कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१७
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन
है । उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [ श्राद्ध-
कालमें ] उन्हें [ पितृ पितामह आदि रूपसे दर्भपर ] स्थापित
करते हैं, क्योंकि वे पितृगण निश्चय ही इस सामकी निधन-
भक्तिके पात्र है। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सात प्रकारके
सामकी उपासना करते है ॥ १-८ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना
अब निश्चय ही [ यह बतलाया जाता है कि ] अपने
समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
करे । 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी
तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है। 'आदि' यह दो
अक्षरोंवाला नाम है, और 'प्रतिहार' यह चार अक्षरोंवाला
नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे
समान हो जाते हैं। 'उद्गीथ' यह तीन अक्षरोंका और
'उपद्रव' यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनो तीन-तीन
अक्षरोंमें तो समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः
[ 'अक्षर' होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह
[ एक ] भी उनके समान ही है। 'निधन' यह नाम तीन
अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस
अक्षर हैं। इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोक प्राप्त
करता है, क्योंकि इस लोकसे आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है।
बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं
शोकरहित लोकको जीत लेता है। [ वह पुरुष ] आदित्यलोक-
की जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्यविजयसे भी उत्कृष्ट
जय प्राप्त होती है। जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला
होकर आत्मसमित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी
उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ १-६ ॥
एकादश खण्ड
गायत्र-सामोपासना
मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र
प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसञ्ज्ञक साम
प्राणोंमें प्रतिष्ठित है । वह, जो इस प्रकार गायत्रसञ्ज्ञक
सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है,
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता
है, प्रजा और पशुओंद्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके
द्वारा भी महान् होता है। वह महान् मनस्वी होवे—यही
उसका व्रत है ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
रथन्तर-सामोपासना
अभिमन्थन करता है यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है
यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं
यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है यह निधन है और
सर्वथा शान्त हो जाता है यह भी निधन है। यह रथन्तरसाम
अग्निमें प्रतिष्ठित है। वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तर-
सामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और
अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता
है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। अग्निकी ओर मुख
करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
वामदेव्य-सामोपासना
स्त्री-पुरुषका संकेत हिंकार है, पारस्परिक सन्तोष प्रस्ताव
है, सहशयन उद्गीथ है, अभिमुखशयन प्रतिहार है, समाप्ति
निधन है, इस प्रकार जोड़ेसे वामदेव्यसामकी उपासना की
जाती है। वह, जो पुरुष इस प्रकार मिथुनमें वामदेव्यसामको
स्थित जानता है, सदा जोड़ेसे रहता है, उसका कभी वियोग
नहीं होता, मिथुनीभावसे उसके सन्तान उत्पन्न होती है। वह
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण महान् होता है। किसी भी पर-स्त्रीका कभी कहींसे भी
अपहरण न करे, कदापि व्यभिचारी न हो—यह व्रत है ॥१-२॥