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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, प्राक्कथन एवं रमैनी प्रकरण (रमैनी १-८४)

बीजक कबीर साहब ।
( कबीरसाहबकीकथा, मूल रमैनी तथा बघेलवंशागम निर्देश )
साकेतवासी श्रीमन्महाराजाधिराज श्रीमहाराज श्रीविश्वनाथ सिंहजूदेव
बहादुर कृत पाखण्डखण्डनी टीका सहित ।
जिसको
बघेल कुल तिलक श्री १०८ श्रीमहाराजाधिराज रीवाँधिपति
बान्धवेश श्री सीतारामकृपापात्राधिकारी श्री सर्
वेङ्कट रमण रामानुजप्रसादसिंहजूदेव
बहादुरकी आज्ञानुसार,
“श्रीवेङ्कटेश्वर” ( स्टीम् ) यन्त्रालयाध्यक्ष
खेमराज श्रीकृष्णदासने
स्वामि युगलानन्द कबीर पंथी भारत पथिक द्वारा शुद्धकराय,
मुद्रितकर प्रसिद्ध किया ।
बंबई.
संवत् १९६१, शके १८२६.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” प्रेसाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है ।

कबीर साहब.

श्रीममहाराजाधिराज सर् वेङ्कटरमण रामानुजप्रसादसिंहजूदेव बहादुर
( जी. सी. एस्. आई. ) रीवाँनरेश.

श्रीः ।
अर्पणपत्रिका.
श्रीमान् गो ब्राह्मण प्रतिपालक, बघेलकुलतिलक, अवनीश,
बान्धवेश, रीवाँधिपति, प्रजाप्रिय, धर्मपरायण, सिद्धि श्रीमन्महा-
राजाधिराज श्री १०८ श्रीमहाराज श्रीसीताराम कृपापात्राधिकारी
श्रीसरवेङ्कटरमण रामानुज प्रसाद सिंहजू देव बहादुर ( जी. सी.
एस. आई. ) के कर कमलोंमें—
श्रीमानकी मुझ अकिञ्चनपर पूर्ण कृपा है । श्रीमान्
सच्चे देशहितैषी, धर्महितैषी, जातिहितैषी, और हिन्दीहितैषी
हैं । श्रीमान्‌का सनातन धर्म पर अनुराग वंशपरम्परासे चला
आता है । श्रीमान्‌के पूर्वजोंमें अच्छे २ कवि, अच्छे २ शासक,
और अच्छे २ धर्मनिष्ठ होगये हैं । इसप्रकारके अनेक सद्गुणोंसे
मुग्ध होकर श्रीमान्‌के पितामह श्रीसाकेतवासी श्रीमन् महाराजा-
धिराज श्रीमहाराज श्रीविश्वनाथ सिंहजू देव बहादुर विरचित श्री
कबीर साहबके बीजककी पाखण्डखण्डनी टीका जो श्रीमान्‌कीही
आज्ञासे छापी गयी है. श्रीमान्‌हीके करकमलोंमें अत्यन्त नम्रतासे
परम सम्मान पूर्वक अर्पण करता हूँ । अर्पण क्या करताहूँ आपकी-
ही वस्तु आपकी सेवामें रखकर कृपाकी अभिलाषा करताहूँ ।
श्रीमान्‌का विनयावनतसेवक—खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेङ्कटेश्वर ” ( स्टीम् ) यन्त्रालयाध्यक्ष—बंबई.

भूमिका ।
इस ग्रन्थके प्रथम कबीरकसौटी, सत्यकबीरकी साखी और कबीर उपासना
पद्धति नामक पुस्तकें छप चुकी हैं, । सत्य कबीरकी साखीकी भूमिकाकी
मतिज्ञानुसार बीजककी टीकाओंको छापना आरंभ किया है ।
बीजककी कईटीकाओंमें यह टीका परम प्रसिद्ध और वैष्णवमात्रकों
मान्य है । मान्य क्यों नहो जबकि साकेतविहारी भगवान् रामचन्द्रजीके
अनन्य उपासक, वेद, शास्त्रके पूर्ण ज्ञाता, सांगीत आदि विद्या कुशल श्रीमन्म-
हाराजाधिराज बाँधवेश, रीवाँधिपति साकेतनिवासी श्रीमहाराज विश्वनाथ
सिंहजूदेव बहादुरने स्वयम् इसकी टीका की है । इस परभी सोनामें सुगन्ध
यह है कि, यह टीका भी स्वयम् कबीर साहबकी आज्ञासे हुई है और श्री
कबीर साहबने इसे पसन्द भी कियाहै जिसका विस्तृत विवरण इस पुस्तकके
आदि मंगलकी टीकामें मिलेगा ।
जब कि समयके फेरसे भारत वर्षसे वीरता, लक्ष्मी और विद्या ती-
नोंने भारतपर कोप कर सात समुद्र पार जा बसनेकी प्रतिज्ञाली है तब भी
पवित्र बघेलवंशीय बाँधवेश,, रीवाँधिपतिके वंशमें धर्मके संपूर्ण स्वरूपसें
विराजनेके कारण तीनोंही एक स्थानमें पाये जाते हैं ।
जिसका कुछ वर्णन इसी पुस्तककें अन्तमें छपे हुए बघेल बंशागमनिर्दें-
श नामक पुस्तकके बाँचनेसे ज्ञात होगा ।
उसी पवित्र वंशके वर्तमान नृप श्रीमान् गोब्राह्मण प्रतिपालक, बघेल
कुल तिलक, अवनीश, बान्धवेश, रीवाँनरेश, प्रजाप्रिय, सिद्धि श्री मन्महाराज
धिराज श्री १०८ श्रीमहाराज श्रीसीताराम कृपा पात्राधिकारी सर वेङ्कटरमण
रामानुजप्रसाद सिंह जू देव बहादुर जी. सी. एस. आई-की आज्ञानुसार यह
पुस्तक छापी गयी है । इतनीही नहीं आपने अपने पूर्वजोंकी बनायी. हुई सर्व

