कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४१० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १
४१० * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय १
वह आकाशमें विचरनेवाला सूर्य ही उद्गीथ है और यही प्रणव
भी है। अर्थात् सूर्यमें ही परमात्मा और उनके वाचक 'ॐ'
की भावना करनी चाहिये, क्योंकि यह 'ॐ' इस प्रकार
उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। यहाँ 'स्वरन् एति'
(उच्चारण करता हुआ गमन करता है)—इस प्रकार 'सूर्य'
शब्दकी व्युत्पत्ति की गयी है ॥ १ ॥
एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे इस प्रकार
कहा—'बेटा ! मैने इसी सूर्यको लक्ष्य करके ओंकारका भली-
भाँति गान किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। तू सूर्यकी
किरणोंका सब ओरसे आवर्तन कर—उन सबके रूपमें
ओंकारका बार-बार चिन्तन कर; निःसन्देह तेरे बहुत-से पुत्र
हो जायेंगे।' इस प्रकार यह आधिदैविक—देवतासम्बन्धी
उपासना है ॥ २ ॥
अब पुनः आध्यात्मिक (शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली)
उपासनाका प्रकार बताया जाता है। जो यह श्वासके रूपमें
चलनेवाला मुख्य प्राण है, उसीके रूपमें उद्गीथकी—गानेयोग्य
परमात्माकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि वह 'ॐ' इस
प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। प्राण सूर्यरूप
है, इसीलिये 'स्वरन् एति' इसी प्रकार यहाँ भी व्युत्पत्ति की
गयी है। अर्थात् हमारे प्राणके द्वारा निरन्तर ओंकारकी ध्वनि
हो रही है—ऐसी भावना करते हुए उसमें ओंकाररूप
परमात्माका ध्यान करना चाहिये ॥ ३ ॥
एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे यह बात कही
कि "बेटा ! मैने इस प्राणको ही लक्ष्य करके—इसीमें
परमात्माकी भावना करते हुए ओंकारका भलीभाँति गान—
आवर्तन किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। 'निश्चय
ही मेरे बहुत से पुत्र होंगे' इस सङ्कल्पसे तू अनेक रूपोंमें
प्रतिष्ठित प्राणरूप परमात्माका भलीभाँति गान कर—
उपासना कर"*॥ ४ ॥
अब कहते हैं कि निश्चय ही सामका जो उद्गीथ नामक
भाग है, वही प्रणव है, क्योंकि प्रणव उसका सार है। और
जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। अर्थात् दोनोंमें कोई भेद नहीं
है। इस रहस्यको जाननेवाला निःसन्देह होताके आसनसे ही
उद्गाताद्वारा किये गये दोषयुक्त उद्गानको प्रणवके उच्चारणसे
पीछे सुधार लेता है, क्योंकि भगवान्के नामोच्चारणसे यज्ञकी
सारी त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। यह इस ज्ञानकी महिमा
है ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
विविध रूपोंमें उद्गीथोपासना
यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह
अग्निरूप साम इस पृथिवीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित है—भलीभाँति
स्थित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता
है। पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है, वे दोनों मिलकर
'साम' हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम
है। वह यह वायुरूप साम इस अन्तरिक्षरूप ऋक्में प्रतिष्ठित
है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
अन्तरिक्ष ही मानो 'सा' है और वायु 'अम' है, वे दोनों
मिलकर साम हैं। पुनः द्युलोक—स्वर्गलोक ही ऋक् और
सूर्य ही साम है। वह यह सूर्यरूप साम इस स्वर्गरूप ऋक्में
प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया
जाता है। द्युलोक ही मानो 'सा' है और सूर्य मानो 'अम' है,
वे दोनों मिलकर साम हैं। समस्त नक्षत्रमण्डल ही ऋक् है
और चन्द्रमा साम है। वही यह चन्द्रमारूप साम इस नक्षत्र-
रूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका
गान किया जाता है। नक्षत्रमण्डल ही मानो 'सा' है और
चन्द्रमा 'अम' है, दोनों मिलकर साम हैं ॥१-४ ॥
अब दूसरी बात कहते हैं। जो यह प्रत्यक्ष दीखनेवाली
सूर्यकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो उसके भीतर
छिपा हुआ नीलापन और अतिशय श्यामता है, वह साम है।
वह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित
है, इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
इसके सिवा यह जो सूर्यकी श्वेत प्रभा—उज्ज्वल प्रकाश है,
वही 'सा' है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम प्रभा है, वह
'अम' है। वे दोनों मिलकर साम हैं। तथा सूर्यमें जो यह
उसका अन्तर्यामी स्वर्णसदृश प्रकाशस्वरूप पुरुष दिखायी देता
है—जिसकी दाढी सुवर्णकी भाँति प्रकाशमय है तथा केश भी
सोनेकी ही भाँति चमचमाते हैं और जो नखके अग्रभागसे
लेकर चोटीतक सब का सब स्वर्णमय प्रकाशयुक्त है, वह
परमपुरुष परमेश्वर ही है। उस सुवर्णसदृश प्रकाशयुक्त पुरुषके
दोनों नेत्र ऐसे हैं, जैसे कोई लाल कमल हो। उसका 'उत'
- जो बात इन्हीं ऋषिने दूसरे मन्त्रमें सूर्यके सम्बन्धमें कही थी, वही यहाँ प्राणके सम्बन्धमें कही गयी है। इससे भी प्राण और
सूर्यकी एकता प्रतिपादित होती है। प्रश्नोपनिषद्में प्राण और सूर्यकी एकताका भलीभाँति निरूपण हुआ है।
खण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४११.
