कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४११.
(सबसे ऊपर उठा हुआ) यह नाम है। वह यह परमेश्वर
समस्त पापोंसे ऊपर उठा हुआ है। जो कोई उपासक इस
प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब पापोंसे ऊपर उठ
जाता है ॥ ५-७ ॥
ऋग्वेद और सामवेद उस परमात्माके ही गुणगान हैं,
इसलिये वह उद्गीथ है, तथा इसीलिये जो उद्गाता है, वह
वास्तवमें उसीका गान करनेवाला है। जो स्वर्गलोकसे भी
ऊपरके लोक हैं, उनका भी तथा देवताओंके भोगोंका भी
शासन वह परमात्मा ही करता है। यह आधिदैविक उपासना
समाप्त हुई ॥ ८ ॥
सप्तम खण्ड
शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना
अब वही बात शरीरकी दृष्टिसे समझायी जाती है। वाक्-
इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण साम है। वही यह प्राणरूप साम
वाणीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये
ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। वाणी ही ‘सा’
है, प्राण ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र
ही ऋक् है और उसके भीतरकी काली पुतली साम है। वही
यह आँखकी पुतलीरूप साम इस नेत्ररूप ऋक्में प्रतिष्ठित
है। इसीलिये ऋक्मे प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है।
नेत्र ही ‘सा’ है और पुतली ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम
हैं। पुन श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही यह मनरूप
साम श्रोत्ररूप ऋक्मे प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। श्रोत्र ही ‘सा’ है, मन ‘अम’
है, दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रोंकी श्वेत आभा
है, वही ऋक् है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम आभा
है, वह साम है। वही यह श्याम आभारूप साम इस श्वेत
आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित
सामका गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रकी श्वेत आभा
है, वही ‘सा’ है; और जो नील और अतिशय श्याम आभा
है, वह ‘अम’ है, उन दोनोंका सम्मिलित रूप साम है।
तथा यह जो नेत्रके भीतर पुरुष दिखायी देता है, वही ऋक्
है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह
है और वही ब्रह्म है। इस पुरुषका वही रूप है, जो छठे
खण्डमें वर्णित आदित्यमण्डलमें स्थित पुरुषका रूप है। जो
उसके गुणगान हैं, वे ही इसके गुणगान हैं और जो उसका
नाम (उत्) है, वही इसका भी नाम है। पृथिवीसे नीचे
जो भी लोक हैं, उनका यही पुरुष शासन करता है तथा
मनुष्योंके भोग भी उसीके अधीन हैं। इसलिये जो लोग
वीणापर गाते हैं, वे इन्हीं परमेश्वरका गुणगान करते हैं, इसीसे
वे धनलाभ करते हैं—अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं। तथा
इस रहस्यको इस रूपमें जाननेवाला जो उपासक साम-गान
करता है, वह नेत्रस्थित तथा आदित्यमण्डलवर्ती दोनों ही
पुरुषोंका गुणगान करता है, वह उन परमेश्वरसे ही अभीष्ट
लाभ करता है। जो भी उस सूर्यलोकसे ऊपरके लोक हैं, उन
सबको तथा देवताओंके भोगोंको भी वह प्राप्त कर लेता है।
तथा सूर्यलोक अथवा मनुष्यलोकसे नीचेके जो भी लोक हैं,
उनको तथा मनुष्योंके भोगोंको भी वह इन परमपुरुषसे ही
प्राप्त कर लेता है। इसलिये निस्सन्देह इस प्रकार जाननेवाला
उद्गाता यजमानसे यों कहे—'मैं तेरे लिये कौन-सी अभीष्ट
वस्तुका गानके द्वारा आवाहन करूँ?' क्योंकि जो इस रहस्यको
इस प्रकार जानकर सामका गान करता है, वही वाञ्छित
भोगोंका गानद्वारा आवाहन करनेमें समर्थ होता है ॥ १-९ ॥
अष्टम खण्ड
उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और दाल्भ्यका संवाद
प्रसिद्ध है, तीन ऋषि उद्गीथका तत्त्व जाननेमें कुशल थे—
एक तो शालावान्के पुत्र शिलक, दूसरे चिकितायनके पुत्र
दाल्भ्य* और तीसरे जीवळके पुत्र प्रवाहण। एक बार वे
तीनों आपसमें इस प्रकार कहने लगे—‘निश्चय ही हमलोग
उद्गीथविद्यामें कुशल हैं, इसलिये यदि सबकी सम्मति हो तो
हम उद्गीथके विषयमें बातचीत करें।' 'बहुत ठीक है, ऐसा
ही हो' यों कहकर वे सब एक स्थानपर सुखसे बैठ गये।
तब प्रसिद्ध राजर्षि जीवळके पुत्र प्रवाहण ऋषि श्रेष्ठ दोनोंसे;
- दाल्भ्यका अर्थ है दल्भकी सन्तान। यहाँ उनके पिताका नाम चिकितायन दिया गया है। ऐसी दशामें सम्भव है ये दल्भ-
गोत्रमें उत्पन्न रहे हों, इसीलिये दाल्भ्य कहलाये हों। अथवा सम्भव है, ये द्वयामुष्यायण रहे हों। 'द्वयामुष्यायण' उन्हें कहते हैं, जो
किसी दूसरेके गोद आये हों और जिन्होंने अपने जन्म देनेवाले पिताका उत्तराधिकार भी न छोड़ा हो। इस प्रकार वे दो पिताओंके
पुत्र होते हैं। दो पिताओंके पुत्रकी ही हिंदू धर्म-शास्त्रोंमें 'द्वयामुष्यायण' संज्ञा है।