कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
गमन किया और वह आदित्यके [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृर्तोंके
हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध सा होता है यही वह अमृत हैं--वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत
(मधु) है। वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं ॥ १-४ ॥
षष्ठ खण्ड
वसुओंके जीवनाधार प्रथम अमृतकी उपासना
इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको
होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित
पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। होता है। जितने समयमे आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है
वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और पश्चिम दिशामे अस्त होता है, उतनी ही देर वह
और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस
अमृतको जानता है, वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी वसुओके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
सप्तम खण्ड
रुद्रोंके जीवनाधार द्वितीय अमृतकी उपासना
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। है। जितने समयमे आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और अस्त होता है, उससे दुगुने समयमे वह दक्षिणसे उदित होता
इसीसे उद्यमशील होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको है और उत्तरमे अस्त हो जाता है। इतने समयपर्यन्त वह
जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे रुद्रोंके ही आधिपत्य एव स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
आदित्योंके जीवनाधार तृतीय अमृतकी उपासना
तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही
होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है। वह
खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो आदित्य जितने समयमे दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमे
जाते हैं। वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और अस्त होता है, उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और
इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता पूर्वमें अस्त होता है। इतने समय वह आदित्योंके ही आधिपत्य
है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
नवम खण्ड
मरुतोंके जीवनाधार चतुर्थ अमृतकी उपासना
तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है। वह आदित्य
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। जितने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे है, उससे दूनी देरमें उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त
उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता है, होता है। इतने काल वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और
मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