कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
' ब्राह्मण ९] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८५
' ब्राह्मण ९] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८५
याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति
(विशालता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिन धर्मोंसे
युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं
धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है। वृक्षके पत्ते
होते हैं और पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोम होते हैं;
पुरुषके शरीरमे जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस
वृक्षके बाहरी भागमे छाल होती है। पुरुषकी त्वचासे ही
रक्त निकलता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद
निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही
जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षमे रस निकलता है, उसी
प्रकार चोट खाये हुए पुरुष शरीरसे रक्त प्रवाहित होता
है। पुरुषके शरीरमे मास होते हैं और वनस्पतिके शकर
(छालका भीतरी अग), पुरुषके स्नायु (शिरा) होते हैं और
वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अगविशेष)। वह
किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु जालके
भीतर जैसे हड्डियाँ होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर
काष्ठ है तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की
गयी है। किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो वह अपने
मूलसे पुन. और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो आता है,
इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह (वृक्षकी
भाँति) किस मूलसे उत्पन्न होगा ?। वह वीर्यसे उत्पन्न होता
है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही
उत्पन्न होता है [मृत पुरुषसे नहीं]। वृक्ष भी [केवल
तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है;
किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुन:
अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है।
पर यदि वृक्षको जड़सहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर
उत्पन्न नहीं होगा, इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन
कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ?। [यदि ऐसा
माना जाय कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः
फिर उत्पन्न नहीं होता [तो यह ठीक नहीं, क्योकि वह
मरकर पुन. उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके
पश्चात् इसे पुन. कोन उत्पन्न करेगा ? [यह प्रश्न है,
ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वय
ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह
धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान) की परम गति है और
ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है॥ १-७ ॥॥ २८ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