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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कबीरकृष्णगीता ।

३३

भीम वचन ।

कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥

नकुल वचन ।

कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥

कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥

कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)

३४

कबीरकृष्णगीता ।

अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥
कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥
राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥

युधिष्ठिर वचन ।

कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥
जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥
तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥
पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥
और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥
तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥
तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥
जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥

कपिलमुनि वचन ।

धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥
कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥
आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥
एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥
सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥
तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥
दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥
बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥

कबीरकृष्णगीता ।

३५

इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥
यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥
जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥
तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥

दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥
किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥
दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥
देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥
थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥
सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥
दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥

कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥
तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥
कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥
जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥
कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥
अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥
सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥
अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥
कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥

३६

कवीरकृष्णगीता ।

हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥
अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥
जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥
राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥
हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥
दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥
सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥
दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥
सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥
सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥
राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥
इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥
जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे
निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥
निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥
निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥
क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥
जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥
निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥
आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥
अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥

कवीरकृष्णगीता ।

( ३७ )

स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥
स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥
देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥
स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥
नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥
छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥
सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥
केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥
जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥
रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥
दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥
सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥

निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥
विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥
फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥
पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥
भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥
घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥
भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥

कबीर शरण विना मुक्ति नहीं

३८

कर्बारुक्षणगीता ।

सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥
सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥
छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥
छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥
कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥
सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥

दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥
जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥

योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥
सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥

दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥

विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥
अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥
स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥
कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥
विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥
जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥
जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥
जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥
जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥

कवीरुष्णगीता ।

३९

सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥
जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥
जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥
जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥
थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥
तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥
जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥
जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥
जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥
जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥
जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥
आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥
प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥
सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥
माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥
जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥
तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥
जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥
जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥
तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥
कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥

सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना

४०

कबीरकृष्णगीता ।

जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥
जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥
चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥
विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा ।
अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥
दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥

कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं
बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई
कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥
उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा
स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥
महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥
पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥

विष्णुवचन ।

कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥
पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥
आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥
अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥

दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥
कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥

कवीरकृष्णगीता ।

४१

कवीरवचन ।

कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥
प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥
त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥
रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥
अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥
प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥
शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥
प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥
त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥
पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥
अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥
एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥
त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥
पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥
श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥
सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥
जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥
निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥
देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥
दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥
अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥

व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना

४२

कबीररुणगीता ।

दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।

बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥
अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥
चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥
मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥
गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥
एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥
पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥
जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥
चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी
शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥
नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥
तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥
मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥
निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥
एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥
सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥
बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥
कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥

व्यास उवाच ।

कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥
कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥

कबीरकृष्णगीता ।

४३

कबीरवचन ।

कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥
कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥
ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥
ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥
हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥
परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥
दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार ।
उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥
भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥
चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥
सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥

हंसवचन ।

कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥
सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥
यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥
सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥
जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥
ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥

दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण ।
जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥

कबीरका उपदेश

४४

कबीरकृष्णगीत ।

चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥
पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥
सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥
सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥

कबीरवचन !

कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥

दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।

सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥
सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥
कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥
कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥
सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥
जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥
करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥
करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥
निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥
सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥
जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥
अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥
अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥
विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥
गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥

कलियुगका वृत्तान्त

कबीरकृष्णगीता ।

४५

दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।

शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥

कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥

भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥

कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥

आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥

अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥

ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥

दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।

पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥

विष्णु-व्यासवचन ।

कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥

कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥

बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥

गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥

गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥

गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥

जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥

काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥

सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥

कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥

कलियुगमें तरनेका मार्ग

४६

कबीरकृष्णगीता ।

कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥
प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥
कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥
सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥
लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥
पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥
विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥
जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥
ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥
विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥
परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥
नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥
चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥
पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥
जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥
पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥
पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥
पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥
नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥
आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥
जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥

कबीरकृष्णगीता ।

४७

तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥
सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥
निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥
नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥
दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥
चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥
छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥
आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥
नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥
नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥
सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥
असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥
दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥
सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥
नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥
सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥
जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥
पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥
कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥
जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥
पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥
सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥

सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न

( ४८ )

कविरक्तुणगीता ।

अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥
जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥
केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥
कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥
पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥
गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥
पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥
अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥
जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥
मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥

दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥

गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥

सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥

चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥

कविरचन ।

दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।

तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥

धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥

गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥

गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥

सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना

कवीरकृष्णगीतः ।

४९

सकलदेव वचन ।

सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥
हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥
जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥
यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥
अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥
सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥
अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥
उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥
कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥
उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥
कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥

कवीर वचन ।

कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥
देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥

कुबेर वचन ।

कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥
तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥
तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥

५०

कबीरकृष्णगीता ।

कबीर वचन ।

सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥
आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥
बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥
मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥
अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥
सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥
साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥
भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥
यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥
शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥
चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥
कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥
रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥
केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥
पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥
गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥
सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥
बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥
आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥
कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥

कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना

कवीरकृष्णगीता ।

५१

एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥
धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥

दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।

गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥
धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥

दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।

आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥

पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥

सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥

पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥

पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥

रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥

विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥

जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥

दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।

विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥

जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥

५२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥

व्यासवचन ।

कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥

कबीरवचन ।

दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥

व्यास सुखदेव वचन

कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥

दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