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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

२० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २२-
यतः,—
'सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः
सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः ।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं
सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम्' ॥ २२ ॥
क्योंकि-'अच्छी रीतिसे पका हुआ भोजन, विद्यावान् पुत्र, सुशिक्षित अर्थात्
आज्ञाकारिणी स्त्री, अच्छे प्रकारसे सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन,
और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तकभी नहीं बिगड़ते हैं' ॥२२॥
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित्कपोतः सदर्पमाह—'आः, किमेवमुच्यते ?
यह सुनकर एक कबूतर घमंडसे बोला, 'अजी ! तुम क्या कहते हो ?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥
जब आपत्काल आवे तब वृद्धोंकी बात माननी चाहिये; परन्तु उस तरह सब
जगह माननेसे तो भोजन भी न मिले ॥ २३ ॥
यतः,—
शङ्काभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले ।
प्रवृत्तिः कुत्र कर्तव्या जीवितव्यं कथं नु वा ? ॥ २४ ॥
क्योंकि-इस पृथ्वीतल पर अन्न और पान (इत्यादि सब ) सन्देहोंसे भरा है,
किस वस्तुमें खाने-पीनेकी इच्छा करे अथवा कैसे जिए ? ॥ २४ ॥
ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः ।
परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः' ॥ २५ ॥
ईर्षा करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला
और पराये आसरे जीने वाला ये छः प्रकारके मनुष्य हमेशा दुःखी होते हैं' ॥
एतच्छ्रुत्वा सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः ।
यह सुन कर-सब कबूतर ( बहेलियेने चावलके कण जहां छीटे थे ) वहां
बैठ गये ।
यतः,—
सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः ।
छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः ॥ २६ ॥

  • २९ ] चित्रग्रीवका कबूतरोंको आश्वासन २१
    क्योंकि-अच्छे बड़े बड़े शास्त्रोंको पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहोंको दूर
    करने वाले (पंडित) भी लोभके वश हो कर दुःख भोगते हैं ॥ २६ ॥
    अन्यच्च,-
    लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
    लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥ २७ ॥
    और दूसरे-लोभसे क्रोध उत्पन्न होता है, लोभसे विषयभोगकी इच्छा होती है
    और लोभसे मोह और नाश होता है, इसलिये लोभी पापकी जड है ॥ २७ ॥
    अन्यच्च,-
    असंभवं हेममृगस्य जन्म
    तथापि रामो लुलुभे मृगाय ।
    प्रायः समापन्नविपत्तिकाले
    धियोऽपि पुंसां मलिना भवन्ति ॥ २८ ॥
    और देखो, सोनेके मृगका होना असंभव है, तो भी रामचन्द्रजी सोनेके
    मृगके पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषोंकी बुद्धियाँ भी
    बहुधा मलिन हो जाती हैं ! ॥ २८ ॥
    अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धा बभूवुः । ततो यस्य वचतात्तत्रावल-
    म्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्व्वन्ति ।
    इसके पीछे सबकेसब जालमें बँध गये । फिर जिसके वचनसे वहां उतरे थे
    उसका सब तिरस्कार करने लगे;
    यतः,-
    न गणस्याग्रतो गच्छेद्सिद्धे कार्ये समं फलम् ।
    यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते' ॥ २९ ॥
    जैसे कि कहा है-समूहके आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये, क्योंकि काम
    सिद्ध होनेसे फल सबको बराबर (प्राप्त) होता है, और जो काम बिगड़ जाय तो
    मुखियाही मारा जाता है' ॥ २९ ॥
    तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच - 'नायमस्य दोषः ।
    उसकी निन्दा सुन कर चित्रग्रीव बोला-'इसका कुछ दोष नहीं है;

२२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३०-
यतः,—
आपदामापतन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजंघा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥ ३० ॥
क्योंकि-हितकारक पदार्थ भी आने वाली आपत्तियोंका कारण हो जाता है, जैसे
गोदोहनके समय माताकी जांघ बछड़ेके बांधनेका खूँटा हो जाती है ॥ ३० ॥
अन्यच्च,—
स बन्धुर्यो विपन्नानामापदुद्धरणक्षमः ।
न तु भीतपरित्राणवस्तूपालम्भपण्डितः ॥ ३१ ॥
और दूसरे-बन्धु वह है जो आपत्तिमं पड़े हुये मनुष्योंको निकालनेमें समर्थ
हो, और जो दुःखितोंकी रक्षा करनेके उपायके बदले उलहना देनेमें चतुराई
बतावे वह बन्धु नहीं है ॥ ३१ ॥
विपत्काले विस्मय एव कापुरुषलक्षणम् । तदत्र धैर्यमवलम्ब्य
प्रतीकारश्चिन्त्यताम् ।
आपत्तिकालमें घबरा जाना तो कायर पुरुषका चिन्ह है, इसलिये, इस काममें
धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिये;
यतः,—
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ३२ ॥
क्योंकि-आपदामें धीरज, बढ़तीमें क्षमा, सभामें वाणीकी चतुरता, युद्धमें
पराक्रम, यशमें रुचि, और शास्त्रमें अनुराग ये बातें महात्माओंमें स्वभावसेही
होती हैं ॥ ३२ ॥
संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ३३ ॥
जिसे सम्पत्तिमें हर्ष, और आपत्तिमें खेद न हो, और संग्राममें धीरता हो,
ऐसा तीनों लोकके तिलक का जन्म विरला होता है और उसको विरली माता
ही जनती है ॥ ३३ ॥
१ अर्थात् तुमने इस उपायसे इस आपत्तिको क्यों नहीं दूर कर दिया ?.

