कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २
६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २
मात्राओंमेंसे प्रत्येक मात्रा तीन तीन कलारूपी मुखसे सुशोभित का उत्क्रमण होनेपर वह महिमाशाली यक्ष होता है । तृतीया
है । इस प्रकार द्वादशकलात्मक 'ॐकार' कहा गया है । मात्रामे विद्याधर, और चतुर्थीमे गन्धर्व होता है। यदि पञ्चमी
धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा इसको जानना चाहिये । मात्रामें उसका प्राणोंसे वियोग होता है तो वह तुषित नामके
उन द्वादश कलाओंमें प्रथमा मात्रा 'घोषिणी' कहलाती है, देवताओंके साथ रहता हुआ चन्द्रलोकमे सम्मानित होता है। षष्ठी
द्वितीया 'विद्युन्माला', तृतीया 'पतङ्गी', चतुर्थी 'वायुवेगिनी', मात्रामें (मृत्यु होनेपर) इन्द्रका सायुज्य प्राप्त होता है । सप्तमी-
पञ्चमी 'नामधेया' और षष्ठी मात्रा 'ऐन्द्री' कहलाती है । में भगवान् विष्णुक पद ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्राप्त करता
सप्तमीका नाम 'वैष्णवी' है और अष्टमी 'शाङ्करी' कहलाती है । अष्टमीमें रुद्रलोकमे जाकर पशुपति भगवान् शङ्करका
है । नवमी 'महती', दशमी 'ध्रुवा', एकादशी 'मौनी' और सामीप्य लाभ करता है । नवमी मात्रामें महर्लोक, दशमी
द्वादशी मात्रा 'ब्राह्मी' कहलाती है । यदि प्रथमा मात्रामें मात्रामे ध्रुवलोक, एकादशी मात्रामें तपोलोक तथा द्वादशी
उपासकका प्राणान्त होता है तो वह भारतवर्षमें सार्वभौम मात्रामें प्राणका उत्क्रमण होनेपर उपासक शाश्वत ब्रह्मलोकमें
चक्रवर्ती राजाके रूपमें जन्म लेता है । द्वितीया मात्रामें प्राणों- (ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ) प्रतिष्ठित होता है ॥ १-१० ॥
तृतीय खण्ड
योगयुक्त स्थितिका वर्णन
इसकी अपेक्षा भी परतर—श्रेष्ठ, शुद्ध, व्यापक, निष्कल में ही आसक्त है, वह योगमार्गके द्वारा स्वस्थ होकर सब
तथा कल्याणस्वरूप सदा उदित परब्रह्म-तत्त्व है; उसीसे प्रकारकी लौकिक आसक्तियोंसे मुक्त हो धीरे-धीरे शरीरमें
अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि सभी प्रकारकी ज्योतियोंका उदय आत्माभिमानको त्याग दे । तब उसका संसार-बन्धन
होता है । जब मन इन्द्रियातीत और सत्त्व आदि तीनों नष्ट हो जाता है; वह निर्मल, कैवल्य-प्राप्त और
गुणोंके परे परतत्त्वमें लीन होता है, तब वह उपमारहित और परमात्मस्वरूप हो जाता है । और उसी ब्रह्मभावसे
अभावरूप हो जाता है। उस स्थितिमें साधकको योगयुक्त परमानन्दको प्राप्त करता है, परमानन्दका उपभोग करता
कहना चाहिये। जो परमात्माका भक्त है, जिसका मन परमात्मा- है ॥ १-४ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता
हे महामते ! निरन्तर प्रयत्न करके आत्माके स्वरूपको प्रकार यह जाग्रत्-कालका शरीर भी अध्यासमात्र है । अध्यस्त
जानकर उसीके चिन्तनमे अपना समय व्यतीत करो, समस्त पदार्थकी उत्पत्ति कहाँ होती है । और जिसकी उत्पत्ति नहीं
प्रारब्धकर्मोंके भोगोंको भोगते हुए तुम्हे उद्विग्न नहीं होना हुई, उसकी स्थिति कहाँ । ( जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास
चाहिये । आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्ध स्वयं नहीं छोड़ता। होनेपर रज्जुमें सर्प नहीं पैदा होता और न वहाँ सर्पकी
परन्तु जब तत्त्वज्ञानका उदय होता है, तब ज्ञानीकी दृष्टिमे स्थिति ही होती है ।) इस प्रपञ्चका उपादान-कारण आत्मा
प्रारब्धकर्मका उसी प्रकार अभाव हो जाता है, जिस प्रकार है, जिस प्रकार मिट्टीके पात्रोंका उपादान-कारण मिट्टी है ।
स्वप्नलोकके देहादिक असत् होनेके कारण जागनेपर नहीं वेदान्तके अनुसार यह प्रपञ्च अज्ञानके कारण आत्मामें भासता
रह जाते । जन्मान्तरके लिये हुए जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध है, यदि अज्ञान नष्ट हो जाय तो विश्वकी विश्वता कहाँ रहेगी।
