सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२३

दशम खण्ड
साध्योंके जीवनाधार पञ्चम अमृतकी उपासना
तथा जो पाँचवाँ अमृत है, साध्यगण ब्रह्माकी प्रधानतासे
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे
उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको
जानता है, साध्यगणोंमेंसे ही कोई एक होकर ब्रह्माकी ही
प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस
रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही
उत्साहित हो जाता है। वह आदित्य जितने समयमे उत्तरसे
उदित होता है और दक्षिणमे अस्त होता है, उससे दूने
समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी ओर अस्त
होता है। इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और
स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥

एकादश खण्ड
मधुविज्ञान तथा ब्रह्मविज्ञानके अधिकारी
फिर उसके पश्चात् वह ऊर्ध्वगत होकर उदित होनेपर
फिर न तो उदित होगा और न अस्त ही होगा, बल्कि अकेला
ही मध्यमें स्थित रहेगा। उसके विषयमे यह श्लोक है। वहाँ
निश्चय ही ऐसा नहीं होता। वहाँ [ सूर्यका ] न कभी अस्त
होता है और न उदय होता है। हे देवगण ! इस सत्यके
द्वारा मैं ब्रह्मसे विरुद्ध न होऊँ । जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद्
( वेदरहस्य ) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय
होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही
रहता है। वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने प्रजापतिसे कहा था,
प्रजापतिने मनुको सुनाया और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा।
तथा यह ब्रह्मविज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको
उसके पिताने सुनाया था। अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता
अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे। किसी
दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित
और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी दूसरेको
इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही अधिकतर
फल देनेवाला है, यही अधिकतर फल देनेवाला है ॥ १-६ ॥

द्वादश खण्ड
गायत्रीकी सर्वरूपता
गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये
स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है
और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री ( उनका
नामोच्चारण करती ) और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा
करती है। जो वह गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी
है, क्योंकि इसीमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी
अतिक्रमण नहीं करते। जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो
कि इस पुरुषमें शरीर है, क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और
इसीको वे कभी नहीं छोड़ते। जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह
यही है जो कि इस अन्तःपुरुषमें हृदय है, क्योंकि इसीमे ये
प्राण प्रतिष्ठित हैं और इसीका अतिक्रमण नहीं करते। वह
यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है। वह यह
[ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है।
[ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस ( गायत्र्याख्य
ब्रह्म ) की महिमा है, तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी
उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका
[ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है।
जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही है, जो कि
यह पुरुषसे बाहर आकाश है, और जो भी यह पुरुषसे बाहर
आकाश है वह यही है, जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश
है, तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है वह यही है,
जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण
और कभी भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता
है, वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त
करता है ॥ १-९ ॥

४२४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३

त्रयोदश खण्ड
पञ्चप्राणोंकी उपासना

उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि ह । इसका जो
पूर्वदिग्नावर्ती सुषि (छिद्र) है वह प्राण है, वह चक्षु है, वह
आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना
करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनकी
उपासना करता है] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता
है । तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र
है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एव यश है—इस प्रकार
उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और
यशस्वी होता है। तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान
है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एव
अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता
है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है। तथा इसका
जो उत्तरी छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है,
और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—
इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह
कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। तथा इसका जो ऊर्ध्व
छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही
यह ओज और तेज है—इस प्रकार उसकी उपासना करे ।
जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है ।
वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल ह । यह जो कोई
भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है
उसके कुलमे वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके
द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त
होता है। तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर
यानी सबके ऊपर, जिनमे उत्तम कोई दूसग लोक नहीं है
ऐसे उत्तम लोकोमे प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है
जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है। उस इस (हृदयस्थित
पुरुष) का यही दर्शनोपाय हे जब कि [मनुष्य] इस शरीरमे
स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय
है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु
(बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण
करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी
उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार
उपासना करता ह] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात)
होता है ॥ १-८॥

चतुर्दश खण्ड
जगत्की एवं आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना

यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीमे उत्पन्न
होनेवाला, उसीमे लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला
है—इस प्रकार शान्त [राग द्वेषरहित] होकर उपासना करे,
क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें
पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर
होता है। अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये [वह
ब्रह्म] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाश-
शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरम, इस सम्पूर्ण
जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रम-
शून्य है, हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे,
सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा
हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक
अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है जो सर्वकर्मा,
सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करने-
वाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदय-
कमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर
जानेपर में इसीको प्राप्त होऊँगा । जिसका ऐसा निश्चय है, और
जिसे इस विषयमे कोई सन्देह भी नहीं है [उसे इसी ब्रह्म-
भावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है ॥ १-४॥

