कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥
जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥
चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥
विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा ।
अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥
दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥
कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं
बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई
कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥
उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा
स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥
महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥
पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥
विष्णुवचन ।
कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥
पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥
आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥
अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥
दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥
कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