( २ )
पुस्तकोंके छापने की आज्ञा दीहै। केवल आज्ञाही नहीं दी है द्रव्यकी सहायता
देकरभी आपने यश लूटा आप वीरता के साथ २ पूर्ण विद्वान है; आप पूर्ण
रसिक और सत्य शौर्य्यधारी हैं; आप न्याय और सुविचारके स्वरूप हैं
आप स्वयम् सर्व गुण सम्पन्न कवि हैं यही कारण है कि, आप गुणियों और
कवियोंके पूर्ण परीक्षक हैं ।
आपकी आज्ञा की हुई साकेतवासी श्री १०८ श्रीमन्महाराजाधिराज बाँधवेश,
रीवाँधिपति, श्रीमहाराज रघुराज सिंहजूदेव बहादुरकी बहुतसी पुस्तकें हमारे
यहां छप चुकीहैं और यह अबकी बीजक। इसी प्रकार से और भी पुस्तकें क्रमशः
प्रकाशित होती जावेंगी ।
इस पुस्तकको अवलोकन करनेवाले सर्व सज्जनोंसे निवेदन है कि यदि
आपके पास कबीरसाहबकी पुस्तकें हों तो अवश्य कृपाकर भेजदीजिये जिससे
हमारे यहाँ आयी हुई अनेक पुस्तकें शुद्ध होकर छप जावें ।
इस पुस्तकका कबीरपंथके ग्रन्थोंके जीर्णोद्धारक, कबीर मन्शूरके अनुवादक,
मूल बीजक, शब्द कुञ्जी और साखी आदि अनेक ग्रन्थोंके संशोधक और वेदान्त-
के अनेक पुस्तकोंके संशोधक कबीरोपासनापद्धतिके कर्ता स्वामी युगलानन्द
कबीरपंथी भारतपथिक रसीदपुर ( शिवहर ) निवासीद्वारा संशोधन कराकर
छापा है।
सर्व सज्जनोंका कृपाकांक्षी-
खेमराज श्रीकृष्णदास,

बीजककी-अनुक्रमणिका ।


[स्तम्भ १]

विषय. पृष्ठ.
आदिमंगल।
प्रथमे समरथ आप रहे १
रमैनी
नीवरूप एक अंतर बासा २७
अंतरज्योति शब्द एक नारी ३४
प्रथम आरम्भ कौन को भयऊ ३८
प्रथम चरन गुरु कीन्ह बिचारा ४०
कहंलो कहौं युगन की बाता ४२
वर्णहु कौन रूप औ रेखा ४६
जहिया होत पवन नहि पानी ४८
तत्वमसी इनके उपदेशा ४९
बांधे अष्ट कष्ट नौ सूता ५२
रांही ले पिपराही बही ५४
आंधरी गृष्ट सृष्टि भई बौरी ५६
माटिक कोट पषानक ताला ६०
नहिं प्रतीति जो यहि संसारा ६२
बड़ा सो पापी आहि गुमानी ६७
उनई बदरिया परिगो संझा ७०
चलत चलत अति चरन पिराने ७२
जस जिव आपु मिलै अस कोई ७४
अद्भुत पंथ बरणि नहिं जाई ७७
अनहद अनुभव की करि आशा ७८
अब कहु रामनाम अविनाशी ८०
बहुत दुखै है दुःख की खानी ८२


[स्तम्भ २]

विषय. पृष्ठ.
अलख निरंजन लखै न कोई ८३
अल्प सुखहि दुख आदिक अंता ८५
चन्द्र चकोर अस बात जनाई ८७
चौतिश अक्षर को यही विशेषा ८९
आपुहि कर्ता भे करतारा ९०
ब्रह्मा को दीन्हो ब्रह्मंडा ९३
अस जोलहा का मर्म न जाना ९५
बज्रहु ते तृण छनमें होई ९६
औ भूले षट दर्शन भाई ९८
स्मृति आहि गुणनको चीन्हा १००
अन्धको दर्पण वेद पुराना १०१
वेदकी पुत्री स्मृति भाई .... १०२
पढ़ि पढ़ि पंडित करहु चतुराई १०५
पण्डित भूले पढ़ि गुनि वेदा १०७
ज्ञानी चतुर बिचक्षण लोई १०९
एक सयान सयान न होई ११०
यह विधि कहौं कहा नहिं माना ११२
जिन्ह कलमा कलिमांहि पढ़ाया ११३
आदम आदि सुद्धि नहिंपाई ११५
अंबुकी राशि समुद्र की खाई ११६
जब हम रहल रहा नहि कोई ११८
जिन्ह जिव कीन्ह आपुविश्वासा ११९

