सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

कवीरकृष्णगीतः ।

४९

सकलदेव वचन ।

सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥
हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥
जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥
यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥
अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥
सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥
अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥
उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥
कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥
उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥
कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥

कवीर वचन ।

कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥
देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥

कुबेर वचन ।

कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥
तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥
तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