-३७] सब कबूतरोंका जालके साथ उडना २३
अन्यच्च,—
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ३४ ॥
और इस संसारमें अपना कल्याण चाहने वाले पुरुषको निद्रा, तन्द्रा, भय,
क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देने चाहिये ॥ ३४ ॥
इदानीमप्येवं क्रियताम् । सर्वैरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीय-
ताम् ।
अब भी ऐसा करो, सब एक मत होकर जालको लेकर उड़ो;
यतः,—
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ ३५ ॥
क्योंकि-छोटी छोटी वस्तुओंके समूहसे भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे
घासकी बटी हुई रस्सियोंसे मत वाले हाथी बाँधे जाते हैं ॥ ३५ ॥
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ३६ ॥
अपने कुलके थोड़े मनुष्योंका समूह भी कल्याणका करने वाला होता है, क्योंकि
तुस (छिलके) से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते हैं ॥ ३६ ॥
इति विचिन्त्य पक्षिणः सर्वे जालमादायोत्पतिताः । अनन्तरं स
व्याधः सुदूराज्जालापहारकांस्तानवलोक्य पश्चाद्धावन्नचिन्तयत्-
यह विचार कर सब कबूतर जालको लेकर उड़े । फिर वह बहेलिया, जालको
लेकर उड़ने वाले कबूतरोंको दूरसे देख कर पीछे दौड़ता हुआ सोचने लगा.
‘संहतास्तु हरन्त्येते मम जालं विहंगमाः ।
यदा तु निपतिष्यन्ति वशमेष्यन्ति मे तदा’ ॥ ३७ ॥
‘ये पक्षी मिल कर मेरे जालको लेकर उड़े जाते हैं, परन्तु जब ये गिरेंगे
तब मेरे वशमें हो जायेंगे’ ॥ ३७ ॥
ततस्तेषु चक्षुर्विषयातिक्रान्तेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः ।
फिर जब वे पक्षी आंखसे नहीं दीखने लगे तब व्याध लौट गया.

२४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३८-
अथ लुब्धकं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोता ऊचुः—'किमिदानीं कर्तु-
मुचितम् ?' । चित्रग्रीव उवाच—
पीछे उस लोभीको लौटता देख कर कबूतर बोले कि—'अब क्या करना
चाहिये ?'. चित्रग्रीव बोला—
'माता मित्रं पिता चेति स्वभावात्रितयं हितम् ।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥ ३८ ॥
'माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभावसे हितकारी होते हैं, और दूसरे
(लोग) कार्य और किसी कारणसे हितकी इच्छा करने वाले होते हैं ॥ ३८ ॥
तदस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजो गण्डकीतीरे चित्रवने
निवसति, सोऽस्माकं पाशांश्छेत्स्यति ।' इत्यालोच्य सर्वे हिरण्यक-
विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदाऽपायशङ्कया शतद्वारं
विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतावपातभयाच्चकित-
स्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच—'सखे हिरण्यक ! किमस्मान्न
संभाषसे ?' । ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय ससंभ्रमं बहि-
र्निःसृत्याब्रवीत्—'आः, पुण्यवानस्मि । प्रियसूहन्मे चित्रग्रीवः
समायातः ।
इसलिये मेरा मित्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा गंडकी नदीके तीर पर चित्र-
वनमें रहता है, वह हमारे फंदोंको काटेगा । यह विचार कर सब हिरण्यकके
बिलके पास गये । हिरण्यक सदा आपत्ति आनेकी आशंकासे अपना बिल सौ द्वारका
बना कर रहता था । फिर हिरण्यक कबूतरोंके उतरनेकी आहटसे डर कर चुपकेसे
बैठ गया । चित्रग्रीव बोला—'हे मित्र हिरण्यक ! हमसे क्यों नहीं बोलते हो ?'.
फिर हिरण्यक उसका बोल पहिचान कर शीघ्रतासे बाहर निकल कर बोला—'अहा !
में बड़ा पुण्यवान् हूं कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया ।
यस्य मित्रेण संभाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः ।
यस्य मित्रेण संलापस्ततो नास्तीह पुण्यवान्' ॥ ३९ ॥
जिसकी मित्रके साथ बोल-चाल है, जिसका मित्रके साथ रहना-सहना हो,
और जिसकी मित्रके साथ गुप्त बात-चीत हो, उसके समान कोई इस संसारमें
पुण्यवान् नहीं है' ॥ ३९ ॥