( ४ ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ.
कबहूँ न भये संग औसाथा १२१ | नारी एक संसारै आई १६५
हरिणाकुश रावण गौ कंसा १२३ | चलीजात देखी एकनारी १६६
बिनसे नाग गरुड गलिजाई १२५ | तहिया गुप्त थूलनहि काया १६८
जरासंध शिशुपाल संहारा १२६ | तेहि साहब के लागहु साथा १७०
मानिक पुरहि कबीर बसेरी १२७ | माया मोह कठिन संसारा १७३
दरकी बात कहो दरवेशा १२८ | एके काल सकल संसारा १७४
कहते मोहि भयल युगचारी १२९ | मानुष जन्म चूके जगमांझी १७६
भाकर नाम अकहुआ भाई १३० | बढ़वत बाढ़ि घटावत छोटी १७८
जेहिकारण शिव अजहुं वियोगी १३३ | बहुतक साहस करिजिय अपना १७९
महादेव मुनि अंत न पाया १३४ | देव चरित्र सुनौ रे भाई १८०
मरि गये ब्रह्मा काशीके वासी १३५ | सुखक वृक्ष एक जगत उपाया १८१
गये राम औ गये लक्षमना १३७ | छत्री करे क्षत्रिया धर्मा १८३
दिन दिन जरे जरल के पाऊ १३९ | जो जिय आपन दुखहि संभार १८४
कुतिया सूत्र लोक एक अहई १४० | इति रमैनी ।
तै सुत मानु हमारी सेवा १४२ |
बढ़त चढ़ावत भड़हर फोरी १४३ | अथ शब्द ।
छाडहु पति छाडहु लवराई १४५ | सन्तो भक्ति सतोगुरु आनी १८७
धर्म कथा जो कहते रहई १४६ | सन्तो जागत निन्द न कीजै १९०
जो तोहि कर्त्ता वर्ण विचारा १४८ | सन्तो घरमें झगरा भारी १९४
नाना वर्णरूप एक किन्हा १५० | सन्तो देखत जग बौराना १९६
काया कंचन यतन कराया १५१ | संतो अजरज एक भौ भाई २००
अपने गुणको औगुण कहहु १५२ | सन्तो अचरज एक भौ भारी २०२
सोई हीतु बन्धु मोहि भावै १५५ | सन्तो कहौं तो को पतियाई २०४
देहहलाये भक्ति न होइ १५६ | सन्तो आवे जाय सो माया २०५
तेहि वियोग ते भये अनाथा १५७ | सन्तो बोले ते जग मारे २१३
ऐसा योग न देखा भाई १५९ | सन्तो राह दुनों हम दीठा २१५
बोलना कासो बोलिये भाई १६१ | सन्तों पांड़े निपुण कसाई २१७
भोग बधावा समकरि माना १६३ | सन्तो मते मातु जन रंगी २१९

( ६ ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ.
तंत्री यंत्र अनूपम बाजे ३४२
जस मासु नरकी तस मासु पशुकी ३४५
बातुक कहां पुकारै दूरी ३४७
चलहु का टेढो टेढो टेढो ३४८
फिरहु क्या फूले फूले फूले ३४९
जोगिया ऐसो है बदकर्मी ३५१
ऐसो भर्म विगुरचन भारी ३५४
आपनपौ आपुहि विसरचो ३५६
आपन आश किये बहुतेरा ३५८
अब हम जानिया हो हरि वाजी
को खेल .... ... ३५९
कहहुहो अम्बर कासों लागा ३६०
बन्दे करले आप निबेरा ३६१
तूतो ररा ममा की भांती है ३६२
तुम एहि विधि समझहु लोई ३६५
मुला बे अहमक नादाना ३६७
काजी तुम कौन किताब बखानी ३६८
मूला लोग कहे घर मेरा ३७

बीजककी-अनुक्रमणिका । ( ७ )
[ स्तम्भ १ ]
विषय. पृष्ठ.
कका कमल किरनि में पावे ४२५
खखा चाहै खोरी मनावे ४२५
गगा गुरुके वचनहि मान ४२६
घघा घट विनशे घट होई ४२६
ङङा निरखत निशिदिन जाई ४२७
चचा चित्र रचो बहु भारी ४२७
छछा आहि छत्रपति पासा ४२८
जजा ई तन जियतहि जारो ४२८
झझा अरुझि सरुझि कित जाना ४२९
ञञा निर्खत नगर सनेहू ४२९
टटा विकट बात मन माहीं ४३०
ठठा ठौर दूरी ठग नियरेँ ४३०
डडा डर किन्हे डर होई ४३१
ढढा ढूढ़तही कित जाना ४३१
णणा दूरि बसो रे गाऊं ४३१
तत्ता अति त्रियो नहिं नाये ४३२
थथा थाइ थहो नहिं जाई ४३२
ददा देखहु विनशनि हारा ४३३
धधा अर्ध माहिं अंधिआरी ४३३
नना वो चौथे मह जाई ४३४
पपा पाप करे सब कोई ४३४
फफा फल लागो बढ़ दूरी ४३५
बबा बर बर करे देख सब कोई ४३५
भभा भरम रहा भर पूरी ४३५
ममा सेये मर्म न पाई ४३६
यया जगत रहा भर पूरी ४३६
ररा रारि रहा अरुझाई ४३७
लला तुतुरे बात जनाई ४३७
[ स्तम्भ २ ]
विषय. पृष्ठ.
ववा वह वह कर सब कोई ४३८
शशा शर नहिं देखै कोई ४३८
षषा षरा कहै सब कोई ४३९
ससा सरा रच्यो बरियाई ४३९
हहा होय होत नहिं जाने ४४०
क्षक्षा क्षण परलय मिटिजाई ४४०
॥ इति चौतीसीं ॥
॥ अथ बिप्रमतीसी ॥
सुनहु सबन मिलि बिप्र मतीसी ४४१
॥ अथ कहरा ॥
सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु ४४७
मत सुनु माणिक मत सुनु माणिक ४५५
राम नाम को सेबहु बीरा ४५९
ओढ़न मेरो राम नाम ४६०
रामनाम भजु रामनाम भजु ४६२
राम नाम बिनु राम नाम बिनु ४६७
रहहु सम्हारे राम विचारे ४७१
क्षेम कुशल और सही सलामत ४७३
ऐसन देह निरापन बौरे ४७४
हौं सबहिन में हौं नाहीं ४७५
ननदी गे तैं विषम सोहागिन ४७८
ईमाया रघुनाथ की बौरी ४८०
॥ इति कहरा ॥
॥ अथ बसंत ॥
जहं बारहिं मास बसंत होय ४८१
रसना पढ़ि भूले श्री बसंत ४८३

(८) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ.
मैं आयो मेहतर मिलन तोहि ४८५
बुढ़िया हंसि कहै मैं नितही वारि ४८७
तुमबूझहु पण्डित कौनि नारि ४८९
माइ मोर मानुष है अति सुजान ४९०
घरहि में बाबू बड़ी रारि ४९१
कर पल्लवके बल खेलै नारि ४९४
ऐसो दुर्लभ जात शरीर ४९५
सबही मदमाते कोई न जाग ४९६
शिव काशी कैसी भई तुम्हारी ४९७
हमारे कहल के नहिं पतियार ४९९
॥ इति बसंत ॥
॥ अथ चाचर ॥
खेलत माया मोहिनी जेर कियो
संसार ... ... ५०१
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ५०५
॥ अथ बेली ॥
हंसा सरवर शरीर मह हो
रैमैया राम... ... ५०९
मन सुस्मृति जहडाइहु हो
रैमैया राम.... ... ५१३
॥ इति बेली ॥
॥ विरहुली ॥
आदि अंत नहिं होत, विरहुली ५१७
॥ हिंडोला ॥
भर्म हिंडोला झूले सब जग आय ५२०
बहुविधि चित्र बनायके हरि
रच्यो क्रीडा रास ... ५२३
विषय. पृष्ठ.
जहं लोभ मोहके खंभा दोऊ ५२४
॥ इति हिंडोला ॥
॥ अथ साखी ॥
जहिया जन्म मुक्ताहता ५२५
शब्द हमारा तू शब्द का ५३१
शब्द हमारा आदिका ५३२
शब्द विना श्रुति आंधरी ५३३
शब्द शब्द बहु अंतरहीमें, ५३३
शब्दे मारा गिर गया ५३४
शब्द हमारा आदिका ५३४
जिन जिन सम्बल ना कियो ५३४
ई हई सम्बल करिले ... ५३४
जो जानहु जिय आपना ... ५३६
जो जानहु पिव आपना ५३५
पानी प्यावत क्या फिरो ... ५३५
हंसा मोती बिकानियां ... ५३६
हंसा तुम सुबरण बरण ... ५३६
हंसा तूतो सबल था ... ५३६
हंसा सरवर तजि चले ५३७
हंसा बक एक रंग लखिये ५३७
काहे हरिणि दूबरी ... ५३७
तीनलोक भौ पींजरा ... ५३८
लोभे जन्म गवांइया .... ५३८
आधी साखी शिर खंडै ५३८
पांचतत्व का पूतला युक्ति रची-
मै कीय ... ... ५३९
पांचतत्व का पूतला मानुष-
धरिया नाउँ ... ... ५३९

बीजककी-अनुक्रमणिका। (९)
विषय. पृष्ठ.
रंगहिते रंग उपजै ... ५३९
जाग्रत रूपी जीवहै ... ५३९
पांचतत्व लै ईतन कीन्हा ५४०
पांचतत्व के भीतरे ... ५४०
अशुन तख्त अडि आसने ... ५४०
हृदया भीतर आरसी .... ५४१
ऊंचे गांव पहाड़ पर ... ५४१
जेहि मारग गै पंडिता ५४१
हे कबीर तैं उतरि रहू ५४१
घर कबीर का शिखर पर ५४२
बिन देखे वह देशकी ५४२
शब्द शब्द सब कोई कहे ५४२
पर्बत ऊपर हर बसै ... ५४२
चन्दन बास निवारहु ... ५४३
चंदन सर्प लपेटिया... ... ५४३
ज्योंमुर्दाद स्मसान शिल ... ५४३
गही टेक छाडे नहीं .... ५४४
चकोर भरोसे चन्द्रके (नोटमें)* ५४४
झिल मिल झगरा झूलते ... ५४४
गोरख रसिया योगके ... ५४५
बन ते भागि विहडे पडा ... ५४५
बहुत दिवस ते हींठिया ... ५४५
कबिरा भर्म न भाजिया .... ५४६
बिनु दांड़े जग दांडिया .... ५४७

  • यह दूसरी पुस्तकों की ४१ वीं साखी
    है किन्तु इस टीकामें नहीं लीहै मैंने नोटमें
    दै दियाहै ।

विषय. पृष्ठ.
मल्यागिरिके बासमें वृक्षरहा-
सबगोय ... ... ५४७
मल्यागिरि के बासमें वेधा-
ढाकपलास ... ... ५४७
चलते चलते पगु थका ... ५४७
झालि परे दिन आथये ... ५४८
मन तो कहै कब जाइये ... ५४८
गृही तजिके भये उदासी ५४९
रामनाम जिन चीन्हिया .... ५४९
जेजन भीगे राम रस ... ५४९
काटे आम न मौरसी ... ५५०
पारस रूपी जीव है ... ५५०
प्रेम पाटका चोलना ... ५५०
दर्पण केरी गुफामें... ... ५५१
ज्यों दर्पण प्रति बिम्ब देखिये ५५१
जो बन सायर मुञ्झते ... ५५१
दोहरा तो नवतन भया ... ५५२
कबिरा जात पुकारिया ... ५५२
सबते सांचा है भला ... ५५३
सांचा सौदा कीजिये.... ... ५५३
सुकृत वचन मानै नहीं .... ५५४
लागी आग समुद्र में ... ५५४
लाई लावन हारन की .... ५५४
बुंद जो परा समुद्र में .... ५५४
जहर जिमीं दै रोपिया ... ५५५
दौ की डाही लकड़ी ... ५५५
विरह की ओदी लकड़ी ... ५५५
विरह बाण जेहि लागिया .... ५५६