पञ्चदश खण्ड
विराड्रूप कोशकी उपासना

अन्तरिक्ष जिसका उदर है, वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला
है। वह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश
ऊपरका छिद्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसीमे यह
सारा विश्व स्थित है। उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली
है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी'
नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन
दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको
दिशाओके वत्सरूपसे जानता है, पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं

खण्ड १७ ] $\qquad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\qquad$ ४२५
करता । वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे $\quad$ कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं
जानता हूँ, अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ । मैं अमुक अमुक $\quad$ पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण
अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ, अमुक अमुक $\quad$ हूँ' फिर मैने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह
अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित $\quad$ कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और
भूःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण $\quad$ आदित्यकी शरण हूँ' तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण
हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ।* वह मैंने $\quad$ हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और
जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण $\quad$ सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है ॥ १-७ ॥
भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ तथा मैंने जो
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ षोडश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना
निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके (उसकी आयुके) जो $\quad$ मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह
चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं । गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली $\quad$ उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥
है; और प्रातःसवन गायत्री-छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातः- $\quad$ इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं ।
सवनके वसुगण अनुगत हैं । प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस $\quad$ जगती-छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन
सबको बसाये हुए हैं। यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे $\quad$ जगती-छन्दसे सम्बन्ध रखता है। इस सवनके आदित्यगण
कोई कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राण- $\quad$ अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण
रूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एक- $\quad$ विषयजातको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयु-
रूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओके मध्यमें $\quad$ में कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये,
विछिन्न (नष्ट) न होऊँ।' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग $\quad$ 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके
हो जाता है ॥ १-२ ॥ $\quad$ साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें
इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। $\quad$ विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर
त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन $\quad$ नीरोग हो जाता है ॥ ५-६ ॥
त्रिष्टुप्-छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण $\quad$ इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा
अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणि- $\quad$ था—'[अरे रोग !] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोग-
समुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमे कोई $\quad$ द्वारा मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष
[रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, $\quad$ जीवित रहा था, जो इस प्रकार इस सवन-विद्याको जानता है वह
'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय $\quad$ (नीरोग होकर) एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥
सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सप्तदश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग
वह [पुरुष] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो $\quad$ समानताको प्राप्त होते हैं। तथा जो तप, दान, आर्जव
पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं $\quad$ (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा
होता—वही इसकी दीक्षा है। फिर वह जो खाता है, जो $\quad$ हैं। इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई'
पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी $\quad$ वह इसका पुनर्जन्म ही है, तथा मरण ही अवभृथस्नान है।
सदृशताको प्राप्त होता है। तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण $\quad$ घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन
करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुतशस्त्रकी ही $\quad$ सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन

  • इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है, वहाँ अपने पुत्रके नामको उच्चारण करना चाहिये ।
    उ० सं० ५४-५५-

४२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश,
करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित ( अक्षय ) है, ( २ ) अच्युत जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है।
( अविनाशी ) है और ( ३ ) अति सूक्ष्म प्राण है।' तथा [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते
इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं। [ 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसः' हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते
यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें
इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः प्रकाशवान् सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥१-७॥
पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि' इसका अर्थ यह है—]
अष्टादश खण्ड
मन और आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना
'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यात्मदृष्टि ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे
है । तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवत दृष्टि है। इस प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है वह
प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया। कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ।
वह यह ( मनःसञ्ज्ञक ) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद चक्षु ही मनःसञ्ज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है। वह आदित्यरूप
है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते है—अग्नि पाद है, वायु है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता
पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार है। श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह दिशारूप
अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया जाता है। ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और
होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश तपता है ॥ १-६ ॥
और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है। प्राण
एकोनविंश खण्ड
आदित्यकी ब्रह्मरूपमें उपासना
आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है, उसीकी व्याख्या की थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो वस्तिगत जल था, वह समुद्र है।
जाती है। पहले यह असत् ही था । वह सत् ( कार्याभिमुख ) फिर उससे जो उत्पन्न हुआ, वह यह आदित्य है। उसके
हुआ। वह अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमें परिणत हो उत्पन्न होते ही बड़े जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण
गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा । फिर वह प्राणी और सारे भोग हुए हैं। इसीसे उसका उदय और
फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये । अस्त होनेपर दीर्घ-शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण
उनमे जो खण्ड रजत हुआ, वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं। वह जो इस प्रकार
हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डेका जो जरायु ( स्थूल जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार
गर्भवेष्टन ) था [ वही ] वे पर्वत हैं, जो उल्ब ( सूक्ष्म उपासना करता है [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ]
गर्भवेष्टन ) था, वह मेघोंके सहित कुहरा है, जो धमनियां उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते
हैं, सुख देते हैं ॥ १-४॥
॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥

The provided image is completely blank and does not contain any text.