-४१] कबूतरोंका चूहेके पास जाना २५
पाशबद्धांश्चैतान्दृष्ट्वा सविस्मयः क्षणं स्थित्वोवाच-'सखे ! किमे-
तत्?' । चित्रग्रीवोऽवदत्-'सखे ! अस्माकं प्राक्तनजन्म-
कर्मणः फलमेतत् ।
इन्हें जालमें फँसा देख कर आश्चर्यसे क्षणभर ठहर कर बोला-'मित्र ! यह
क्या है?'. चित्रग्रीव बोला-'मित्र ! यह हमारे पूर्वजन्मके कर्मोंका फल है.
यस्माच्च येन च यथा च यदा च यच्च
यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म ।
तस्माच्च तेन च तथा च तदा च तच्च
तावच्च तत्र च विधातृवशादुपैति ॥ ४० ॥
जिस कारणसे, जिसके करनेसे, जिस प्रकारसे, जिस समयमें, जिस काल तक
और जिस स्थानमें जो कुछ भला और बुरा अपना कर्म है उसी कारणसे,
उसीकें द्वारा, उसी प्रकारसे, उसी समयमें, वही कर्म, उसी काल तक, उसी
स्थानमें, प्रारब्धके वशसे पाता है ॥ ४० ॥
रोगशोकपरीतापबन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ॥ ४१ ॥
रोग, शोक, पछतावा, बन्धन और आपत्ति, ये देहधारि(प्राणि)योंके लिये
अपने अपराधरूपी वृक्षके फल हैं' ॥ ४१ ॥
एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकश्चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरमुपसर्पति ।
चित्रग्रीव उवाच — 'मित्र ! मा मैवम्। अस्मदाश्रितानामेषां ताव-
त्पाशांश्छिन्धि, तदा मम पाशं पश्चाच्छेत्स्यसि ।' हिरण्यकोऽ-
प्याह—'अहमल्पशक्तिः, दन्ताश्च मे कोमलाः । तदेतेषां पाशां-
श्छेत्तुं कथं समर्थः ? तद्यावन्मे दन्ता न त्रुट्यन्ति तावत्तव पाशं
छिनद्मि । तदनन्तरमेषामपि बन्धनं यावच्छक्यं छेत्स्यामि' ।
चित्रग्रीव उवाच — 'अस्त्वेवम् । तथापि यथाशक्त्येतेषां बन्धनं
खण्डय' । हिरण्यकेनोक्तम् — 'आत्मपरित्यागेन यदाश्रितानां परि-
रक्षणं तन्न नीतिविदां संमतम् ।
यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीवके बंधन काटनेके लिये शीघ्र पास आया.
चित्रग्रीव बोला-'मित्र ! ऐसा मत करो, पहले मेरे इन आश्रितोंके बन्धन काटो,

२६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ४२-
मेरा बन्धन पीछे काटना' । हिरण्यकने भी कहा-'मित्र ! मैं निर्बल हूं, और
मेरे दांतभी कोमल हैं, इसलिये इन सबका बंधन काटनेके लिये कैसे समर्थ हूं ?
इसलिये जब तक मेरे दांत नहीं टूटेंगे तब तक तुम्हारा फंदा काटता हूं । पीछे
इनकेभी बंधन जहां तक कट सकेंगे तब तक काटूंगा' । चित्रग्रीव बोला-'यह
ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो' । हिरण्यकने कहा-'अपनेको छोड़ कर
अपने आश्रितोंकी रक्षा करना यह नीति जानने वालों(पंडितों)को संमत नहीं है;
यतः,—
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ४२ ॥
क्योंकि—मनुष्यको आपत्तिके लिये धनकी, धन देकर स्त्रीकी, और धन तथा
स्त्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
अन्यच्च,—
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणाः संस्थितिहेतवः ।
तान्निघ्नता किं न हतं, रक्षता किं न रक्षितम् ?' ॥ ४३ ॥
और दूसरे—धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष इन चारोंकी रक्षाके लिये प्राण
कारण हैं, इसलिये जिसने इन प्राणोंका घात किया उसने क्या घात नहीं
किया ? अर्थात् सब कुछ घात किया, और जिसने प्राणोंका रक्षण किया उसने
क्या रक्षण न किया ? अर्थात् सबका रक्षण किया ॥ ४३ ॥
चित्रग्रीव उवाच-‘सखे ! नीतिस्तावदीदृश्येव । किं त्वहमस्सदा-
श्रितानां दुःखं सोढुं सर्वथाऽसमर्थः । तेनेदं ब्रवीमि ।
चित्रग्रीव बोला-‘मित्र ! नीति तो ऐसीही है परन्तु मैं अपने आश्रितोंका
दुःख सहनेको सब प्रकारसे असमर्थ हूं इस कारण यह कहता हूं.
यतः,—
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ ४४ ॥
क्योंकि—पण्डितको पराये उपकारके लिये अपना धन और प्राणोंकोभी छोड़
देना चाहिये, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये अच्छे पुरुषोंके लिये
प्राण त्यागना अच्छा है ॥ ४४ ॥

-४९ ] साथियोंके लिये चित्रग्रीवकी उदारता २७
अयमपरश्चासाधारणो हेतुः—
जातिद्रव्यगुणानां च साम्यमेषां मया सह ।
मत्प्रभुत्वफलं ब्रूहि कदा किं तद्भविष्यति ॥ ४५ ॥
और दूसरा यहभी एक विशेष कारण है-इन कबूतरोंका और मेरा जाति,
द्रव्य और बल समान है, तो मेरी प्रभुताका फल कहो, जो अब न होगा तो किस
कालमें और क्या होगा ? ॥ ४५ ॥
अन्यच्च,—
विना वर्तनमेवैते न त्यजन्ति ममान्तिकम् ।
तन्मे प्राणव्ययेनापि जीवयैतान्ममाश्रितान् ॥ ४६ ॥
और दूसरे-आजीविकाके विना भी ये मेरा साथ नहीं छोड़ते हैं, इसलिये
प्राणोंके बदलेभी इन मेरे आश्रितोंको जीवदान दो ॥ ४६ ॥
किं च,—
मांसमूत्रपुरीषास्थिनिर्मितेऽस्मिन्कलेवरे ।
विनश्वरे विहायास्थां यशः पालय मित्र ! मे ॥ ४७ ॥
और-हे मित्र ! मांस, मल, मूत्र, तथा हड्डीसे बने हुए इस विनाशी शरीरमें
आस्थाको छोड़ कर मेरे यशको बढ़ाओ ॥ ४७ ॥
अपरं च पश्य,—
यदि नित्यमनित्येन निर्मलं मलवाहिना ।
यशः कायेन लभ्येत तन्न लब्धं भवेन्नु किम् ? ॥ ४८ ॥
और भी देखो-जो, अनित्य और मल-मूत्रसे भरे हुए शरीरसे निर्मल और
नित्य यश मिले तो क्या नहीं मिला ? अर्थात् सब कुछ मिला ॥ ४८ ॥
यतः,—
शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम् ।
शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः' ॥ ४९ ॥
क्योंकि—शरीर तथा दयादि गुणोंमें बड़ा अन्तर है. शरीर तो क्षणभंगुर है,
और गुण कल्पके अन्त तक रहने वाले हैं' ॥ ४९ ॥