( १० ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ.
साचा शब्द कबीर का ... ५५६ | काल खड़ा शिर उपरे ... ५६७
जो तू सांचा बानिया ... ५५७ | कायाकाठी कालघुन .... ५६८
कोठी तो है काठ की ... ५५७ | मन माया की कोठरी ... ५६८
सावन केरा मेहरा ... ... ५५७ | मन माया तो एक है ... ५६८
ढिग बूड़ा उसला नहीं ... ५५८ | बारी दिन्हो खेतमें ... .... ५६९
साखी कहैं गहैं नहीं ... ५५८ | मन सायर मनसा लहरी ... ५६९
कहता तो बहुते मिला ... ५५९ | सायर बुद्धि बनाय कै .... ५६९
एक एक निरुवारिये ... ५५९ | मानुष होके ना मुआ .... ५७०
जिह्वा को दै बन्धने ... ५५९ | मानुष तै बड़ पापिया ... ५७०
नाकी जिह्वा बन्द नहीं ... ५५९ | मानुष विचारा क्या करे कहे
पानी तो जित्ये ढिगे ... ५६० | न खुले कपाट ... ... ५७०
हिलगौ भाल शरीर में ... ५६० | मानुष विचारा क्या करे जाके
आगे सीढ़ी साँकरी... ... ५६० | शून्य शरीर .... ... ५७०
संसारी समय बिचारिया ... ५६० | मानुष जन्महिं पायके ... ५७१
संशय सब जग संधिया ... ५६१ | ज्ञान रतन को यतन करु ... ५७१
बोलना है बहु भांतिका .... ५६१ | मानुष जन्म दुर्लभ अह्रै ... ५७१
मूल गहेते काम है... ... ५६२ | बांह मरोरे जात हौ .... ५७२
भँवर बिलम्बे बाग में .... ५६२ | साखी पुलंदर ढह परे .... ५७२
भँवर नाल बगु जालु है .... ५६३ | बेरा वाधिन सर्प को ... ५७२
तीन लोक टीड़ी भई .... ५६३ | कर खोरा खोवा भरा ... ५७३
नाना रंग तरंग है ... ... ५६३ | एक कहौं तो है नहीं .... ५७४
बाजीगर का बांदरा ... ५६४ | अमृत केरी पूरिया .... .. ५७४
ई मन चंचल चोरई ... ५६४ | अमृत केरी मोटरी ... .... ५७४
विरह भुवंगम तन डसा ... ५६४ | जाको मुनिवर तप करें .... ५७५
राम वियोगी विकल तन .... ५६४ | एकते हुआ अनंत
... .... ५७५
विरह भुवंगम पैठिके ... ५६५ | एक शब्द गुरु देवका ... ५७५
करक करेजे गड़ि रही ... ५६६ | राडर को पिछुआरकै .... ५७५
काला सर्प शरीर में ... ५६६ |

बीजककी-अनुक्रमणिका । ( ११ )
विषय. पृष्ठ.
चौ गोड़ा के देखते... ... ५७६
तीन लोक चोरी भई ... ५७६
चक्की चलती देखिके ... ५७७
चार चोर चोरी चले .... ५७७
बलिहारी वहि दूध की .... ५७८
बलिहारी तेहि पुरुष की .... ५७८
विषके विरवे घर किया ... ५७८
मोई घर है सर्पका ... .... ५७९
घुघुची भर जो बोइया * .... ५७९
मनभर के बोये कबौं .... ५७९
आपा तजो हरि भजो ... ५७९
पक्षा पक्षी कारने .... ... ५८०
माया त्यागे क्या भया ... ५८०
घुघुची भर जो वोइया ... ५८०
बड़ेते गये बडापने... .... ५८१
मायाकी झक जगजरै .... ५८१
मायाजग सांपिन भई .... ५८१
सांप बीछिको मंत्र है ... ५८२
तामस केरे तीन गुण .... ५८२
मनमतंग गैयर हने... ... ५८३
मन गयंद मानै नहीं ... ५८३
या माया है चूहरी ... ... ५८३
कनक कामिनी देखिके .... ५८३
मायाके वश सब परे ... ५८३
पीपर एक जो मंहगेमान .... ५८४
शाहू ते भौ चोरवा .... .... ५८४
ताकी पूरी क्यों परे... ... ५८४
विषय. पृष्ठ.
जाना नहीं बूझा नहीं ... ५८५
जाको गुरू है आंधरा ... ५८५
मानस केरी अथाइया ... ५८५
चारमास घन वरासिया ... ५८५
गुरु के भेला जिव डरै काया
छीजनहा .... ... ५८६
तन संशय मन सोनहा ... ५८६
शाहुचोर चीन्हे नहीं.... ... ५८६
गुरु सिकलीगर कीजिये ... ५८७
मूरखको समुझावते... ... ५८७
मूढ कर्मिया मानवा... .. ५८७
सेमर केरा सूवना ... .... ५८७
सेमर सुवना वेगितजु ... ५८८
सेमर सुवना सेइया ... ... ५८८
लोग भरोसे कौनके... ... ५८८
समुझि बूझ जड़ होइरहे ... ५८९
हीरा वही सराहिये... ... ५८९
हरि हीरा जन जौहरी ... ५९०
हीरा तहां न खोलिये ... ५९०
हीरा परा बजार में... ... ५९०
हीराकी ओबरी नहीं .... ५९१
अपने अपने शशि की ... ५९२
हाड़ जरै जस लाकड़ी ... ५९२
घाट भुलाना बाट बिन .... ५९२
मूरख सो क्या बोलिये ... ५९३
जैसे गोलि गुमज की ... ५९३
ऊपर की दोऊ गई ... ५९३
केते दिन ऐसे गये .... ५९३