(सबसे ऊपर उठा हुआ) यह नाम है। वह यह परमेश्वर
समस्त पापोंसे ऊपर उठा हुआ है। जो कोई उपासक इस
प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब पापोंसे ऊपर उठ
जाता है ॥ ५-७ ॥
ऋग्वेद और सामवेद उस परमात्माके ही गुणगान हैं,
इसलिये वह उद्गीथ है, तथा इसीलिये जो उद्गाता है, वह
वास्तवमें उसीका गान करनेवाला है। जो स्वर्गलोकसे भी
ऊपरके लोक हैं, उनका भी तथा देवताओंके भोगोंका भी
शासन वह परमात्मा ही करता है। यह आधिदैविक उपासना
समाप्त हुई ॥ ८ ॥
सप्तम खण्ड
शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना
अब वही बात शरीरकी दृष्टिसे समझायी जाती है। वाक्-
इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण साम है। वही यह प्राणरूप साम
वाणीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये
ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। वाणी ही ‘सा’
है, प्राण ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र
ही ऋक् है और उसके भीतरकी काली पुतली साम है। वही
यह आँखकी पुतलीरूप साम इस नेत्ररूप ऋक्में प्रतिष्ठित
है। इसीलिये ऋक्मे प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
नेत्र ही ‘सा’ है और पुतली ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम
हैं। पुन श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही यह मनरूप
साम श्रोत्ररूप ऋक्मे प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। श्रोत्र ही ‘सा’ है, मन ‘अम’
है, दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रोंकी श्वेत आभा
है, वही ऋक् है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम आभा
है, वह साम है। वही यह श्याम आभारूप साम इस श्वेत
आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रकी श्वेत आभा
है, वही ‘सा’ है; और जो नील और अतिशय श्याम आभा
है, वह ‘अम’ है, उन दोनोंका सम्मिलित रूप साम है।
तथा यह जो नेत्रके भीतर पुरुष दिखायी देता है, वही ऋक्
है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह
है और वही ब्रह्म है। इस पुरुषका वही रूप है, जो छठे
खण्डमें वर्णित आदित्यमण्डलमें स्थित पुरुषका रूप है। जो
उसके गुणगान हैं, वे ही इसके गुणगान हैं और जो उसका
नाम (उत्) है, वही इसका भी नाम है। पृथिवीसे नीचे
जो भी लोक हैं, उनका यही पुरुष शासन करता है तथा
मनुष्योंके भोग भी उसीके अधीन हैं। इसलिये जो लोग
वीणापर गाते हैं, वे इन्हीं परमेश्वरका गुणगान करते हैं, इसीसे
वे धनलाभ करते हैं—अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं। तथा
इस रहस्यको इस रूपमें जाननेवाला जो उपासक साम-गान
करता है, वह नेत्रस्थित तथा आदित्यमण्डलवर्ती दोनों ही
पुरुषोंका गुणगान करता है, वह उन परमेश्वरसे ही अभीष्ट
लाभ करता है। जो भी उस सूर्यलोकसे ऊपरके लोक हैं, उन
सबको तथा देवताओंके भोगोंको भी वह प्राप्त कर लेता है।
तथा सूर्यलोक अथवा मनुष्यलोकसे नीचेके जो भी लोक हैं,
उनको तथा मनुष्योंके भोगोंको भी वह इन परमपुरुषसे ही
प्राप्त कर लेता है। इसलिये निस्सन्देह इस प्रकार जाननेवाला
उद्गाता यजमानसे यों कहे—'मैं तेरे लिये कौन-सी अभीष्ट
वस्तुका गानके द्वारा आवाहन करूँ?' क्योंकि जो इस रहस्यको
इस प्रकार जानकर सामका गान करता है, वही वाञ्छित
भोगोंका गानद्वारा आवाहन करनेमें समर्थ होता है ॥ १-९ ॥
अष्टम खण्ड
उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और दाल्भ्यका संवाद
प्रसिद्ध है, तीन ऋषि उद्गीथका तत्त्व जाननेमें कुशल थे—
एक तो शालावान्के पुत्र शिलक, दूसरे चिकितायनके पुत्र
दाल्भ्य* और तीसरे जीवळके पुत्र प्रवाहण। एक बार वे
तीनों आपसमें इस प्रकार कहने लगे—‘निश्चय ही हमलोग
उद्गीथविद्यामें कुशल हैं, इसलिये यदि सबकी सम्मति हो तो
हम उद्गीथके विषयमें बातचीत करें।' 'बहुत ठीक है, ऐसा
ही हो' यों कहकर वे सब एक स्थानपर सुखसे बैठ गये।
तब प्रसिद्ध राजर्षि जीवळके पुत्र प्रवाहण ऋषि श्रेष्ठ दोनोंसे;
- दाल्भ्यका अर्थ है दल्भकी सन्तान। यहाँ उनके पिताका नाम चिकितायन दिया गया है। ऐसी दशामें सम्भव है ये दल्भ-
गोत्रमें उत्पन्न रहे हों, इसीलिये दाल्भ्य कहलाये हों। अथवा सम्भव है, ये द्वयामुष्यायण रहे हों। 'द्वयामुष्यायण' उन्हें कहते हैं, जो
किसी दूसरेके गोद आये हों और जिन्होंने अपने जन्म देनेवाले पिताका उत्तराधिकार भी न छोड़ा हो। इस प्रकार वे दो पिताओंके
पुत्र होते हैं। दो पिताओंके पुत्रकी ही हिंदू धर्म-शास्त्रोंमें 'द्वयामुष्यायण' संज्ञा है।