२८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५०-
इत्याकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन्नब्रवीत्—'साधु
मित्र ! साधु । अनेनाश्रितवात्सल्येन त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि
युज्यते' । एवमुक्त्वा तेन सर्वेषां बन्धनानि छिन्नानि । ततो हिर-
ण्यकः सर्वान्सादरं संपूज्याह—'सखे चित्रग्रीव ! सर्वथात्र जाल-
बन्धनविधौ दोषमाशङ्क्यात्मन्यवज्ञा न कर्तव्या ।
यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकायमान होकर बोला—'धन्य है,
मित्र ! धन्य है । इन आश्रितों पर दया विचारनेसे तो तुम तीनों लोककीही
प्रभुताके योग्य हो' । ऐसा कह कर उसने सबका बंधन काट डाला। पीछे हिरण्यक
सबका आदर-सत्कार कर बोला-'मित्र चित्रग्रीव ! इस जालबंधनके विषयमें
दोष की शंका कर अपनी अवज्ञा नहीं चाहिये ।
यतः,—
योऽधिकायोजनशतात्पश्यतीहामिषं खगः ।
स एव प्राप्तकालस्तु पाशबन्धं न पश्यति ॥ ५० ॥
क्योंकि—जो पक्षी सैकड़ों योजनसे भी अधिक दूरसे (छोटेसे) अन्नके दानेको
या मांसको देखता है वही बुरा समय आनेपर जालकी ( बडी ) गांठको नहीं
देखता है ॥ ५० ॥
अपरं च,—
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं
गजभुजंगमयोरपि बन्धनम् ।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां
विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ ५१ ॥
और दूसरे-चंद्रमा तथा सूर्यको ग्रहणकी पीड़ा, हाथी और सर्पका बंधन,
और पण्डितोंकी दरिद्रता, देख कर मेरी तो समझमें यह आता है कि
प्रारब्ध ही बलवान् है ॥ ५१ ॥
१ योजन=चार कोश याने ८ मील.

-५३ ] सुहृद्भक्ति देख कर कौएकी प्रीति २९
अन्यच्च,—
व्योमैकान्तविहारिणोऽपि विहगाः संप्राप्नुवन्त्यापदं
बध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मत्स्याः समुद्रादपि ।
दुर्नीतं किमिहास्ति, किं सुचरितं, कः स्थानलाभे गुणः ?
कालो हि व्यसनप्रसारितकरो गृह्णाति दूरादपि'॥ ५२ ॥
और आकाशके एकान्त स्थानमें विहार करने वाले पक्षीभी विपत्तिमें पड़ जाते हैं,
और चतुर धीवर मछलियोंको अथाह समुद्रसेभी पकड़ लेते हैं। इस संसारमें
दुर्नीति क्या है, और सुनीति क्या है, और विपत्तिरहित स्थानके लाभमें क्या
गुण है ? अर्थात् कुछ नहीं है । क्योंकि, काल आपत्तिरूप अपने हाथ फैला
कर बैठा है, और समय आने पर दूरहीसे ग्रहण कर (झपट ) लेता है ॥५२॥
इति प्रबोध्यातिथ्यं कृत्वालिङ्ग्य च चित्रग्रीवस्तेन संप्रेषितो यथेष्ट-
देशान्सपरिवारो ययौ । हिरण्यकोऽपि खविवरं प्रविष्टः ।
यों समझा कर और अतिथि सत्कार कर तथा मिल भेटकर उसने चित्रग्रीवको
बिदा किया और वह अपने परिवारसमेत अपने देशको गया । हिरण्यक भी
अपने बिलमें घुस गया ।
यानि कानि च मित्राणि कर्तव्यानि शतानि च ।
पश्य मूषकमित्रेण कपोता मुक्तबन्धनाः ॥ ५३ ॥
कोई हो, मनुष्यको सैकड़ों मित्र बनाने चाहिये । देखो, मूषक मित्रने कबू-
तरोंका बंधन काट डाला ॥ ५३ ॥
अथ लघुपतनकनामा काकः सर्ववृत्तान्तदर्शी साश्चर्यमिद-
माह—'अहो हिरण्यक ! श्लाघ्योऽसि । अतोऽहमपि त्वया सह
मैत्रीमिच्छामि, अतो मां मैत्र्येणानुग्रहीतुमर्हसि' । एतच्छ्रुत्वा
हिरण्यकोऽपि विवराभ्यन्तरादाह—'कस्त्वम् ?' । स ब्रूते—'लघु-
पतनकनामा वायसोऽहम्' । हिरण्यको विहस्याह—'का त्वया
सह मैत्री ?
इसके बाद लघुपतनक नाम कौवा ( चित्रग्रीवके बंधन आदि ) सब वृत्तान्तको
जानने वाला आश्चर्यसे यह बोला—'हे हिरण्यक ! तुम प्रशंसाके योग्य हो, इस-
लिये मैं भी तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता हूं। इसलिये कृपा करके मुझसे भी
मित्रता करलो' । यह सुन कर हिरण्यकभी बिलके भीतरसे बोला—'तू कौन है ?

३० हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५४-
वह बोला-'मैं लघुपतनक नाम कौवा हूं'। हिरण्यक हँस कर कहने लगा-'तेरे
संग कैसी मित्रता ?
यतः,—
यद्येन युज्यते लोके बुधस्तत्तेन योजयेत् ।
अहमन्नं भवान् भोक्ता कथं प्रीतिर्भविष्यति ? ॥ ५४ ॥
क्योंकि-पण्डितको चाहिये कि जो वस्तु संसारमें जिस वस्तुके योग्य हो
उसका उससे मेल आपसमें कर दे. मैं तो अन्न हूं और तुम खाने वाले हो, इस
लिये अपनी ( भक्ष्य और भक्षककी ) प्रीति कैसी होगी ? ॥ ५४ ॥
अपरं च,—
भक्ष्य-भक्षकयोः प्रीतिर्विपत्तेरेव कारणम् ।
शृगालात्पाशबद्धोऽसौ मृगः काकेन रक्षितः' ॥ ५५ ॥
और दूसरे-भक्ष्य और भक्षककी प्रीति आपत्तिकी जड़ है । गीदड़से जालमें
बँधाया गया मृग कौएसे रक्षा किया गया था ॥ ५५ ॥
वायसोऽब्रवीत्—'कथमेतत् ?' । हिरण्यकः कथयति—
कौवा बोला —'यह कथा कैसे है ?'. हिरण्यक कहने लगा—
कथा २
[ मृग, काग और धूर्त गीदडकी कहानी २ ]
“अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नामारण्यानी । तस्यां चिरान्म-
हता स्नेहेन मृगकाकौ निवसत:। स च मृगः स्वेच्छया भ्राम्यन्हृष्ट-
पुष्टाङ्गः केनचिच्छृगालेनावलोकितः । तं दृष्ट्वा शृगालोऽचिन्त-
यत्—'आः, कथमेतन्मांसं सुललितं भक्षयामि ? भवतु, विश्वासं
तावदुत्पादयामि ।' इत्यालोच्योपसृत्याब्रवीत्—'मित्र ! कुशलं
ते ?'। मृगेणोक्तम्—'कस्त्वम् ?'। स ब्रूते-'क्षुद्रबुद्धिनामा जम्बुको-
ऽहम् । अत्रारण्ये बन्धुहीनो मृतवन्निवसामि । इदानीं त्वां मित्र-
मासाद्य पुनः सबन्धुर्जीवलोकं प्रविष्टोऽस्मि । अधुना तवानुचरेण
मया सर्वथा भवितव्यम्' । मृगेणोक्तम्—'एवमस्तु' । ततः पश्चा-
दस्तंगते सवितरि भगवति मरीचिमालिनि तौ मृगस्य वासभूमिं
गतौ । तत्र चम्पकवृक्षशाखायां सुबुद्धिनामा काको मृगस्य चिर-
मित्रं निवसति । तौ दृष्ट्वा काकोऽवदत्—'सखे चित्राङ्ग ! कोऽयं

-५६ ] अंधा गिद्ध और बिलाव आदि की कहानी ३१

-५६ ] अंधा गिद्ध और बिलाव आदि की कहानी ३१
द्वितीयः ?' । मृगो ब्रूते—'जम्बूकोऽयम् । अस्मत्सख्यमिच्छन्ना-
गतः' । काको ब्रूते—'मित्र ! अकस्मादागन्तुना सह मैत्री न युक्ता ।
मगधदेशमें चम्पकवती नामका एक महान् अरण्य था, उसमें बहुत दिनोंसे मृग
और कौवा बड़े स्नेहसे रहते थे । किसी गीदड़ने उस मृगको हट्टाकट्टा और
अपनी इच्छासे इधर उधर घूमता हुवा देखा. इसको देख कर गीदड़ सोचने
लगा-अरे, कैसे इस सुन्दर (मीठा) मांसको खाऊं ? जो हो, पहले इसे विश्वास
उत्पन्न कराऊं । यह विचार कर उसके पास जाकर बोला-'हे मित्र ! तुम
कुशल हो ?' मृगने कहा-'तू कौन है?'. वह बोला-'मैं क्षुद्रबुद्धि नामक गीदड़
हूं. इस बनमें बन्धुहीन मरेके समान रहता हूं; और अब तुमसे मित्रको पाकर
फिर इस संसारमें बन्धुसहित जी उठा हूं और सब प्रकारसे तुमारा सेवक बन
कर रहूंगा' । मृगने कहा-'ऐसाही हो, अर्थात् रहा कर । इसके अनन्तर
किरणोंकी मालासे शोभित भगवान् सूर्यके अस्त हो जानेपर वे दोनों मृगके
घरको गये और वहां चंपाके वृक्षकी डाल पर मृगका परम मित्र सुबुद्धि नाम कौवा
रहता था । कौएने इन दोनोंको देखकर कहा—'मित्र ! यह चितकबरा दूसरा
कौन है ?' मृगने कहा—'यह गीदड़ है । हमारे साथ मित्रता करनेकी इच्छासे
आया है' । कौवा बोला—'मित्र ! अनायास आए हुएके साथ मित्रता नहीं
करनी चाहिये;
तथा चोक्तम्,—
अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित् ।
मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्गवः ॥ ५६ ॥
कहाभी है कि—जिसका कुल और स्वभाव नहीं जाना है उसको घरमें कभी
न ठहराना चाहिये । क्योंकि बिलावके अपराधसे एक बूढा गिद्ध मारा गया ॥५६
तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । काकः कथयति—
यह सुन वे दोनों बोले—'यह कथा कैसे है ?' कौवा कहने लगा,—
कथा ३
[ अंधा गिद्ध, बिलाव और चिडियोंकी कहानी ३ ]
अस्ति भागीरथीतीरे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान्पर्कटीवृक्षः ।
तस्य कोटरे दैवदुर्विपाकाद्गलितनखनयनो जरद्गवनामा गृध्रः
प्रतिवसति । अथ कृपया तज्जीवनाय तद्वृक्षवासिनः पक्षिणः