( १२ ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ.
भैरोऊं सब जगत को .... ५९४
साहेब साहेब सब कहें ... ५९४
जिव बिन जिव बांचे नहीं ५९४
हमतो सबही की कही .... ५९४
प्रकट कहौं तो मारिया .... ५९५
देश विदेशन हौं फिरा ... ५९६
कलि खोटा जग आंधरा .... ५९६
मसि कागज छूवों नहीं ... ५९६
फहमें आगे फहमें पीछे ... ५९७
हद चले सो मानवा ... ५९७
समुझे की गति एक है ... ५९७
राह बिचारी क्या करे .... ५९७
मुआ है मरि जाहुगे बिन शिर-
थोथा भाल* ... ... ५९८
बोलि हमारी पूर्ब की ... ५९८
नेहि चलेतरवदे परा ... ५९८
पायन पुहुमी नापते .... ५९९
नव मन दूध बटोर के ... ५९९
केल्यो मनावैं पावपरी .... ६००
मानुष तेरा गुण बड़ा .... ६०१
जो मोहि जानै ताहि मैं जानौं । लोक
वेदका कहा न मानौं । *

  • नोट—यह साखी इस टीकामें छोड
    दी है.
    मुआ है मारि जाहुगे मुये की बाजी
    ढोल ।
    सुपन सनेही जग भया, साहि दानी
    रहिगो बोल ॥
    विषय. पृष्ठ.
    जौ लगि डोला तौ लागि बोला ६०१
    सबकी उतपत्ती धरणि में ... ६०१
    धरती जानत आपगुण .... ६०१
    जहिया किरतिम ना हता ... ६०२
    जँह बोल अक्षर नहि आया-
    आया ... ... ६०२
    जौ लो तारा जगमगै ... ६०२
    नाम न जाने ग्रामको ... ६०३
    संगति कीजे साधु की ... ६०३
    संगति से सुख उपजे । *
    जैसी लागी ओरकी .... ६०३
    आज काल दिन एक में ... ६०३
    करु बहियाँ बल अपनी .... ६०३
    बहु बन्धन से बांधिया ... ६०४
    जीव मत मारहु बापुरा ... ६०४
    जीव घात ना कीजिये ... ६०४
    तीरथे गये सो तीन जन .... ६०५
    तीरथ गये ते बहि मुये ... ६०५
    तीरथ भै बिष बेलरी ... ६०५
    हे गुणवंती बेलरी ... ... ६०५
    बेल कुठंगी फल बुरो ... ६०६
    पानी ते अति पातला .. ६०६
    सतगुरु वचन सुनो हो संतो ६०६
    एकरुआइ बेलरी ... ... ६०६
    सिद्ध भया तो क्या भया *
    परदे पानी ढारिया ... ... ६०६
  • इस पुस्तकमें यह साखी छोड दीहै।

बीजककी-अनुक्रमणिका । ( १३ )
विषय. पृष्ठ.
अँस्ति कहौं तो कोई न पतीजे ६०९
सोना सज्जन साधु जन ... ६१०
काजर केरी कोठरी... .... ६१०
काजर ही की कोठरी .... ६१०
अर्ब खर्ब लौ द्रव्य है ... ६१०
मच्छ बिकाने सब चले .... ६११
पानी भीतर घर किया ... ६११
मछ होय ना बाचिहों .... ६१२
बिनु रसरी गर सब बंध्यो .... ६१३
समुझाये समुझे नही ... ६१३
नित खरसान लोह घन टूटै *
लोहे केरीनावरी ... ... ६१३
कृष्ण समीपी पांडवा .... ६१३
पूरब ऊगे पश्चिम अथवे ... ६१४
नैनके आगे मन बसे ... ६१४
मनस्वारथी आपै रसिक .... ६१४
ऐसी गति संसार की ज्यों
गाडरकी ठाट ... .... ६१५
वा मारग तो कठिन है .... ६१५
मारी मेरै कुसंगकी... .... ६१५
केरा तबही न चेतिया .... ६१५
जीव मरण जानै नहीं ... ६१६
जाको सतगुर ना मिल्यो ... ६१७
अनत वस्तु जो अन्ते खोजै .... ६१७
सुनिये सब की निवेरिये अपनी ६१७
वाजन दे वायंत्री .... .... ६१८
गावै कथै विचारै नाहीं ... ६१८

  • यह साखी इस में छोडदी है ।
    विषय. पृष्ठ.
    प्रथमै एक जो हौं किया ... ६१८
    कबिरन भक्ति बिगारिया .... ६१९
    रही एक की भई अनेक की ६१९
    तन बोहितं मन काग है .... ६१९
    ज्ञान रतन की कोठरी .... ६२०
    स्वर्ग पताल के बीच में .... ६२०
    सकलो दुर्मति दूरकरु ... ६२०
    जैसी कहै करै जो तैसी ... ६२०
    द्वारे तेरे रामजी ... ... ६२१
    भर्म परा तिहुं लोक में ... ६२१
    रतन अडाइन रेत में ... ६२१
    जेते पत्र वनस्पती ... ... ६२१
    हम जान्यो कुल हंस हौ ... ६२२
    गुँणिया तो गुणको गहै ... ६२२
    अहिरहु तजि खसमहु तज्यो... ६२२
    मुखकी मीठी जो कहैं ... ६२३
    इतते सब तो जात हैं ... ६२३
    भक्ति प्यारी रामकी... ... ६२३
    नारिकहावै पीवकी ... ... ६२३
    सज्जन तौ दुर्जन भया ... ६२३
    विरहिनी साजी आरती .... ६२४
    पलमें मलय बीतिया... .... ६२४
    एक समाना सकल में ... ६२४
    यक.साधे सब साधिया .... ६२५
    जैहिबन सिंह न संचरे ... ६२५
    सांच कहौं तो है नहीं *
  • यह साखी इसमें नहीं है ।