कल्याण
यज्ञशालामें उपस्ति
रैक्व और जानश्रुति

चतुर्थ अध्याय

ॐ

चतुर्थ अध्याय

प्रथम खण्ड

राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान

जो श्रद्धापूर्वक देनेवाला एव बहुत दान करनेवाला था और जिसके यहाँ [ दान करनेके लिये ] बहुत सा अन्न पकाया जाता था ऐसा कोई जनश्रुतके कुलमें उत्पन्न हुआ उसके पुत्रका पौत्र था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायेंगे, सर्वत्र निवासस्थान ( धर्मशालाएँ ) बनवा दिये थे ॥ १ ॥

उसी समय [ एक दिन ] रात्रिमे उधरसे हंस उड़कर गये। उनमेसे एक हंसने दूसरे हंससे कहा—'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेज द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले।' उससे दूसरे [अग्रगामी] हंसने कहा—'अरे ! तू किस महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ? क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है ?' [ इसपर उसने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' 'जिस प्रकार [ द्यूतक्रीडामें ] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस ( रैक्व ) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जानता है, उसके विषयमें भी मुझसे यह कह दिया गया' ॥ २–४॥

इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन प्रातःकाल ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है ?' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उसके निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार उस रैक्वको, जो कुछ भी प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है। तथा जो कुछ ( वह रैक्व ) जानता है, उसे जो कोई जानता है, वह भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ५-६ ॥

वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया । तब उससे राजाने कहा—'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा ।' उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए [ रैक्वको देखा ]। वह रैक्वके पास बैठ गया और बोला—'भगवन् ! क्या आप ही गाड़ीवाले रैक्व हैं ?' रैक्वने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार किया। तब वह सेवक यह समझकर कि 'मैने उसे पहचान लिया है' लौट आया ॥७-८॥


द्वितीय खण्ड

जानश्रुतिको रैक्वके पास उपदेशके लिये जाना

तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला—'रैक्व ! ये छः सौ गौएँ, यह हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ मैं आपके लिये लाया हूँ। आप इस धनको स्वीकार कीजिये और भगवन् ! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं।' उस रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया और उससे बोला—'रैक्व ! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ, यह पत्नी और यह ग्राम, जिसमें कि आप रहते हैं, स्वीकार कीजिये और भगवन् ! मुझे अवश्य उपदेश कीजिये।' तब उस ( राजकन्या ) के मुखको ही [ विद्याग्रहणका द्वार ] समझते हुए रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! तू ये ( गौएँ आदि ) लाया है [ सो ठीक है, ] तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है।' इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था, वहाँ रैक्वपर्णनामक ग्राम महावृष देशमें प्रसिद्ध है। तब उसने उससे कहा ॥ १–५ ॥


तृतीय खण्ड

वायु और प्राणकी उपासना

वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है, और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमे ही लीन हो जाता है। जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन,

[ अध्याय ४

[ अध्याय ४
४२८

  • छान्दोग्योपनिषद् *

हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमे लीन कर लेता
है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ १ २ ॥
अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही सवर्ग है ।
जिस समय यह पुरुष सोता है, प्राणको ही वागिन्द्रिय प्राप्त
हो जाती है, प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको
ही मन प्राप्त हो जाता है । प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन
कर लेता है । वे ये दो ही सवर्ग हैं—देवताओंमें वायु और
इन्द्रियोंमें प्राण ॥ ३-४ ॥
एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षरसेनके पुत्र
अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक
ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी, किंतु उन्होंने उसे भिक्षा नहीं दी ।
तब उसने कहा—'भुवनोंकेरक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार
महात्माओको ग्रस लिया है । कापेय ! अभिप्रतारिन् ! मनुष्य
अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं
देखते, तथा जिसके [ब्रह्मचारीके रूपमें आये हुए भगवान्के]
लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ।' उस वाक्यका
कपिगोत्रोत्पन्न शौनकरने मनन किया और फिर उस [ब्रह्मचारी]
के पास आकर कहा—'जो देवताओका आत्मा, प्रजाओंका
उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी
बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरेसे न खाया जानेवाला
और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता
है, ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं।' [ ऐसा कह-
कर उसने सेवकोको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा
दो' ॥ ५-७ ॥
तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी । वे ये [ अग्न्यादि और
वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं तथा इनसे [ वागादि
और प्राण ] ये पाँच अन्य हैं । इस प्रकार ये सब दस होते
हैं । ये दस कृत ( कृतनामक पासेमे उपलक्षित द्यूत ) हैं ।
अत सम्पूर्ण दिशाओमे ये अन्न ही दस कृत हैं । यह विराट् ही
अन्नादी ( अन्न भक्षण करनेवाला ) है । उसके द्वारा यह सब
देखा जाता है । जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब
देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥८॥