खोखलेमें दुर्भाग्यसे एक अंधा तथा नखहीन जरद्गव नामक गिद्ध रहता था, और

३२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५७-
स्वाहारात्किंचित्किंचिदुद्धृत्य ददति । तेनासौ जीवति । अथ
कदाचिद्दीर्घकर्णनामा मार्जारः पक्षिशावकान्भक्षितुं तत्रागतः ।
ततस्तमायान्तं दृष्ट्वा पक्षिशावकैर्भयातैः कोलाहलः कृतः ।
तच्छ्रुत्वा जरद्गवेनोक्तम्—'कोऽयमायाति ?'। दीर्घकर्णो गृध्रमव-
लोक्य सभयमाह—'हा, हतोऽस्मि' ।
गंगाजीके किनारे गृध्रकूट नाम पर्वत पर एक बड़ा पाकड़का पेड़ था। उसके
खोखलेमें दुर्भाग्यसे एक अंधा तथा नखहीन जरद्गव नामक गिद्ध रहता था, और
उस वृक्षके वासी कृपा करके उसके पालनके लिये अपने आहारमेंसे थोड़ा थोड़ा
निकाल कर देते थे; उससे वह जीता था। फिर एक दिन दीर्घकर्ण नाम बिलाव
पक्षियोंके बच्चे खानेके लिये वहां आया। पीछे उसे आया हुआ देख कर डरसे घबरा
कर पक्षियोंके बच्चे चिंहचिंहाने लगे. यह सुन जरद्गवने कहा—'यह कौन
आ रहा है?'. दीर्घकर्ण गिद्धको देख डर कर बोला—'हाय, मैं मारा गया.'
यतः,—
तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम् ।
आगतं तु भयं वीक्ष्य नरः कुर्याद्यथोचितम् ॥ ५७ ॥
क्योंकि—भयसे तभी तक डरना चाहिये जब तक वह पास न आवे, परन्तु
भयको पास आया देख कर मनुष्यको जो उचित हो सो करना चाहिये ॥ ५७ ॥
अधुनास्य संनिधाने पलायितुमक्षमः । तद्यथा भवितव्यं तद्भवतु ।
तावद्विश्वासमुत्पाद्यास्य समीपं गच्छामि ।' इत्यालोच्योपसृ-
त्याब्रवीत्—'आर्य ! त्वामभिवन्दे ।' गृध्रोऽवदत्—'कस्त्वम् ?' ।
सोऽवदत्—'मार्जारोऽहम्' । गृध्रो ब्रूते—'दूरमपसर । नो चेद्ध-
न्तव्योऽसि मया' । मार्जारोऽवदत्—'श्रूयतां तावदस्मद्वचनम् ।
ततो यद्यहं वध्यस्तदा हन्तव्यः ।
अब इसके पाससे भाग नहीं सकता हूं, इसलिये जो होनहार है सो हो ।
पहले विश्वास पैदा कर इसके पास जाऊं । यह विचार उसके पास जाकर
बोला—'हे महाराज ! मैं आपको प्रणाम करता हूं'. गिद्ध बोला—'तू कौन है ?'.
वह बोला—'मैं बिलाव हूं'. गिद्ध बोला—'दूर हट जा; नहीं तो मैं तुझे मार
डालूंगा'. बिलाव बोला—'पहले मेरी बात तो सुन, लो पीछे जो मैं मारनेके
योग्य होऊं तो मार डालना ।

