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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति

कवीरकृष्णगीता ।

५३

कवीरवचन ।

कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥
अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥
रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥
पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥
रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥

दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।

एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥

गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥
गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥
भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥
जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥
शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥
पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥
निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥
अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥
अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥
कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥
आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥
दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥

गुरु और गुरुओंका वर्णन

५४

कबीरकृष्णगीता ।

तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥
आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥
जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥
जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥
देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥
असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥
बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥
वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥
वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥
पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥
द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥
कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥
करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥
ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥
धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥
बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥

दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।

यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥

काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥
एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥
छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥

कबीरकृष्णगीता ।

५५

नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥
अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥
षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥
चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥
दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥
एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥

व्यास सुखदेव वचन ।

कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥
नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥
ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥
चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥
चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥
अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥
पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥
सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥
भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥
कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥
आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥
कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥

मीन भक्षककी गतिका वर्णन

५६

कबीरकृष्णगीता ।

विष्णुवचन ।

उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥
मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥
परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥
द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥
नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥
भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४
खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥
सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥
पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥
भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥
राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥
सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥
निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥
वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥

दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।

तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥

परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥
पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥
देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥

जीव बधनेका पाप

कवीरकृष्णगीता ।

५७

यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥
छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥
कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥
कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥
कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥
अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥
सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥
जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥
कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥
कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥
कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥
कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥
जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥
मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥
जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥
बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥
सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥
सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥
सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥
सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥

४

कबीरसाहबसे दर्शन देनेके लिये सब देवताओंका प्रार्थना करना

५८

कबीरकृष्णगीता ।

तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥
घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥
हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥
सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥
गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥
प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥
एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥
सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥
रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥
सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥
मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥
तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥
सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥

व्यासवचन ।

कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥
दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥
कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥

दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।

निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥

देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥

कपिलमुनिका पान परवाना लेना

कबीरकृष्णगीता ।

५९

प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥
कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥
भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥
भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥
अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥
रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥
कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥
कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥
हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥
समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥
आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥
कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥
पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥

दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद ।
शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥

कबीरवचन ।

सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर ।
श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥

कपिलमुनिवचन ।

कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥
हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥

रावणका वृत्तान्त

६०

कबीरकृष्णगीता ।

अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥
आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥
मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥
कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥
अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥
तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥
सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥
चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥
मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥
कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥
हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥
जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥
मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥
कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥
रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥
दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥
करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥
कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥
रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥

कलि युगके धर्मका वर्णन

कवीरकृष्णगीता ।

६१

बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥
तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥
ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥
रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥
ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥
कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥

दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।

सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥

कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥
राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥
पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥
पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥
कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥
पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥
दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥
गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥

दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।

अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥

अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥
सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥

६२

कबीरकृष्णगीता ।

सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥
कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥
जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥
गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥
पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥
कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥
सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥
दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥
कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥
पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥
छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥
विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥
विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥
कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥
सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥
पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥
जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥
सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥
देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥

व्यास सुखदेव कपिल वचन ।

क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥

राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा

कवीरकृष्णगीता ।

६३

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥
पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥
बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥
राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥
कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥
बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥
सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥
पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥
तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥
दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये ।
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥
कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥
अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥
मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥

दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।

जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥

सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥
बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥
मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू
मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥

६४

कबीरकृष्णगीता।

मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥
व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥
कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥
कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥
हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥
नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥
नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥
और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥
गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥
करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥
ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥
गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥
अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥
सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥
ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥
यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥
सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥
निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥
जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥
करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥
सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६५

दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।

कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥

दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥

तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥

सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥

यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥

जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥

हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥

पतिव्रतावचन ।

कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥

स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥

पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥

कुंभर वचन ।

कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥

जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥

करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥

जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥

काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥

बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥

पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥

कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥

६६

कबीररुप्णगीता ।

जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥
जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥
दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय ।
कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥
स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥
पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥
जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥
दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥
ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥
“आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥
एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥
दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥
भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥
चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥
सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥
लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥
कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥
यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥
मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥
रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥
हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥
कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

६७

दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।

पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥

निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥
निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥
उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥
माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥
रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी
सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥
पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥
धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥
पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥
बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥
वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥
बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥
कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥
पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥

दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।

कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥

भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥
कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥
यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥

६८

कबीररुग्णगीता ।

भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६९

पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥
हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥
कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥
कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥
भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥
पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥
तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥
सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥
पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥
मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥
पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥

दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज ।
आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥

सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥
तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥
पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥
चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥
दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥
पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥
पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥
सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥

कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति

७०

कबीरकृष्णगीता ।

चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥
दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥
पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥
सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥
पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥
हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥
अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥
सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥
पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥

दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ ।
वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥
बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश ।
पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥

कबीरखचन ।

कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥
तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥
सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥

कृष्णव्यासवचन ।

विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥
सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥

अर्जुन और कबीर संवाद

कवीरकृष्णगीता

( ७१ )

अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥

कवीरवचन ।

कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।

कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥

७२

कबीरकृष्णगीता ।

युधिष्ठिरकृष्णवचन ।

कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥
अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥
जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥
कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥
जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥

युधिष्ठिरवचन ।

कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥
आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥
अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥
केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥
क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥
परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥
सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥

युधिष्ठिरवचन

कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥
देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