चतुर्थ खण्ड
जवालापुत्र सत्यकामद्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन
जवालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जवालाको
सम्बोधित करके निवेदन किया—'पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक
[ गुरुकुलमे ] निवास करना चाहता हूँ, बता मैं किस
गोत्रवाला हूँ ?' उसने उससे कहा—'हे बेटा ! तू जिस
गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । युवावस्था में, जब कि मै
बहुत कार्य करनेवाली परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया
था । मै यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मै तो
जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अत तू
अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना ।' उसने हारिद्रुमत
गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्के यहाँ ब्रह्मचर्य-
पूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ।'
उससे [ गौतमने ] कहा—'सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?'
उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं
जानता । मैने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया
कि 'युवावस्था मे, जब कि मैं बहुत काम धन्धा करनेवाली
परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया था । म यह नही जानती
कि तू किस गोत्रवाला है ? म जबाला नामवाली हूँ और तू
सत्यकाम नामवाला है।' अतः गुरो ! मे सत्यकाम जाबाल
हूँ।' उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर
नहीं कर सकता । अत. सोम्य ! तू समिधा ले आ, मै तेरा
उपनयन कर दूँगा, क्योंकि तूने सत्यका त्याग नही किया ।'
तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ
अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे
जा ।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र
गायें हुए बिना में नहीं लोटूँगा ।' जबतक कि वे एक सहस्र
हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमे ही रहा ॥ १-५ ॥

पञ्चम खण्ड
सत्यकामको वृषभद्वारा ब्रह्मके एक पादका उपदेश
तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने
'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला—] 'हे सोम्य !
हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमे आचार्यकुलमें पहुँचा
दे ।' [ साँडने कहा ] '[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद
बतलाऊँ ?' तब [ सत्यकामने ] कहा—'भगवन् ! मुझे
[ अवश्य ] बतलावे ।' साँड उससे बोला—'पूर्व दिक्कला,

खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२९
पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना
सोम्य ! यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान्
पाद है।' वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके लोकोंको जीत लेता है ॥ १-३ ॥
षष्ठ खण्ड
अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश
'अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर तब ] [ सत्यकामने कहा-] 'भगवन् ! मुझे [ अवश्य ]
ऋषभ मौन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल- बतलावें ।' तब उसने उससे कहा-'पृथ्वी कला है, अन्तरिक्ष
की ओर हाँक दिया । वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है । सोम्य ! यह
अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है।' वह, जो
पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी
ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया । 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें
'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [अग्निने कहा, अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है।१-४।
सप्तम खण्ड
हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश
'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि [ सत्यकाम बोला--] 'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब वह
निवृत्त हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी उससे बोला-'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है
ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह और विद्युत् कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है।' जो कोई इसे इस प्रकार जानने-
अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा । तब हंसने उसके समीप वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे
उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता
[ इसने कहा— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश
'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर [ सत्यकाम बोला-] 'भगवन् ! मुझे अवश्य बतलावें ।' वह
हंस चला गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर उससे बोला-'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है
हाँक दिया। वे सायकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि और मन कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे 'आयतनवान्' नामवाला है।' वह, जो इसे इस प्रकार जानने-
पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । मद्गुने उसके पास उतरकर वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे
कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें आयतनवान् होता
[ मद्गु बोला— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४ ॥
नवम खण्ड
सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश-ग्रहण
सत्यकाम आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा- तू ब्रह्मवेत्ता-सा दिखलायी दे रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया
'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' 'सोम्य ! है ?' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] । तब उसने उत्तर दिया,

४३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

४३० * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ४
'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी
इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें।
मैंने श्रीमान् जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या
ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी
विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून
नहीं हुआ [अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ १-३ ॥
दशम खण्ड
उपकोसलको अग्नियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश
उपकोसल नामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके
यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक
उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की, किंतु आचार्यने अन्य
ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल
इसीका नहीं किया। आचार्यसे उसकी भार्या ने कहा- 'यह
ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियों-
की सेवा की है। देखिये, अग्नियां आपकी निन्दा न करें। अतः
इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किंतु वह उसे उपदेश
किये बिना ही बाहर चला गया। उस उपकोसलने मानसिक
खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने
कहा- 'अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन
करता ?' वह बोला-'माताजी ! इस मनुष्यमें अनेक ओर
जानेवाली बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मैं व्याधियोंसे परिपूर्ण
हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा' ॥ १-३ ॥
फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा- 'यह ब्रह्मचारी
तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है।
अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले-
'प्राण' ब्रह्म है, 'कं' ब्रह्म है, 'खं' ब्रह्म है। वह बोला-'यह
तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को
नहीं जानता।' तब वे बोले- 'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख'
है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे
प्राण और उसके [आश्रयभूत] आकाशका उपदेश किया ॥४-५॥
एकादश खण्ड
अकेले गार्हपत्याग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी- 'पृथ्वी, अग्नि, अन्न
और आदित्य-ये मेरे चार शरीर हैं। आदित्यके अन्तर्गत जो
यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष,
जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको
नष्ट कर देता है, अभिलोकान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती
पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोकमें भी
पालन करते हैं ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
अन्वाहार्यपचन नामक दूसरे अग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे अन्वाहार्यपचनने शिक्षा दी- 'जल, दिशा,
नक्षत्र और चन्द्रमा-ये मेरे चार शरीर हैं। चन्द्रमामें जो यह
पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो
इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि)
की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान्
होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन
व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है
हम उसका इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
ॐ आहवनीय-अग्निद्वारा शिक्षा
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया- 'प्राण,
आकाश, द्युलोक और विद्युत्-ये मेरे चार शरीर हैं। यह
जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।'
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें
विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता
है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है, उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२॥

खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३१
चतुर्दश खण्ड
आचार्य और उपकोसलका संवाद
उन्होंने कहा—'उपकोसल ! सौम्य ! यह अपनी विद्या
और आत्मविद्या तेरे प्रति कही । आचार्य तुझे इसके फलकी
प्राप्तिका मार्ग बतलायेंगे ।' तदनन्तर उसके आचार्य आये ।
उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल !' उसने 'भगवन् !'
ऐसा उत्तर दिया । [ आचार्य बोले—] 'सौम्य ! तेरा मुख
ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?'
'गुरुजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो
उसे छिपाने लगा । [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके
बोला—] 'निश्चय इन्होंने उपदेश किया है जो अन्य प्रकारके
थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोको बतलाया ।
[ तब आचार्यने पूछा—] 'सौम्य ! इन्होंने तुझे क्या
बतलाया है ?' तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर
दिया । [ इसपर आचार्यने कहा—] 'हे सौम्य ! इन्होंने तो
तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है, अब मै तुझे वह
बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पाप-कर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध
नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह
बोला—'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे
बोले ॥ १-३ ॥
पञ्चदश खण्ड
आचार्यद्वारा उपदेश, ब्रह्मवेत्ताकी गतिका वर्णन
'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है, यह आत्मा है'—
ऐसा उसने कहा 'यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है। उस
( पुरुषके स्थानरूप नेत्र ) में यदि घृत या जल डाले तो वह
पलकोंमें ही चला जाता है। इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं,
क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसीको प्राप्त होती हैं;
जो इस प्रकार जानता है, उसे सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब
ओरसे प्राप्त होती हैं। यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण
वामोंका वहन करता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण
वामोंको वहन करता है। यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण
लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण
लोकोंमें भासमानी होता है ॥ १-४ ॥
अब [ श्रुति पूर्वोक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलाती है—]
इसके लिये शवकर्म करें अथवा न करें—वह अर्चि-अभिमानी
देवताको ही प्राप्त होता है। फिर अर्चि-अभिमानी देवतासे
दिवसाभिमानी देवताको, दिवसाभिमानीसे शुक्लपक्षाभिमानी
देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायणके छः मासोंको
प्राप्त होता है। मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको,
आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है।
वहाँसे अमानव पुरुष इसे ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह
देवमार्ग—ब्रह्ममार्ग है। इससे जानेवाले पुरुष इस मानव-
मण्डलमें नहीं लौटते, नहीं लौटते ॥ ५ ॥
षोडश खण्ड
पवनकी यज्ञरूपमें उपासना
यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ
निश्चय ही इस सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र करता है, क्योंकि यह
गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है
इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग
हैं। इनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा सस्कार करता है
तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणीद्वारा दूसरे मार्गका
संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर
परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो
वह केवल एक मार्गका ही सस्कार करता है, दूसरा मार्ग नष्ट
हो जाता है। जिस प्रकार एक पैरसे चलनेवाला पुरुष अथवा
एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार
इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके
पश्चात् यजमानका नाश होता,है, इस प्रकारका यज्ञ करनेपर
वह और भी अधिक पापी हो जाता है। और यदि
प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे
पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो समस्त ऋत्विक् मिलकर दोनों
ही मागोंका सस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं
होता। जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा
दोनों पहियोंसे चलनेवाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार
इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी
स्थित रहता है। वह ऐसा यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥१—५॥

