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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

बीजककी-अनुक्रमणिका । ( १६ )
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मरते मरते नग मुवा ... ६३९ | सुत नहिं माने बात पिताकी... ६४९
बस्तु अहै गाहक नहीं .... ६३९ | सबै आश कर शून्य नगरकी ६५०
सिंह अकेला वन रमै ... ६३९ | भक्ति भक्ति सब कोई कहै ... ६५०
मरते मरते जग मुवा ... ६४० | समुझौ भाई ज्ञानियो ... ६५०
पैठा है घट भीतरे... ... ६४० | धोखे सब जग बीतिया .... ६५०
बोलतही पहिचानिये ... ६४० | मायाते मन ऊपजे .... ... ६५१
दिलका महरम कोइ न मिलिया ६४० | राम कहत जग बीते सिगरे... ६५१
बना बनाया मानवा ... ६४१ | यह दुनिया भई बावरी ... ६५१
सांच बरोबर तप नहीं .... ६४१ | राजा रैयत होय रहा ... ६५१
करते किया न विधि किया... ६४१ | जिसका मंत्र जपै सब सिखिकै ६५२
आगे आगे दव जरे... ... ६४१ | जनि भूलौरे ब्रह्मज्ञानी .... ६५२
सर हर पेड आगध फल ... ६४२ | देव न देखा सेव कही.... .... ६५२
बैठ रहे सो बांनिया ... ६४२ | तेरी गति तैं माने देवा .... ६५२
युवा जरा बालपन वीत्यो ... ६४२ | खाली देखिके भ्रम भा ... ६५३
भूलासो भूला बहुरिकै चेतु ... ६४३ | बूझ अपनी थिर रहै ... ६५३
सबही तरुवर नायके ... ६४३ | देखा देखी सब जग भरमा... ६५३
श्रोता तो घरही नहीं ... ६४३ | ह्वांकी आश लगाइया .... ६५३
कंचन भो पारस परसि ... ६४४ | नेईके बिचले सब घर बिचला ६५३
बेचूने जग रचिया ... .... ६४४ | रामरहे बन भीतरे ... ६५४
साईं नूर दिल एक है ... ६४५ | बिना रूप बिन रेखको ... ६५४
रेख रूप जेहि है नहीं ... ६४६ | डर उपजा जिय है डरा ... ६५४
धन्यो ध्यान वा पुरुषको ... ६४६ | सुख को सागर मैं रचा .... ६५५
यह मनतो शीतल भया ... ६४६ | दुख न हता संसारमें ... ६५५
जासों नाता आदिको ... ६४७ | लिखा पढी में परे सब ... ६५५
बूझो शब्द कहां ते आया ... ६४८ | धोखे धोखे सब जग बीता ... ६५६
बूझो कर्त्ता आपना ... ... ६४९ | साखी आंखी ज्ञान की .... ६५६
हम कर्त्ता हैं सकल सृष्टिके... ६४९ |