कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीजककी-अनुक्रमणिका । ( १३ )
विषय. पृष्ठ.
अँस्ति कहौं तो कोई न पतीजे ६०९
सोना सज्जन साधु जन ... ६१०
काजर केरी कोठरी... .... ६१०
काजर ही की कोठरी .... ६१०
अर्ब खर्ब लौ द्रव्य है ... ६१०
मच्छ बिकाने सब चले .... ६११
पानी भीतर घर किया ... ६११
मछ होय ना बाचिहों .... ६१२
बिनु रसरी गर सब बंध्यो .... ६१३
समुझाये समुझे नही ... ६१३
नित खरसान लोह घन टूटै *
लोहे केरीनावरी ... ... ६१३
कृष्ण समीपी पांडवा .... ६१३
पूरब ऊगे पश्चिम अथवे ... ६१४
नैनके आगे मन बसे ... ६१४
मनस्वारथी आपै रसिक .... ६१४
ऐसी गति संसार की ज्यों
गाडरकी ठाट ... .... ६१५
वा मारग तो कठिन है .... ६१५
मारी मेरै कुसंगकी... .... ६१५
केरा तबही न चेतिया .... ६१५
जीव मरण जानै नहीं ... ६१६
जाको सतगुर ना मिल्यो ... ६१७
अनत वस्तु जो अन्ते खोजै .... ६१७
सुनिये सब की निवेरिये अपनी ६१७
वाजन दे वायंत्री .... .... ६१८
गावै कथै विचारै नाहीं ... ६१८
- यह साखी इस में छोडदी है ।
विषय. पृष्ठ.
प्रथमै एक जो हौं किया ... ६१८
कबिरन भक्ति बिगारिया .... ६१९
रही एक की भई अनेक की ६१९
तन बोहितं मन काग है .... ६१९
ज्ञान रतन की कोठरी .... ६२०
स्वर्ग पताल के बीच में .... ६२०
सकलो दुर्मति दूरकरु ... ६२०
जैसी कहै करै जो तैसी ... ६२०
द्वारे तेरे रामजी ... ... ६२१
भर्म परा तिहुं लोक में ... ६२१
रतन अडाइन रेत में ... ६२१
जेते पत्र वनस्पती ... ... ६२१
हम जान्यो कुल हंस हौ ... ६२२
गुँणिया तो गुणको गहै ... ६२२
अहिरहु तजि खसमहु तज्यो... ६२२
मुखकी मीठी जो कहैं ... ६२३
इतते सब तो जात हैं ... ६२३
भक्ति प्यारी रामकी... ... ६२३
नारिकहावै पीवकी ... ... ६२३
सज्जन तौ दुर्जन भया ... ६२३
विरहिनी साजी आरती .... ६२४
पलमें मलय बीतिया... .... ६२४
एक समाना सकल में ... ६२४
यक.साधे सब साधिया .... ६२५
जैहिबन सिंह न संचरे ... ६२५
सांच कहौं तो है नहीं * - यह साखी इसमें नहीं है ।