४३२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ४
सप्तदश खण्ड
यज्ञमें योग्य ब्रह्माकी आवश्यकता
प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया ।
उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले । पृथ्वीसे
अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको निकाला ।
फिर उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन
तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे
ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ।
तदनन्तर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया ।
उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक्-
श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन
रसोंको ग्रहण किया। उस यज्ञमें यदि ऋक्-श्रुतियोंके सम्बन्धसे
क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन
करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा
ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि
यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर
दक्षिणाग्निमे हवन करे । इस प्रकार वह यजुओंके रससे
यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है।
और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा
कहकर आहवनीयाग्निमे हवन करे। इस प्रकार वह सामके
रससे सामके वीर्यद्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतिकी पूर्ति करता
है। इस विषयमे ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लवण
(क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको,
त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको और लोहेसे काष्ठको अथवा
चमड़ेमे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक,
देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसन्धान किया
जाता है। जिसमे इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह
यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोद्वारा संस्कृत होता है। जहाँ
इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता
है। इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाया
प्रसिद्ध है कि 'जहाँ जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच
जाता है' ॥ १-९॥
एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें
घोड़ी योद्धाओकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला
ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब
ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही
ब्रह्मा बनाये, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवाले-
को नहीं ॥ १० ॥
॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अध्याय

ॐ
पञ्चम अध्याय
प्रथम खण्ड
प्राणकी सर्वश्रेष्ठता
जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो
जाता है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो कोई
वसिष्ठको जानता है, वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है, निश्चय
वाक् ही वसिष्ठ है । जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, वह इस
लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है, चक्षु ही प्रतिष्ठा है।
जो कोई समृद्धिको जानता है, उसे दैव और मानुष भोग सम्यक्
प्रकारसे प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही समृद्धि है। जो आयतनको
जानता है, वह स्वजातीयोंका आयतन—आश्रय होता है।
निश्चय मन ही आयतन है ॥ १-५ ॥
एक बार प्राण ( इन्द्रियाँ ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस
प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे । उन प्राणोंने
अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें
कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके
उत्क्रमण करनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे,
वही तुममें श्रेष्ठ है।' तब वाक्-इन्द्रियने उत्क्रमण किया ।
उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—
'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [उन्होंने कहा—] 'जिस
प्रकार गूँगेलोग बिना बोले प्राणसे प्राणनक्रिया करते, नेत्रसे
देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित
रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर वाक्-
इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया । फिर चक्षुने उत्क्रमण किया ।
उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—
'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ]
'जिस प्रकार अन्धेलोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे
बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित
रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर चक्षु-
ने प्रवेश किया । तदनन्तर श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक
वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना
तुम कैसे जीवित रह सके?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार
बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते,
नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं,
उसी प्रकार हम भी जीवित रहे ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें
प्रवेश किया । तत्पश्चात् मनने उत्क्रमण किया । उसने एक
वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे
जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार बच्चे,
जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया
करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए
जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' यह सुनकर
मनने भी प्रवेश किया। फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा
की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेके
कीलोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी
उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा—
'भगवन् ! आप [ हमारे स्वामी ] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ
हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ ६-१२ ॥
फिर उससे वाक्-इन्द्रियने कहा—'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो
तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो
प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो ।' फिर उससे श्रोत्रने कहा—
'मैं जो समृद्धि हूँ सो तुम्हीं समृद्धि हो ।' तत्पश्चात् उससे मन
बोला—'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं आयतन हो।' [ लोकमें
समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन
ही कहते हैं, परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण-
ही हैं ॥ १३-१५ ॥
द्वितीय खण्ड
महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थोपासना
उसने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' तब वागादिने
कहा—'कुत्तों और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोका यह जो कुछ
अन्न है [ सब तुम्हारा अन्न है ]'; सो यह सब अन ( प्राण )
का अन्न है । 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष नाम है । इस प्रकार
जाननेवालेके लिये भी कुछ अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होता है ।
उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले—
'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और
पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं। ऐसा करनेसे वह
वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ १-२ ॥
उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जावालने वैयाघ्रपद्य
गो-श्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे सूखे
ठूँठके प्रति कहे तो उसमे शाखा उत्पन्न हो जायगी और
पत्ते फूट आयेंगे' ॥ ३ ॥
अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे.

४३४ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ५


अमावस्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये। इसी प्रकार 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले, 'सपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले तथा 'आयत्नाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले। तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमे ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ—] 'हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [अपने प्राणभूत] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ।' फिर वह इस ऋचासेऽ पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्स॑वितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'व॒यं दे॒वस्य॑ भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है, 'श्रेष्ठ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है तथा 'तुरं॒ भग॑स्य धीमहि' ऐसा कहकर कस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर [अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे] अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो ऐसा समझे कि कर्म सफल हो गया। इस विषयमे यह श्लोक है— जिस समय काम्यकर्ममें स्वप्नमे स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ४-८ ॥