( १४ ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।
विषय. पृष्ठ.
बोली एक अमोलहै .... .... ६२५
करबहियां बल आपनो *
वोहतो वैसही भया.... .... ६२६
नोमतवारे राम के *
साधू होना चाहहु जो ... ६२६
सिंहैं केरी खोलरी ... ... ६२६
ज्यहिखोजत कल्पौगया ... ६२७
दश द्वारेका पींजरा... .... ६२७
रामहि सुमरहिं रण भिरे ... ६२७
खेत भला बीजो भला ... ६२७
गुरु सीढी ते ऊतरे ... ६२७
आगि जो लागी समुद्रमें ... ६२८
जो मोहि जाने त्यहि मैं जानौं ६२८
मौन मिला सो गुरु मिला ६२८
जहं गाहक तहँ हौं नहीं ... ६२९
शब्द हमारा आदिका .... ६२९
नग पषान जग सकलहै ... ६२९
ताहि न कहिये पारखी ... ६३०
सारि दुनिया विनशती ... ६३०
सपने सोया मानवा... ... ६३०
नष्टेका यह राज्य है .... ६३१
दृष्टमान सब वीनशै... ... ६३१
१ इस साखी तक तो साखियोंका
कर्म निकटही निकट मिलता जुलता
आया है पूर्ण साहबकी टीकाके साथ,
किन्तु यहांसे आगे बहुत गड बड
होगया है ।
विषय. पृष्ठ.
दृष्टिहि माँहि विचार है ... ६३१
जब लगढोला तब लग बोला ६३२
करु बन्दगी विवेक की ... ६३२
सुरनर मुनि और देवता ... ६३२
जौलंग दिलपर दिल नहीं ... ६३२
यंत्र बजावत हौं जुना ... ६३३
जो तुम चाहो मुझको ... ६३३
साधु भया तो क्या भया ... ६३३
हंसाके घट भीतरे ... ... ६३३
मधुर वचन है औषधि ... ६३४
ई जगतो जहडे गया ... ६३४
ठाढसदेखुमरजीवको .... ६३४
ऐ मरजीवा अमृत पीवा ... ६३५
के तेबुन्दहलफेगये ... ... ६३५
आगि जो लगी समुद्रमें .... ६३५
साँचे शाप न लागई... ... ६३५
पूरा साहब सेइये ... ... ६३६
जाहु वैद्य घर आपने ... ६३६
औरन के समु झावते ... ६३६
मैं चितवत हौं तोहिको ... ६३६
तकत तकावत तकिरहे ... ६३७
जस कथनी तस करनीजो ... ६३७
अपनी कहै मेरी सुने ... ६३७
देशदेश महँ बागिया ... ६३८
लोहे चुम्बक प्रीति जस ... ६३८
गुरू बिचारा क्या करे ... ६३८
दादा बाबा भाईके लेखे ... ६३८
लघुताई सब ते भली ... ६३९

बीजककी-अनुक्रमणिका । ( १६ )
विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ.
मरते मरते नग मुवा ... ६३९ | सुत नहिं माने बात पिताकी... ६४९
बस्तु अहै गाहक नहीं .... ६३९ | सबै आश कर शून्य नगरकी ६५०
सिंह अकेला वन रमै ... ६३९ | भक्ति भक्ति सब कोई कहै ... ६५०
मरते मरते जग मुवा ... ६४० | समुझौ भाई ज्ञानियो ... ६५०
पैठा है घट भीतरे... ... ६४० | धोखे सब जग बीतिया .... ६५०
बोलतही पहिचानिये ... ६४० | मायाते मन ऊपजे .... ... ६५१
दिलका महरम कोइ न मिलिया ६४० | राम कहत जग बीते सिगरे... ६५१
बना बनाया मानवा ... ६४१ | यह दुनिया भई बावरी ... ६५१
सांच बरोबर तप नहीं .... ६४१ | राजा रैयत होय रहा ... ६५१
करते किया न विधि किया... ६४१ | जिसका मंत्र जपै सब सिखिकै ६५२
आगे आगे दव जरे... ... ६४१ | जनि भूलौरे ब्रह्मज्ञानी .... ६५२
सर हर पेड आगध फल ... ६४२ | देव न देखा सेव कही.... .... ६५२
बैठ रहे सो बांनिया ... ६४२ | तेरी गति तैं माने देवा .... ६५२
युवा जरा बालपन वीत्यो ... ६४२ | खाली देखिके भ्रम भा ... ६५३
भूलासो भूला बहुरिकै चेतु ... ६४३ | बूझ अपनी थिर रहै ... ६५३
सबही तरुवर नायके ... ६४३ | देखा देखी सब जग भरमा... ६५३
श्रोता तो घरही नहीं ... ६४३ | ह्वांकी आश लगाइया .... ६५३
कंचन भो पारस परसि ... ६४४ | नेईके बिचले सब घर बिचला ६५३
बेचूने जग रचिया ... .... ६४४ | रामरहे बन भीतरे ... ६५४
साईं नूर दिल एक है ... ६४५ | बिना रूप बिन रेखको ... ६५४
रेख रूप जेहि है नहीं ... ६४६ | डर उपजा जिय है डरा ... ६५४
धन्यो ध्यान वा पुरुषको ... ६४६ | सुख को सागर मैं रचा .... ६५५
यह मनतो शीतल भया ... ६४६ | दुख न हता संसारमें ... ६५५
जासों नाता आदिको ... ६४७ | लिखा पढी में परे सब ... ६५५
बूझो शब्द कहां ते आया ... ६४८ | धोखे धोखे सब जग बीता ... ६५६
बूझो कर्त्ता आपना ... ... ६४९ | साखी आंखी ज्ञान की .... ६५६
हम कर्त्ता हैं सकल सृष्टिके... ६४९ |

