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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

४४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

४४८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६
अणुके समान दाने हैं। [अरुणि-] 'अच्छा, वत्स ! सोम्य ! तू [ इस कथनमे ] श्रद्धा कर।' वह जो यह अणिमा
इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०-] 'फोड़ दिया भगवन् !' है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और
[आरुणि-] 'इसमें क्या देखता है ? [श्वेत०-] 'कुछ श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर
नहीं भगवन् ! तब उससे [आरुणिने] कहा-'हे सोम्य ! श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब
इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता सोम्य ! उस आरुणिने ] 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥
अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है। हे
त्रयोदश खण्ड
नमकका दृष्टान्त
'इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-]
आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही 'अच्छा अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।' उसने वैसा
किया। तब आरुणिने उससे कहा-'वत्स ! रात तुमने जो ही किया [और बोला-] 'उस जलमे नमक सदा ही
नमक जलमें डाला था उसे ले आओ। किंतु उसने ढूँढ़नेपर विद्यमान था। तब उससे पिताने कहा-'सोम्य !
उसे उसमें न पाया। [आरुणि-] 'जिस प्रकार वह नमक [इसी प्रकार] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे
इसीमें विलीन हो गया है [इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख देखता नहीं है; परन्तु वह निश्चय यहीं विद्यमान है।' वह जो
सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो] इस जलको ऊपरसे यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह
आचमन कर।' [उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा-] आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस
'कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-] प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर
'बीचमेंसे आचमन कर' 'अब कैसा है ?' [श्वेत०-] समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा
'नमकीन है।' [आरुणि-] 'नीचेसे आचमन कर' 'अब कहा ॥ १-३ ॥
चतुर्दश खण्ड
आँख बँधे हुए पुरुषका दृष्टान्त
हे सोम्य ! जिस प्रकार [कोई चोर ] जिसकी आँखें ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार
बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को ] जानता है; उसके
स्थानमें छोड़ दे। उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व उत्तर, लिये [मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह
दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे [देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह
आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है। वह जो यह अणिमा
छोड़ दिया गया है। उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और
कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर
जा तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब
आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥
पञ्चदश खण्ड
मुमूर्षु का दृष्टान्त
सोम्य ! [ज्वरादिसे ] सन्तप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान
ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं-'क्या तू मुझे लेता है। फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती
जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ! जबतक उसकी है तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो
वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमे जाता है, तब वह नहीं पहचानता। वह जो यह अणिमा है,

खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४५
एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब
श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥
००९००
षोडश खण्ड
मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान
हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे
लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे
है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है। वह जिस
(चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रकार उस [ परीक्षाके ] समय नहीं जलता [ उसी प्रकार
प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको विद्वान्का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है ]।
मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है, किंतु यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे
वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है। और यदि वह श्वेतकेतो ! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान
उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको गया—उसे जान गया ॥ १-३ ॥

॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