तृतीय खण्ड

श्वेतकेतु और प्रवाहणका संवाद; श्वेतकेतुके पिताका राजासे उपदेश माँगना

आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामे आया। उससे जीवकके पुत्र प्रवाहणने कहा—'कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है?' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥

'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे जानेपर प्रजा कहाँ जाती है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् !' [प्रवाहण—] 'देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंका पारस्परिक वियोगस्थान तुझे मालूम है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं भगवन् !' [प्रवाहण—] 'तुझे मालूम है, वह पितृलोक भरता क्यों नहीं है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप (सोमामृतादि रस) 'पुरुष' सज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् ! नहीं।' 'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों कहता था? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है। उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' पिताने कहा—'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हे क्यों न बतलाता?' ॥ २-५ ॥

तब वह गौतम गोत्रोत्पन्न ऋषि राजा (जैवलि) के स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [दूसरे दिन] प्रातःकाल होते ही राजाके सभामे पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। राजाने उससे कहा—'भगवन् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये। उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें, आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात प्रश्नरूपसे कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह सङ्कटमे पड़ गया। उसे 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—'गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला— ॥ ६-७ ॥


* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही उस देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'

खण्ड १० ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३५
चतुर्थ खण्ड
द्युलोककी अग्निके रूपमें उपासना
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है । उसका इस द्युलोकरूप अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस
आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ १-२ ॥
अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं । उस
पञ्चम खण्ड
पर्जन्यकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते
बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन हैं, उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ १-२ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है । उसका संवत्सर ही समिध् अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण
है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ १-२॥
सप्तम खण्ड
पुरुषकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पुरुष ही अग्नि है । उसकी वाक् ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते
प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गार है और श्रोत्र हैं । उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ १-२ ॥
अष्टम खण्ड
स्त्रीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! स्त्री ही अग्नि है । उसका उपस्थ ही समिध् है, जो सुख होता है, वह विस्फुलिङ्ग है । उस इस अग्निमें देवगण
पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता
तथा जो भीतरकी ओर करता है, वह अङ्गार है और उससे है ॥ १-२ ॥
नवम खण्ड
पाँचवीं आहुतिसे 'पुरुष' की उत्पत्ति
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' है । इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुःपर्यन्त जीवित रहता
शब्दवाची हो जाते हैं । वह जरायुसे आवृत्त हुआ गर्भ दस है । फिर मरनेपर कर्मफल भोगनेके लिये प्रस्थित हुए उस जीवको
या नौ महीने अथवा जबतक पूर्णायु नहीं होता तबतक माताकी अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और
कुक्षिके भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता जिससे उत्पन्न हुआ था ॥ १-२ ॥
दशम खण्ड
जीवोंकी त्रिविध गति
वे जो इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो वनमें श्रद्धा और अर्चि-अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं. अर्चि-अभिमानी
तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे

४३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

४३६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५
शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको, शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः
महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको, उन
महीनोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमा-
को और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव
पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह
देवयान मार्ग है ॥ १-२ ॥
तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममे इष्ट, पूर्त्त और दत्त—ऐसी
उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिको, रात्रिसे
कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छ. महीनोंमें सूर्य दक्षिण
मार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते है। ये लोग संवत्सरको
प्राप्त नहीं होते। दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे
आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा
राजा सोम है। वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका
भक्षण करते हैं। वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे फिर इसी
मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं। [वे पहले]
आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर
वे धूम होते हैं और धूम होकर अभ्र होते हैं। वह अभ्र होकर
मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है। तब वे जीव इस लोकमे
धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर
उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त
कष्टप्रद है। उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो
वीर्यसेचन करता है तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ॥ ३-६ ॥
उन (अनुशयी जीवों) मे जो अच्छे आचरणवाले होते
हे वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि,
क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ
आचरणवाले होते हे वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं।
वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त
करते हैं ॥ ७ ॥
इनमेसे वे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र और
बारम्बार आने जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और
मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह
परलोक नही भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी
चाहिये। इस विषयमे यह मन्त्र है—सुवर्णका चोर, मद्य
पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं
और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी। किंतु जो इस
प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ आचरण
(संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता। वह शुद्ध
पवित्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता
है, जो इस प्रकार जानता है ॥ ८-१० ॥
एकादश खण्ड
प्राचीनशाल आदिका राजा अश्वपतिसे वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमें प्रश्न
उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ,
भल्लविका पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और
अश्वतराश्वका पुत्र बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय
एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा
कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥
उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक
इस समय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके
पास चलें। ऐसा निश्चय कर वे उसके पास गये। उसने निश्चय
किया कि 'ये परम श्रोत्रिय महागृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे, किंतु
मै इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा, अतः मैं इन्हें दूसरा
उपदेष्टा बतला दूँ।' उसने इनसे कहा—'हे पूजनीयगण ! इस
समय केकयकुमार अश्वपति इस वैश्वानरसंजक आत्माको अच्छी
तरह जानता है। आइये, हम उसीके पास चलें।' ऐसा कहकर
वे उसके पास चले गये ॥ २-४ ॥
अपने पास आये हुए उन ऋषियोंका राजाने अलग-
अलग सत्कार कराया। [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल उठते ही
उसने कहा—'मेरे राज्यमे न तो कोई चोर ही है तथा न
अदात्ता, मद्यप, अनाहिताग्नि, अविद्वान् और परस्त्रीगामी ही
है, फिर कुलटा स्त्री तो आयी ही कहाँसे ? हे पूज्यगण ! मै
भी यज्ञ करनेवाला हूँ। मे एक-एक ऋत्विक्को जितना धन
दूँगा, उतना ही आपको भी दूँगा, अतः आपलोग यही
ठहरिये।' वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है
उसे चाहिये कि वह अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप
वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन
कीजिये।' वह उनसे बोला—'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको
इसका उत्तर दूंगा।' तब दूसरे दिन पूर्वाह्नमें वे हाथमें
समिधाएँ लेकर राजाके पास गये। उनका उपनयन न करके
ही राजाने उन्हें उस विद्याका उपदेश किया ॥ ५-७ ॥

