कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
कबीर वचन ।
सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥
आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥
बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥
मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥
अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥
सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥
साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥
भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥
यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥
शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥
चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥
कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥
रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥
केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥
पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥
गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥
सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥
बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥
आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥
कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