( १६ ) बीजककी-अनुक्रमणिका ।

[बायाँ स्तम्भ]
विषय. पृष्ठ.
फुटकर शब्द ।
( टीकान्तर्गत )
बलि हारी अपने साहब की १९
ज्यों भृंगी गये कीट के पासा ८१
आसन पवन किये दृढ रहुरे १०३
मन रे जब ते राम कह्योरे.... ११०
चारो युग में कबीर साहबका-
प्राकट्य ... ... ११२
दुलहिन गावो मंगल चार ... १४६
दश मुकामी रेखता ... २३८
राम न जप्यो कहाँ भौ मन्दा ३२९
चलो सखी बैकुण्ठ विष्णु
माया जहाँ .... ... ३५७
जहँ सतगुरु खेलैं ऋतु बसंत ३७७
जागुरे जिव जागुरे .... ... ४५०
हम न मरैं मरि है संसारा ... ४५५
जो तै रसना राम न कहि है ४६०
राम कहत चलु राम कहत
चलु ( गो०स्वा० ) ... ४६३
क्या नागे क्या बाँधे चाम ... ४७२
सदा बसंत होत जेहि ठाऊं ४८२
चेति न देखैरे जग धंधा .... ५००
पंचदेह निर्णय ।
एक जीव जो स्वतः पद ... ५२७
संतो षट प्रकार की देही ... ५२७
संतो सूक्ष्म देह प्रमाना .... ५२८

[दायाँ स्तम्भ]
विषय. पृष्ठ.
संतो कारण देह सरेखा ... ५२८
संतो महा कारण तन जाना ५२८
संतो केवल देह बखाना ... ५२९
संतो सुना हंस तन ब्याना... ५२९
अब तो अनुभव अग्निहि लागी ५५५
संतो राम नाम जो पावे ... ५६७
जहां पुरुष सतभाव तहँ हंसनको
बासा ... .... ... ५७६
रामको नाम चौमुक्तिका मूल है ५९१
संतो या मन है बड जालिम... ५९२
कालके माथे पगधरी ... ६०४
गगनमंडल दृग महलमें ... ६०४
यहि औतार चेतो नहीं ... ६०४
कंचन केवल हरि भजन .... ६०७
जो रक्षक है जीवको .... ६०७
जहाँ कालकी गम नहीं ... ६०८
चौका विधानका शब्द ।
अगर चन्दन घसि चौकपुरावा ६०८
दशौदिशाकर मेटौ धोखा ... ६०९
अबधू ऐसा योग विचारा ... ६१२
बिन परसन दरशन बिनु .... ६१६
बहुतक लोग चढ़े बिन भेदा... ६४२
कलिमां बाँग निमाज गुजारें... ६४४
रूप अखण्डित ब्यापी चैतन्य ६४५
सुनुधर्मदास भक्तिपद ऊंचा... ६४७
संतो बीजक मत प्रमाना ... ६५७

इति अनुक्रमणिका ।

गुरुवे नमः ।
अथ श्रीकबीरजी की कथा ।
دوهـ
दोहा-अब कबीरजी की कथा, श्रोता सुनहु विशाल ॥
जो हिंदू अरु तुर्क को, उपदेश्यो सब काल ॥ १ ॥
हरि विमुखी सब धर्मिन काहीँ । कह्यो अधर्म अखंड सदाहीँ ॥
योग यज्ञ तप दान अचारा । राम भजन बिन कह्यो असारा ॥
कह्यों रमैनी साखी जेती । अटपट अर्थ शास्त्रमय तेती ॥
जो बीजकको ग्रंथ बनायो । तासु तिलक मो पितु निरमायो ॥
आगे कहिहौं मति अनुसारा । पूरुव पूरुष बंश विस्तारा ॥
श्री कबीरजी को इतिहासू । पूर्व पूरुष मम वर्णन तासू ॥
निज कुल वर्णत लागति लाजू । जनि हैं अस सब सुमति समाजू ॥
निजकुलको महत्व प्रगटायो । गाथा सकल मृषा मुख गायो ॥
पै श्रोता सब यदुपति दासा । ताते लागति कछु नहिं त्रासा ॥
सहि लेहैं सब मोरि ढिठाई । मैं न मृषा प्रभुता कछु गाई ॥
जस कबीर वर्ण्यौ निजग्रंथा । वर्णों निजकुल सोई पंथा ॥
और कबीर कथा सुखदाई । प्रियादास नाभा जस गाई ॥
दोहा-सोई मैं वर्णन करौं, संक्षेपहु विस्तार ॥
प्रथमहि जन्म कबीर को, श्रोता सुनहु उदार ॥ २ ॥
रामानंद रहे जग स्वामी । ध्यावत निशि दिन अंतर्यामी ॥
तिनके ढिग विधवा इक नारी । सेवा करै बड़ो श्रमधारी ॥
प्रभु यक दिन रह ध्यान लगाई । विधवा तिय तिनके ढिग आई ॥
प्रभुहिं कियो वंदन बिन दोषा । प्रभु कह पुत्रवती भरि घोषा ॥
तब तिय अपनो नाम बखाना । यह विपरीत दियो वरदाना ॥
स्वामी कह्यो निकसि मुख आयो । पुत्रवती हरि तोहिं बनायो ॥
ह्वै है पुत्र कलंक न लागी । तब सुत ह्वै है हरि अनुरागी ॥
२