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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 55

कवीरकृष्णगीता ।

४१

कवीरवचन ।

कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥
प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥
त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥
रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥
अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥
प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥
शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥
प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥
त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥
पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥
अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥
एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥
त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥
पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥
श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥
सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥
जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥
निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥
देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥
दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥
अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