सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८
तृतीय खण्ड
ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमे ही है
वे ये सत्यकाम अनृतके आच्छादनसे युक्त हैं। सत्य होनेपर वह यह आत्मा हृदयमें है। 'हृदि अयम्' (यह हृदयमें
भी अनृत उनका अधिधान (आच्छादन करनेवाला) है, है) यही इसका निरुक्त (व्युत्पत्ति) है। इसीसे यह
क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता 'हृदय' है। इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोक-
है, वह वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता। तथा इस को जाता है ॥ ३ ॥
लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे उत्थान कर परम
को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह
प्राप्त नहीं करता, उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित आत्मा है, यही अमृत एव अभय है ओर यही ब्रह्म है-
ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ इसके ये ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥
सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं। इस विषयमें यह वे ये 'सकार' 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं।
दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमे गड़े हुए सुवर्णके खजानेको उनमे जो 'सकार' है, वह अमृत है, जो 'तकार' हे, वह
उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी मर्त्य हे और जो 'यम्' है, उससे वह दोनोंका नियमन करता
नहीं जानते, इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको है, क्योकि इससे वह उन दोनोका नियमन करता है; इसलिये
जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता
गयी है ॥ १-२ ॥ है ॥ ५ ॥
चतुर्थ खण्ड
आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति
जो आत्मा है, वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है,
असघर्ष) के लिये इन्हें विक्षेगरूपसे धारण करनेवाला सेतु इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही
है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है।
जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा
हो स क्ते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि [शास्त्र एव आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं, उन्हीं-
यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता हे तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें
अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी यथेच्छगति हो जाती है ॥ १-३ ॥
पञ्चम खण्ड
ब्रह्मचर्यकी महिमा
अब [लोकमें] जिसे 'यज्ञ' (परम पुरुषार्थका साधन) भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको
कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके जानकर पुरुष मनन करता है। तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट
द्वारा ही उस (ब्रह्मलोक) को प्राप्त होता है। और जिसे न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे
'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा
द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है। तथा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरण्ययन ऐसा कहा जाता है
जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और
क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्-परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरमदीय सरोवर
है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी
है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय

खण्ड ७ ] ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५५
मण्डप है। उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' की प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो
और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोक- जाती है ॥ १-४ ॥
षष्ठ खण्ड
हृदयगत नाड़ियाँ ही उत्क्रमणका मार्ग हैं
अब ये जो हृदयकी नाड़ियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते
हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं, क्योंकि यह हैं- 'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ?'
आदित्य पिंगलवर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता, तबतक उन्हें
और यह लोहितवर्ण है। इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस जानता है। फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता
प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस है, उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह
(दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है, उसी प्रकार ये सूर्यकी 'ॐ' ऐसा [कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ] ऊर्ध्वलोक
किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है,
प्रविष्ट हैं। वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य]
नाड़ियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाड़ियोंसे निकली हैं वे इस निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका
आदित्यमें व्याप्त हैं। ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है। इस विषयमें यह
हुआ-भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न मन्त्र है-'हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमेंसे एक
होकर स्वप्न नहीं देखता, उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर
जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है, शेष इधर-उधर
व्याप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ जानेवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमण-
अब जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता का कारण होती हैं [उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती] ॥४-६॥
सप्तम खण्ड
इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश
जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, इच्छासे रहे हो ?" उन्होंने कहा-'जो आत्मा पापरहित,
क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, [इन जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम
आठ स्वरूपभूत गुणोंसे युक्त है] उसे खोजना चाहिये और और सत्यसङ्कल्प है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे
उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माका
आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता अन्वेषणकर उसे विशेषरूपसे जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोक
है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्‌के
है-ऐसा प्रजापतिने कहा। प्रजापतिके इस वाक्यको देवता वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं। उसी आत्माको जाननेकी इच्छा
और असुर दोनोंने ही परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे- करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ १-३ ॥
'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसे जाननेपर जीव उनसे प्रजापतिने कहा-'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी
सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'-ऐसा देता है, आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म
निश्चयकर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा है।' [ तब उन्होंने पूछा-] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब
विरोचन-ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है, उनमें
लेकर प्रजापतिके पास आये। उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्य- आत्मा कौन-सा है ?" इसपर प्रजापतिने कहा-'मैंने जिस
वास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा-'तुम यहाँ किस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है, वही इन सबमें सब ओर
प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥

४५६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ८
अष्टम खण्ड
विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना
'जलपूर्ण शकोरेमें अपनेको देखकर तुम आत्माके विषयमें
जो न जान सको वह मुझे बतलाओ' ऐसा [प्रजापतिने कहा।]
उन्होंने जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने कहा- 'तुम
क्या देखते हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! हम अपने इस
समस्त आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं।'
उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलङ्कृत
होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके
शकोरेमें देखो।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलङ्कृत हो,
सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें
देखा। उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' उन
दोनोंने कहा-भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम
प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं,
उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत,
सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं।' तब प्रजापतिने कहा-
'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म
है।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ॥ १-३ ॥
प्रजापतिने उन्हें [ दूर गया] देखकर कहा-'ये दोनों
आत्माको उपलब्ध किये बिना - उसका साक्षात्कार किये बिना ही
जा रहे हैं, देवता हों या असुर-जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे,
उन्हींका पराभव होगा।' वह जो विरोचन था, शान्तचित्तसे
असुरोंके पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी-
'इस लोकमें यह आत्मा (शरीर) ही पूजनीय है और शरीर ही
सेवनीय है। शरीरकी ही पूजा और परिचर्या करनेवाला पुरुष
इस लोक और परलोक दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है।'
इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला
और यजन न करनेवाला पुरुष होता है, उसे शिष्टजन 'अरे !
यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं।
यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको
भिक्षा [गन्ध पुष्प-अन्नादि], वस्त्र और अलङ्कारोंसे सुसज्जित करते
हैं और उनके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे- ऐसा मानते हैं।४-५।
नवम खण्ड
इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन ओर प्रश्न
किन्तु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय
दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार
अलङ्कृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलङ्कृत होता
है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और
परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इसके अन्धे
होनेपर अन्धा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है
और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका
नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है। 'इस [छायात्मदर्शन]
मे मैं कोई भोग्य नहीं देखता।' इसलिये इन्द्र समित्पाणि होकर
फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा- 'इन्द्र !
तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे,अब किस
इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा-'भगवन् ! जिस
प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलङ्कृत
होनेपर अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर
सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो
जाता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा, स्राम होनेपर
स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस
शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई
फल दिखायी नहीं देता' ॥ १-२ ॥
'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है,' ऐसा प्रजापतिने कहा,
'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम
बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और
[ ब्रह्मचर्यसे] निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥
दशम खण्ड
स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन
'जो यह स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है, यह
आत्मा है' ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और
यही ब्रह्म है।' ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले
-गये। किन्तु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय
दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह
(स्वप्नशरीर) अनन्ध होता है, और यदि यह स्राम होता है
तो भी वह अस्राम होता है। इस प्रकार यह इसके दोषसे
दूषित नहीं होता। यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७
और न इसकी रुग्णतासे रुग्ण होता है । किन्तु इसे मानो कोई
मारता हो, कोई ताडित करता हो, यह मानो अप्रियका अनुभव
करता हो और रुदन करता हो—ऐसा हो जाता है, अतः इसमें
( इस प्रकारके आत्मदर्शनमें ) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥१-२॥
[ अतः ] वे समित्पाणि होकर फिर [ प्रजापतिके पास ]
आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त
होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने
कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह
( स्वप्नशरीर ) अनन्ध रहता है और यह रुग्ण होता है तो भी
वह नीरोग रहता है, इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं
होता । न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी
रुग्णतासे वह रुग्ण होता है, किन्तु उसे मानो कोई मारते हों,
कोई ताडित करते हों और [ उसके कारण ] मानो वह अप्रियका
अनुभव करता हो और रुदन करता हो—[ ऐसा अनुभव होनेके
कारण ] इसमे मै कोई फल नहीं देखता ।' तब प्रजापतिने
कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व)
की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास
करो ।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया, तब उनसे
प्रजापतिने कहा—॥ ३-४ ॥
एकादश खण्ड
इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए
'जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और
सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता, वह
आत्मा है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, यह अभय
है और यही ब्रह्म है।' यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये,
किन्तु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी
दिया—"उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं
होता कि 'यह मैं हूँ' ओर न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता
है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है।
इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता" वे समित्पाणि होकर पुन.
प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम
तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुन-
आगमन हुआ है ।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्थामें
तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मे हूँ'
और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह मानो विनाश-
को प्राप्त हो जाता है । इसमे मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता ।'
'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं
तुम्हारे प्रति इसकी पुन व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न
नहीं है । अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' उन्होंने
पाँच वर्ष और वहाँ निवास किया । ये सब मिलाकर एक
सौ एक वर्ष हो गये । इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके
यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास [ करके अधिकार प्राप्त ]
किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ १-३ ॥
द्वादश खण्ड
इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश
'इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है, यह मृत्युसे ग्रस्त है।
यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर
आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है। सशरीर रहते
हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होने-
पर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते । वायु अशरीर
है, अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि—ये सब अशरीर हैं। जिस
प्रकार ये सब उस आकाशसे उत्पन्न होकर सूर्यकी परम ज्योतिको
प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते है, उसी प्रकार यह
सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो
अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है ।
उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा
ज्ञातिजनके साथ रमण करता है और अपने साथ उत्पन्न हुए इस
शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस
प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमे जुता रहता है, उसी प्रकार यह
प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ १-३ ॥
जिसमे यह चक्षुद्भाग उपलक्षित आकाश अनुगत है वह
चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप ग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो
ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ, वह आत्मा है, उसके
गन्धग्रहणके लिये नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं यह
शब्द बोलूँ, वही आत्मा है, उसके शब्दोच्चारणके लिये
वागिन्द्रिय है। जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ,