कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
[ अध्याय ४
[ अध्याय ४
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- छान्दोग्योपनिषद् *
हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमे लीन कर लेता
है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ १ २ ॥
अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही सवर्ग है ।
जिस समय यह पुरुष सोता है, प्राणको ही वागिन्द्रिय प्राप्त
हो जाती है, प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको
ही मन प्राप्त हो जाता है । प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन
कर लेता है । वे ये दो ही सवर्ग हैं—देवताओंमें वायु और
इन्द्रियोंमें प्राण ॥ ३-४ ॥
एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षरसेनके पुत्र
अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक
ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी, किंतु उन्होंने उसे भिक्षा नहीं दी ।
तब उसने कहा—'भुवनोंकेरक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार
महात्माओको ग्रस लिया है । कापेय ! अभिप्रतारिन् ! मनुष्य
अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं
देखते, तथा जिसके [ब्रह्मचारीके रूपमें आये हुए भगवान्के]
लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ।' उस वाक्यका
कपिगोत्रोत्पन्न शौनकरने मनन किया और फिर उस [ब्रह्मचारी]
के पास आकर कहा—'जो देवताओका आत्मा, प्रजाओंका
उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी
बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरेसे न खाया जानेवाला
और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता
है, ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं।' [ ऐसा कह-
कर उसने सेवकोको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा
दो' ॥ ५-७ ॥
तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी । वे ये [ अग्न्यादि और
वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं तथा इनसे [ वागादि
और प्राण ] ये पाँच अन्य हैं । इस प्रकार ये सब दस होते
हैं । ये दस कृत ( कृतनामक पासेमे उपलक्षित द्यूत ) हैं ।
अत सम्पूर्ण दिशाओमे ये अन्न ही दस कृत हैं । यह विराट् ही
अन्नादी ( अन्न भक्षण करनेवाला ) है । उसके द्वारा यह सब
देखा जाता है । जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब
देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥८॥
चतुर्थ खण्ड
जवालापुत्र सत्यकामद्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन
जवालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जवालाको
सम्बोधित करके निवेदन किया—'पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक
[ गुरुकुलमे ] निवास करना चाहता हूँ, बता मैं किस
गोत्रवाला हूँ ?' उसने उससे कहा—'हे बेटा ! तू जिस
गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । युवावस्था में, जब कि मै
बहुत कार्य करनेवाली परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया
था । मै यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मै तो
जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अत तू
अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना ।' उसने हारिद्रुमत
गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्के यहाँ ब्रह्मचर्य-
पूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ।'
उससे [ गौतमने ] कहा—'सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?'
उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं
जानता । मैने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया
कि 'युवावस्था मे, जब कि मैं बहुत काम धन्धा करनेवाली
परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया था । म यह नही जानती
कि तू किस गोत्रवाला है ? म जबाला नामवाली हूँ और तू
सत्यकाम नामवाला है।' अतः गुरो ! मे सत्यकाम जाबाल
हूँ।' उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर
नहीं कर सकता । अत. सोम्य ! तू समिधा ले आ, मै तेरा
उपनयन कर दूँगा, क्योंकि तूने सत्यका त्याग नही किया ।'
तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ
अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे
जा ।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र
गायें हुए बिना में नहीं लोटूँगा ।' जबतक कि वे एक सहस्र
हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमे ही रहा ॥ १-५ ॥
पञ्चम खण्ड
सत्यकामको वृषभद्वारा ब्रह्मके एक पादका उपदेश
तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने
'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला—] 'हे सोम्य !
हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमे आचार्यकुलमें पहुँचा
दे ।' [ साँडने कहा ] '[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद
बतलाऊँ ?' तब [ सत्यकामने ] कहा—'भगवन् ! मुझे
[ अवश्य ] बतलावे ।' साँड उससे बोला—'पूर्व दिक्कला,
खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२९
पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना
सोम्य ! यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान्
पाद है।' वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके लोकोंको जीत लेता है ॥ १-३ ॥
षष्ठ खण्ड
अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश
'अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर तब ] [ सत्यकामने कहा-] 'भगवन् ! मुझे [ अवश्य ]
ऋषभ मौन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल- बतलावें ।' तब उसने उससे कहा-'पृथ्वी कला है, अन्तरिक्ष
की ओर हाँक दिया । वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है । सोम्य ! यह
अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है।' वह, जो
पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी
ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया । 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें
'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [अग्निने कहा, अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है।१-४।
सप्तम खण्ड
हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश
'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि [ सत्यकाम बोला--] 'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब वह
निवृत्त हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी उससे बोला-'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है
ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह और विद्युत् कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है।' जो कोई इसे इस प्रकार जानने-
अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा । तब हंसने उसके समीप वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे
उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता
[ इसने कहा— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश
'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर [ सत्यकाम बोला-] 'भगवन् ! मुझे अवश्य बतलावें ।' वह
हंस चला गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर उससे बोला-'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है
हाँक दिया। वे सायकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि और मन कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे 'आयतनवान्' नामवाला है।' वह, जो इसे इस प्रकार जानने-
पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । मद्गुने उसके पास उतरकर वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे
कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें आयतनवान् होता
[ मद्गु बोला— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४ ॥
नवम खण्ड
सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश-ग्रहण
सत्यकाम आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा- तू ब्रह्मवेत्ता-सा दिखलायी दे रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया
'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' 'सोम्य ! है ?' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] । तब उसने उत्तर दिया,