कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 168 में से
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कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥
अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥
चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥
मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥
गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥
एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥
पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥
जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥
चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी
शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥
नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥
तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥
मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥
निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥
एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥
सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥
बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥
कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥
कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