहित) है, एव जो सकल एव निर्मल संसारके रूपमे एकमात्र अपना ही दर्शन कराती है—इस प्रकारकी चित्, चेतनसत्ता न अस्त होती है न उदय होती है, न उठती है न स्थिर रहती है, न जाती है न आती है; न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। वह चित् अर्थात् चेतनसत्ता विकल्परहित, निरालम्ब और निर्मल स्वरूपवाली है। गुरुको चाहिये कि प्रारम्भमें शम-दम आदि गुणोंके द्वारा शिष्यके अन्तःकरणको शुद्ध करे । पश्चात् 'यह सब कुछ ब्रह्मरूप है और तुम शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हो' ऐसा बोध प्रदान करे । अज्ञानी पुरुषको तथा जो अर्द्ध-जाग्रत् है, उसे जो कहता है कि 'सब ब्रह्म ही है', वह उसे महानरकजालमें ढकेल देता है । जिसकी बुद्धि जाग्रत् हो गयी है, भोगकी इच्छा नष्ट हो गयी है, तथा जो सर्वथा आकाङ्क्षारहित हो गया है—ऐसे पुरुषको प्राज्ञ गुरु वेदान्तका यह उपदेश दे कि अविद्यारूप मल है ही नहीं । जिस प्रकार दीपकके होनेपर ही प्रकाश होता है, सूर्यनारायणके होनेपर ही दिन होता है, पुष्पके होनेपर ही सुगन्ध होती है, उसी प्रकार चित्-चेतनके ऊपर ही जगत्‌की स्थिति है । यह जगत् वास्तवमे है नहीं, केवल भासता है । जब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि निर्मल—आवरणशून्य हो जायगी, ज्ञानका सब ओर प्रकाश हो जायगा तथा तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे, तभी तुम मेरे उपदेशके बलाबलको ठीक ठीक जान सकोगे ॥ ९७-१०७ ॥

'स्वार्थनाशके लिये उद्यम करना ही जिसका एकमात्र प्रयोजन है, ऐसी श्रेष्ठ अविद्याके द्वारा ही, ब्रह्मन् ! सब दोषोंको हर लेनेवाली विद्याकी प्राप्ति होती है। अस्त्रके द्वारा अस्त्रका शमन होता है तथा मलके द्वारा मल धोया जाता है, विषके द्वारा विषका शमन होता है, शत्रुके द्वारा शत्रु मारा जाता है । इसी प्रकारकी यह भूतमाया है, जो अपने नाशसे ही हर्ष प्रदान करती है । इसका स्वरूप दिखलायी नहीं देता, दिखलायी देते ही यह नष्ट हो जाती है। परमार्थतः यह माया है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ भावनाके साथ 'सब ब्रह्म ही है'—ऐसी जो अन्तर्भावना होती है, वही मुक्ति प्रदान करती है । यह भेददृष्टि ही अविद्या है। इसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ १०८-११३ ॥

मुने ! (मायाके द्वारा) जो नही प्राप्त होता है, वह अक्षयपद कहलाता है । द्विज ! यह माया किससे उत्पन्न हुई—यह तुम्हें नहीं विचारना है । 'मैं इसे किस प्रकार नष्ट करूँ'—यही तुम्हें विचार करना है । इसके क्षीण होकर नष्ट हो जानेपर तुम उस अक्षयपदको जान सकोगे । जहाँसे यह प्रकट होती है, जैसा इसका स्वरूप है, जिस प्रकार यह नष्ट होगी—अर्थात् निदान, लक्षण और शमनके