कल्याण
सत्यकाम और उपकोशल
राजा अश्वपतिके भवनमें उद्दालक

The provided image is completely blank. There is no text to transcribe.

खण्ड १५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४३७
द्वादश खण्ड
अश्वपति और औपमन्यवका संवाद
[राजाने कहा-] 'उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस
उपासना करते हो ?' 'पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका
करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा-] 'तुम जिस दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह
आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही 'सुतेजा' नामसे वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह
प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमे सुत, प्रसूत भी कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक
और आसुत दिखायी देते हैं। तुम अन्न भक्षण करते हो गिर जाता' ॥ १ २ ॥
त्रयोदश खण्ड
अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद
फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा- 'प्राचीनयोग्य ! रथ और दासियोंके सहित हार प्राप्त है । तुम अन्न भक्षण
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस
राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ ।' [ राजाने वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है,
कहा-] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है।
आत्माकी तुम उपासना करते हो, इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत- किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी
सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है। खच्चरियोंसे जुता हुआ कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते' ॥१-२॥
चतुर्दश खण्ड
अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद
तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा- 'वैयाघ्रपद्य ! चलती है । तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी-
राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [राजाने कहा-] उपासना करता है, यह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन
'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्मा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह
वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक् पृथक् उपहार आत्माका प्राण ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा
आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर
जाता' ॥ १-२ ॥
पञ्चदश खण्ड
अश्वपति और जनका संवाद
तदनन्तर राजाने जनसे कहा- 'शार्कराक्ष्य ! तुम किस करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना
आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा- 'पूज्य राजन् ! करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है
मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला-] और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका
'यह निश्चय ही बहुलसञ्ज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और
तुम उपासना करते हो। इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण यह भी कहा कि- 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह
बहुल हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ १-२ ॥

४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

४३८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५
षोडश खण्ड
अश्वपति और बुडिलका संवाद
फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'वैयाघ्रपद्य ! दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन
राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है, किंतु यह
बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही आत्माका वस्ति ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा
रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा वस्तिस्थान फट
और पुष्टिमन् हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका जाता' ॥ १-२ ॥
सप्तदश खण्ड
अश्वपति और उद्दालकका संवाद
तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'गौतम ! और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता
राजन् ! मै तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता
बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही है। किन्तु यह आत्माके चरण ही है।' ऐसा उसने कहा और
प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है। इसीसे तुम प्रजा और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण
पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो। तुम अन्न भक्षण करते हो शिथिल हो जाते' ॥ १-२ ॥
अष्टादश खण्ड
अश्वपतिक वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश
राजाने उनसे कहा—'तुम सब लोग इस वैश्वानर (द्युलोक) है, चक्षु विश्वरूप (सूर्य) है, प्राण पृथग्वर्त्मा
आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई (वायु) है, देहका मध्यभाग बहुल (आकाश) है, वस्ति ही
'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस रयि (जल) है, पृथिवी ही दोनों चरण ह, वक्षःस्थल वेदी
प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त है, लोम दर्भ हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन
लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण
करता है। उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है और मुख आहवनीय है' ॥ १-२ ॥
एकोनविंश खण्ड
'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति
अतः जो अन्न पहले आवे उसका हवन करना चाहिये, द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य
उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी
ऐसा कहकर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है। प्राणके तृप्त तृप्ति होनेपर स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और
होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा
विंश खण्ड
'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति
तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा
कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है। व्यानके तृप्त तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा