कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७१
ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७१
उसका ये सात अक्षितियाँ (नेत्रोंके अङ्ग) उपस्थान (स्तवन)
करती हैं— उनमेंसे जो ये आँखमे लाल रेखाएँ हैं उनके द्वारा रुद्र
इस मध्यप्राणके अनुगत है, नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ,
जो दर्शनशक्ति है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके
द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत
है। नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एव ऊपरके
पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न
क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥
इस विषयमे यह मन्त्र है—'चमस नीचेकी ओर छिद्र-
वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप
यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण (दो कान, दो
नेत्र, दो नासिका और एक रसना) और वेदके द्वारा सवाद
करनेवाली आठवी वाणी रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्र-
वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह सिर
है; क्योकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर
उठा हुआ है । उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण
ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता
है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि है,
प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा सवाद
करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा सवाद करती है।
ये दोनों [ कान ] ही गोतम और भरद्वाज हैं, यह ही गोतम
है और यह [ दूसरा ] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र ] ही
विश्वामित्र और जमदग्नि हैं, यह ही विश्वामित्र है और यह
दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र ] ही वसिष्ठ और
कश्यप हैं, यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा
वाक् ही अत्रि है, क्योकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण
किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, उसका निश्चय 'अत्ति'
ही नाम है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता
(भोक्ता) होता है, सब उसका अन्न (भोग्य) हो जाता
है ॥ ३-४ ॥
तृतीय ब्राह्मण
ब्रह्मके दो रूप
ब्रह्मके दो (द्विविध) रूप है—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और
अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत्। जो वायु और
अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है
और यह सत् है । उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस
स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह
सत्का ही रस है । तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये
अमृत है, ये यत् हैं और ये ही त्यत् है। उस इस अमूर्तका,
इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि
इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधि
दैवत-दर्शन है। अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता
है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है, उससे
भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है, यह सत्
है। यह जो नेत्र है, वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस
स्थितका एव इस सत्का सार है। यह सत्का ही सार है।
अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके
अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह
यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका,
इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण
नेत्रान्तर्गत पुरुष है, यह त्यत्का ही रस है ॥ १—५ ॥
उस इस पुरुषका रूप-चमत्कार ऐसा है जैसा कुसुमसे
रँगा हुआ वस्त्र हो, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र हो, जैसा इन्द्रगोप
(बीरबहूटी) हो, जैसी अग्निकी ज्वाला हो, जैसा श्वेत कमल हो,
और जैसे बिजलीकी चमक हो। जो ऐसा जानता है, उसकी
श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ]
होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति-नेति' यह ब्रह्मका निर्देश
है। 'नेति-नेति' इससे बढकर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है।
'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका
यह सत्य है ॥६॥
चतुर्थ
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद, याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमें परमात्म-तत्त्वका उपदेश
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने [ अपनी पत्नीसे ]
कहा। 'मै इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम) से ऊपर (सन्यास-
आश्रममें ) जानेवाला हूँ। अतः [ तेरी अनुमति लेता हूँ
और चाहता हूँ ] इस (दूसरी पत्नी) कात्यायनीके साथ तेरा
बँटवारा कर दूँ' ॥ १ ॥
मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न
४७२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय २
[बायाँ स्तम्भ]
सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार
अमर हो सकती हूँ ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग-
सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही
तेरा भी जीवन हो जायगा। धनसे अमृतत्वकी तो आशा है
ही नहीं' ॥ २ ॥
मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती,
उन भोगोंको लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ
अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ३ ॥
याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'धन्य ! अरी मैत्रेयि, तू पहले
भी मेरी प्रिया रही है और इस समय भी मुझे प्रिय लगने-
वाली ही बात कह रही है। अच्छा आ, बैठ जा; मैं तेरे प्रति
उस (अमरत्व) की व्याख्या करूँगा, तू व्याख्यान किये हुए
मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना' ॥ ४ ॥
उन्होंने कहा-'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके
प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, आत्माके अपने ही
प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री
प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है,
पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन-
के लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय
नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है;
ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने
ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके
लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय
प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते,
अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं, देवताओंके
प्रयोजनके लिये देवता प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके
लिये देवता प्रिय होते हैं, प्राणियोंके प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय
नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय होते हैं,
तथा सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही
प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं। अरी मैत्रेयि ! यह आत्मा-
अपना-आप ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये
जाने योग्य है। मैत्रेयि ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण,
मनन एव विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥
ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको
आत्मासे भिन्न जानता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती
है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है। लोक उसे
परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है।
देवगण उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे
[दायाँ स्तम्भ]
भिन्न देखता है। भूतगण उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको
आत्मासे भिन्न देखता है। सभी उसे परास्त कर देते हैं, जो
सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह
क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये सब जो
कुछ भी हैं, सब आत्मा ही है ॥ ६ ॥
इसमें दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि
(नकारे) के बाह्य शब्दोको कोई पकड़ नहीं सकता, किंतु
दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको पकड़ लेनेसे उसका शब्द
भी पकड़ लिया जाता है। यह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है-
जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें
समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको
ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है। वह
[तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है-जैसे कोई बजायी जाती हुई
वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु
वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण
हो जाता है। वह [चौथा दृष्टान्त है-] जिस प्रकार जिसका ईंधन
गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूआँ निकलता
है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,
अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या,
उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे
सब इस परमात्माके ही निःश्वास हैं ॥ ७-१० ॥
दृष्टान्त है-जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक
अयन (आश्रय स्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पशोंका त्वचा
एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ
एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन
है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी
प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त
सङ्कल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओका
हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक
अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन
है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी
प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार
समस्त वेदोका वाणी एक अयन है ॥ ११ ॥
इसमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार जलमे डाला हुआ
नमकका डला जलमें ही घुल-मिल जाता है, उसे जलसे निकालनेके
लिये कोई समर्थ नहीं होता तथा जहाँ-जहाँसे भी जल
लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता है, हे मैत्रेयि ! उसी
प्रकार यह परमात्म-तत्त्व अनन्त, अपार और विज्ञानघन ही
है। यह इन [सत्यशब्दवाच्य] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके
ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * । ४७३
साथ अदृश्य हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी
कोई विशेष सञ्ज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! ऐसा मैं तुझसे
कहता हूँ'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई सञ्ज्ञा
नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया
है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं
कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस परमात्माका विज्ञान कराने-
के लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥
जहाँ (अविद्यावस्था में) द्वैत सा होता है, वहीं अन्य
अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको
सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्य-
का मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है; किंतु जहाँ
इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके
द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे
सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा
किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके
द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? अरी
मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? ॥ १४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
मधुविद्याका उपदेश, आत्माका विविध रूपोंमें वर्णन
यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस
पृथिवीके मधु हैं। इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय
पुरुष है और जो यह अध्यात्मशारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष
है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया
गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। ये जल
समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं।
इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो
यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह
है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है]।
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह अग्नि समस्त
भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस
अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह
अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है
जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]।
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह वायु समस्त
भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस
वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह
अध्यात्मप्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो
कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत
है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आदित्य समस्त भूतोंका
मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस
आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म
चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह
आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह
ब्रह्म है, यह सर्व है। ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा
समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं। यह जो इन दिशाओंमें
तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी
प्रातिश्रुत्क (प्रत्येक श्रवणवेलामें रहनेवाला) तेजोमय अमृतमय
पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे
बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह
चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमाके
मधु हैं। यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है
और जो यह अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष
है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया
गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह विद्युत्
समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस विद्युत्के मधु हैं।
यह जो इस विद्युत्में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो
यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है
जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]।
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मेघ समस्त
भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं। यह जो
इस मेघमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म
शब्द एव स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह
है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]।
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आकाश समस्त
भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं। यह
जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह
अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह
है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह धर्म समस्त
उ० अ० ६०-६१-
४७४ , ' बृहदारण्यकोपनिषद् ' [ अध्याय २
भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं । इस
धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह
अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह
है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह
अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह सत्य समस्त भूतोंका
मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस
सत्यमे तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-
सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो
कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह
अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मनुष्यजाति समस्त
भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं।
यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो
यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है
जो कि 'यह आत्मा है' [ इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]।
यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आत्मा (देह)
समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु
हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो
यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि
'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है,
यह ब्रह्म है, यह सर्व है। वह यह आत्मा समस्त भूतोंका
अधिपति एव समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त-
जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित
रहते हैं, इसी प्रकार इस परमात्मामें समस्त भूत, समस्त देव,
समस्त लोक, समस्त जीवन और ये सभी आत्माएँ समर्पित हैं
[ सभी उस परमात्मासे जुड़े हुए और उसीके सहारे स्थित
हैं।] ॥ १-१५॥
इस पूर्वोक्त मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे
कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा-
मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनी-
कुमारो ! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दक्ष
कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने
तुम्हारे प्रति अश्वके सिरसे वर्णन किया था ॥ १६ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको
उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा
है-हे अश्विनीकुमारो ! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये
घोड़ेका सिर लाये । उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र
(सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे शत्रुहिंसक ! जो
[ आत्मज्ञानसम्बन्धी ] गोपनीय मधु था [ वह भी तुमसे
कहा ] ॥ १७ ॥
इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको
उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा-परमात्माने दो
पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले
वह पुरुष-परमात्मा पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया । वह
यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) मे पुरिशय है। ऐसा कुछ
भी नहीं है, जो परमात्मासे न ढका हो तथा ऐसा भी कुछ
नहीं है, जिसमे परमात्माका प्रवेश न हुआ हो-जो उससे
व्याप्त न हो ॥ १८ ॥
इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको
उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा-वह रूप रूपके
प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट)
करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है।
[ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके घोड़े सौ (नाड़ियां)
और दस (इन्द्रियाँ) हैं। यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रिय-
रूप अश्व ) है, यही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त है।
वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित),
अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह
आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त
वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है ॥ १९ ॥
षष्ठ ब्राह्मण
मधुविद्याकी परम्पराका वर्णन
अब [ मधुकाण्डका ] वंश बतलाया जाता है-
पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने
गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे,
ने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे,
गौतमने आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और
आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने
आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने गौतमसे, गौतमने सैतव और
प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीनयोग्यने पाराशर्यसे, पाराशर्यने
ब्राह्मण ६ ] $\qquad$ $\div$ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति $\div$ $\qquad$ ४७५
भारद्वाजसे, भारद्वाजने भारद्वाजसे और गौतमसे, गौतमने $\quad$ वत्सनपात् बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य
भारद्वाजसे, भारद्वाजने पाराशर्यसे, पाराशर्यने वैजवापायनसे, $\quad$ आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति
वैजवापायनने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने घृतकौशिकसे, $\quad$ त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रमे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे,
घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, $\quad$ अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा
पाराशर्यने जातूकण्यंसे, जातूकर्ण्यने आसुरायणमे और यास्कसे, $\quad$ दैवमे, अथर्वा दैवने प्राध्वसन मृत्युने, प्राध्वसन मृत्युने
आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने $\quad$ प्रध्वन्सनसे, प्रध्वन्सनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे,
आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजने, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने $\quad$ विप्रचित्तिने व्यष्टिने, व्यष्टिने सनातनसे, सनातनने सनातनसे,
माण्टिसे, माण्टिने गौतममे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, $\quad$ सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने ब्रह्मासे
वात्स्यने शाण्डिल्यमे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य $\quad$ [ इसे प्राप्त किया ] । ब्रह्मा स्वयम्भू—है, ब्रह्माको नमस्कार
काप्यने कुमारहारितमे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने $\quad$ है ॥ १-३ ॥
विदर्भीकौण्डिन्यमे विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपात बाभ्रवसे,
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त