कहे गये हैं। परन्तु ज्ञानीके लिये तो जन्मान्तर भी नहीं है, जिस प्रकार भ्रमसे मनुष्य रज्जुबुद्धिका त्याग करके उसे सर्प-
अत उसके लिये कभी भी प्रारब्ध नहीं रहता । जिस प्रकार बुद्धिसे ग्रहण करता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुष सत्य
स्वप्नकालीन देह देह नहीं होती अध्यासमात्र होती है, उसी (आत्मा)का ज्ञान न होनेके कारण प्रपञ्चको देखता है ।
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७१
जब सामने रस्सीके टुकड़ेको अच्छी तरह पहचान लेनेपर शिवस्वरूप परमात्माका आविर्भाव होता है—ठीक वैसे ही,
जैसे उसमें प्रतीत होनेवाला सर्परूप नहीं रह जाता, उसी जिस प्रकार मेघके दूर हो जानेपर सूर्यनारायण प्रकाशित हो
प्रकार अधिष्ठानस्वरूप आत्माका ज्ञान होनेपर जब प्रपञ्च भी उठते हैं। योगी सिद्धासनसे बैठकर वैष्णवी मुद्रा¹ धारण करके
शून्यताको प्राप्त हो जाता है, तब देह भी प्रपञ्चरूप ही दहिने कानके भीतर उठते हुए नाद ( अनाहत ध्वनि )
होनेके कारण उसके साथ ही शून्यतामें परिणत हो जाता है। को सदा सुनता रहे। इस प्रकार अभ्यासमें लाया हुआ नाद
उस अवस्था मे प्रारब्धकी स्थिति कैसे रह सकती है। अज्ञानी- वाह्य ध्वनियोंको आवृत कर लेता है। इस प्रकार एक पक्ष
जनोंको समझानेके लिये प्रारब्धकी बात कही जाती है। अर्थात् अकारको जीतकर दूसरे पक्ष उकारको जीते और
तदनन्तर कालवश ही प्रारब्धके नष्ट हो जानेपर प्रणव और क्रमशः सम्पूर्ण प्रणवपर विजय प्राप्तकर तुर्यपद अर्थात्
ब्रह्मकी एकताके चिन्तनसे नादरूपमें साक्षात् ज्योतिर्मय, आत्मसाक्षात्कारको प्राप्त होता है ॥ १-११ ॥
द्वितीय खण्ड
नादके अनेक प्रकार
अभ्यासके प्रारम्भमें यह नाद बहुत जोर-जोरसे और तथा नगारेकी ध्वनिके समान वह नाद सुनायी देता है और
नाना प्रकारसे सुनायी देता है और अभ्यासके बढ़ जानेपर अन्तमें किङ्किणी, वंशी, वीणा तथा भ्रमरकी ध्वनिके समान
वह सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर रूपमें सुनायी पड़ता है। प्रारम्भमें समुद्र, मधुर नाद सुन पड़ता है। इस प्रकार सूक्ष्म-से-सूक्ष्म होते हुए
बादल, भेरी तथा झरनोंसे उत्पन्न ध्वनिके समान एव मृदङ्ग, घंटे नाना प्रकारके नाद सुनायी पड़ते हैं ॥ १-३ ॥
तृतीय खण्ड
नादानुसंधान
जब महान् भेरी आदिकी ध्वनि सुन पड़े, तब उसमे मन उस नादके साथ ही सहसा चिदाकाशमे विलीन हो जाता
सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर नादका विचार करे—घने नादको छोड़कर है। इसलिये नाद-श्रवणसे अतिरिक्त विषयोंकी ओरसे उदासीन
सूक्ष्म नादमे अथवा सूक्ष्म नादको छोड़कर घने नादमें रमते होकर सयमी पुरुष निरन्तर अभ्यासके द्वारा मनको तत्काल
या जाते हुए मनको अन्यत्र न ले जाय। पहले जिस किसी अपने प्रति उत्सुक बनानेवाले नादका ही श्रवण एव चिन्तन
भी सूक्ष्म या घन नादमें मन लगता है, वहीं-वहीं वह स्थिर होकर करता रहे। सारी चिन्ताओंका त्याग करके, सारी चेष्टाओंको
उस नादके साथ ही विलीन हो जाता है। सारे वाह्य प्रपञ्चको छोड़कर नादका ही अनुसंधान करे; क्योंकि नादमें चित्त
भूलकर दूधमें मिले हुए पानीके समान नादमे एकीभूत हुआ विलीन होता है, नादमे चित्त विलीन होता है ॥ १-५ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
प्रथम खण्ड
नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है
जिस प्रकार पुष्परसका पान करता हुआ भ्रमर पुष्पगन्ध- चित्तरूपी आन्तरिक सर्प नादको ग्रहण करनेपर उस सुन्दर
की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नादमें सदा आसक्त नादकी गन्धसे बँधकर तत्काल सारी चपलताओंका
रहनेवाला चित्त विषयोंकी आकाङ्क्षा नहीं करता । यह परित्याग कर देता है। फिर ससारको भूलकर और
१ 'अन्तर्लक्ष्य वहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥
'बाहरकी ओर निर्निमेष दृष्टि हो और भीतरकी ओर लक्ष्य हो—सब तन्त्रोंमें गूढ भावसे बतायी हुई वह वैष्णवी मुद्रा यही है।'