-५९ ] बिलावकी धर्मके बहानेसे आश्रययाचना ३३
यतः,-
जातिमात्रेण किं कश्चिद्धन्यते पूज्यते क्वचित् ? ।
व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् ॥ ५८ ॥
क्योंकि-केवल जातिसे क्या कभी कोई मारने अथवा सत्कार करने लायक
होता है ? परंतु व्यवहारको जान कर मारने अथवा पूजनेके योग्य होता है॥५८॥
गृध्रो ब्रूते—'ब्रूहि, किमर्थमागतोऽसि ?' । सोऽवदत्—'अहमत्र
गङ्गातीरे नित्यस्नायी निरामिषाशी ब्रह्मचारी चान्द्रायणव्रतमा-
चरंस्तिष्ठामि । 'यूयं धर्मज्ञानरता विश्वासभूमयः' इति पक्षिणः
सर्वे सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति । अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो
धर्मं श्रोतुमिहागतः । भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथिं
हन्तुमुद्यताः ।
गिद्ध बोला-'कह, किसलिये आया है ?' वह बोला-'मैं यहां पर गंगाजीके
किनारे नित्य स्नान करता हूं। मांसका भक्षण न करने वाला ब्रह्मचारी हूं और
चान्द्रायण व्रत करता हूं । 'तुम्हारी धर्म तथा ज्ञानमें प्रीति है और
विश्वासपात्र हो', इस प्रकार सब पक्षी सदा मेरे सामने तुम्हारी प्रशंसा किया
करते हैं। तुम विद्या और अवस्थामें बड़े हो, इसलिये आपसे धर्म सुननेके लिये
यहां आया हूं और आप ऐसे धर्मी हैं कि मुझ अतिथिको मारनेके लिये
तैयार हैं।
गृहस्थधर्मश्चैषः-
अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५९ ॥
परन्तु गृहस्थधर्म तो यह है कि-अपने घर पर वैरीभी आवे तो उसका
यथोचित आदर करना चाहिये, जैसे वृक्ष अपने (पास आये हुए) काटने वालेके
पास गई अपनी छायाको समेट नहीं लेता है ॥ ५९ ॥
यदि वा धनं नास्ति तदा प्रीतिवचसाप्यतिथिः पूज्य एव ।
जो धन न हो तो मीठे २ वचनोंसेही अतिथिका सत्कार करना चाहिये ।
१ त्रिकाल-स्नान कर सावधान और जितेन्द्री होकर कृष्णपक्षमें एक २ ग्रास कम
करे और शुक्लपक्षमें एक २ ग्रास बढावे इसीको मनुने 'चान्द्रायण-व्रत' कहा है.
हि० ३

३४ हितोपदेशः [मित्रलाभः ६०-
यतः,—
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ६० ॥
क्यों कि-कुशाका आसन, बैठनेकी भूमि, जल, और चौथी सत्य और मीठी
वाणी इनका सज्जनोंके घरमें कभी टोटा नहीं होता है ॥ ६० ॥
अपरं च,—
निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ।
न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥ ६१ ॥
और दूसरे-सज्जन लोग, गुणहीन प्राणियों परभी दया करते हैं। जैसे चन्द्रमा
चाण्डालके घर पर पड़ी चांदनीको नहीं समेट लेता है ॥ ६१ ॥
अन्यच्च,—
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ।
स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥ ६२ ॥
और जिसके घरसे अतिथि विमुख लौट जाता है, वह अतिथि अपने पापको
देकर और उस गृहस्थका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ ६२ ॥
अन्यच्च,—
उत्तमस्यापि वर्णस्य नीचोऽपि गृहमागतः ।
पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोऽतिथिः१ ॥ ६३ ॥
और उत्तम वर्णके घर नीच वर्णकाभी अतिथि आवे तो उसका यथोचित
सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अतिथि सर्वदेवमय है ॥ ६३ ॥
गृध्रोऽवदत्—'मार्जारो हि मांसरुचिः । पक्षिशावकाश्चात्र निव-
सन्ति । तेनाहमेवं ब्रवीमि ।' तच्छ्रुत्वा मार्जारो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ
स्पृशति । ब्रूते च—'मया धर्मशास्त्रं श्रुत्वा वीतरागेणेदं दुष्करं व्रतं
चान्द्रायणमध्यवसितम् । परस्परं विवदमानानामपि धर्मशास्त्रा-
णाम् 'अहिंसा परमो धर्मः' इत्यत्रैकमत्यम् ।
गिद्ध बोला-'बिलावकी मांसमें जरूर रुचि होती है, और यहां पक्षियोंके
छोटे २ बच्चे रहते हैं. इसलिये मैं ऐसे कहता हूं'। यह सुन कर बिलावने भूमिको
१ कहा है कि, जो फल सब देवताओंकी सेवासे मिलता है वही फल अतिथिकी
सेवासे मिलता है ।

-६८ ] बिलावकी चाटुता पर आश्रय दे देना ३५

छूकर कानोंको छुआ, और बोला-‘मैंने धर्मशास्त्र सुन कर और विषयवासनाको
छोड़ यह कठिन चान्द्रायण व्रत किया है । आपसमें धर्मशास्त्रोंका विरोध होने
परभी “हिंसा न करना यही परम धर्म है” इस मंतव्यमें सब एकमत हैं,—
यतः,—
सर्वहिंसानिवृत्ता ये नराः सर्वसहाश्च ये ।
सर्वस्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ६४ ॥
क्योंकि—जो मनुष्य सब प्रकारकी हिंसासे रहित हैं, सब( असह्य )को सहते
हैं और सबको सहारा देते हैं वे स्वर्गको जाते हैं ॥ ६४ ॥
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥ ६५ ॥
एक धर्मही मित्र है जो मरने परभी ( आत्माके ) साथ जाता है, अन्य सब
वस्तु शरीरके साथ ( यहां ) ही नाश हो जाती हैं ॥ ६५ ॥
योऽत्ति यस्य यदा मांसमुभयोः पश्यतान्तरम् ।
एकस्य क्षणिका प्रीतिरन्यः प्राणैर्विमुच्यते ॥ ६६ ॥
जो प्राणी जिस समय, जिस प्राणिका मांस खाता है उन दोनोंमें अन्तर
देखो—एकको तो केवल क्षणभरका संतोष होता है और दूसरा प्राणोंसे जाता
है ॥ ६६ ॥
मर्त्तव्यमिति यद्दुःखं पुरुषस्योपजायते ।
शक्यते नानुमानेन परेण परिवर्णितुम् ॥ ६७ ॥
“मुझे अवश्य मरना होगा” ऐसी चिन्तासे मनुष्यको जो ( प्रत्यक्ष ) दुःख
होता है वह दुःख ( केवल ) अनुमानसे दूसरा मनुष्य वर्णन नहीं कर सकता
है ॥ ६७ ॥
शृणु पुनः,—
स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते ।
अस्य दग्धोदरस्यार्थे कः कुर्यात्पातकं महत् ? ॥ ६८ ॥
फिर सुनो–जो पेट अपने आप उगी हुई साग-भाजीसे भी भरा जा सकता
है, उस जले पेटके लिये ऐसा बड़ा ( भयंकर ) पाप कौन करे ? ॥ ६८ ॥
एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः ।
इस प्रकार विश्वास पैदा कर वह बिलाव वृक्षके खोडरमें रहने लगा ।
ततो दिनेषु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं
खादति । येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातैर्विलपद्भिरितस्ततो

३६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६९-
जिज्ञासा समारब्धा । तत्परिज्ञाय मार्जारः कोटरान्निःसृत्य बहिः
पलायितः । पश्चात्पक्षिभिरितस्ततो निरूपयद्भिस्तत्र तरुकोटरे शा-
वकास्थीनि प्राप्तानि । अनन्तरं त ऊचुः—“अनेनैव जरद्गवेनास्माकं
शावकाः खादिताः” इति सर्वैः पक्षिभिर्निश्चित्य गृध्रो व्यापा-
दितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“अज्ञातकुलशीलस्य-” इत्यादि’ ॥ इत्या-
कर्ण्य स जम्बुकः सकोपमाह—‘मृगस्य प्रथमदर्शनदिने भवान-
प्यज्ञातकुलशील एव, तत्कथं भवता सहैतस्य स्नेहानुवृत्तिरुत्त-
रोत्तरं वर्धते ?
और थोड़े दिन बीत जाने पर वह पक्षियोंके बच्चोंको पकड़ खोडरमें लाकर
नित्य खाने लगा । जिन पक्षियोंके बच्चे खाये गये थे वे शोकसे व्याकुल विलाप
करते हुए इधर उधर ढूंढ़ने लगे । बिलाव यह जान कर खोडरसे निकल कर
बाहर भाग गया । उसके पीछे इधर उधर ढूंढते हुए पक्षियोंने उस पेड़की खोह-
ड़में बच्चोंकी हड्डियां पाईं । फिर उन्होंने कहा कि—“इस जरद्गवने हमारे बच्चे खाये
हैं” । यह बात सब पक्षियोंने निश्चय करके उस बूढे गिद्धको मार डाला ।
इसीलिये मैं कहता हूं कि—“जिसका कुल और स्वभाव” इत्यादि’. यह सुन
वह सियार झुंझल कर बोला-‘मृगसे पहलेही मिलनेके दिन तुम्हाराभी तो कुल
और स्वभाव नहीं जाना गया था, फिर किस प्रकार तुम्हारे साथ इसकी गाढ़ी
मित्रता क्रम क्रमसे बढ़ती जाती है ?
यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीरपि ।
निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ॥ ६९ ॥
जहां पंडित नहीं होता है वहां थोड़े पढ़ेकीभी बड़ाई होती है । जैसे कि जिस
देशमें पेड़ नहीं होता है वहां अरण्डाका वृक्षही पेड़ गिना जाता है ॥ ६९ ॥
अन्यच्च,—
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ ७० ॥
और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियोंकी गिनती
( समझ ) है । उदारचरित वालोंको तो सब पृथ्‍वीही कुटुंब है ॥ ७० ॥
यथायं मृगो मम बन्धुस्तथा भवानपि’ । मृगोऽब्रवीत्—‘किमनेनो-
त्तरेण ? सर्वैरेकत्र विश्रम्भालापैः सुखिभिः स्थीयताम् ।

-७१ ] सियारकी चालसे हरिणका बंधन ३७
जैसा यह मृग मेरा बन्धु ( दोस्त ) है वैसेही तुमभी हो' । मृग बोला-'इस
उत्तर-प्रत्युत्तरसे क्या है ? सब एक स्थानमें विश्वासकी बातचीत कर सुखसे रहो ।
यतः,—
न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा' ॥ ७१ ॥
क्योंकि-न तो कोई किसीका मित्र है, और न कोई किसीका शत्रु है ।
व्यवहारसे मित्र तथा शत्रु बन जाते हैं' ॥ ७१ ॥
काकेनोक्तम् -'एवमस्तु ।' अथ प्रातः सर्वे यथाभिमतदेशं गताः ।
कौवेने कहा-'ठीक है' । फिर प्रातःकाल सब अपने २ मनमाने देशको गये ॥
एकदा निभृतं शृगालो ब्रूते - 'सखे ! अस्मिन्वनेकदेशे सस्यपूर्ण-
क्षेत्रमस्ति । तदहं त्वां नीत्वा दर्शयामि ।' तथा कृते सति मृगः
प्रत्यहं तत्र गत्वा सस्यं खादति । अथ क्षेत्रपतिना तद्दृष्ट्वा पाशो
योजितः । अनन्तरं पुनरागतो मृगः पाशैर्बद्धोऽचिन्तयत्—'को
मामितः कालपाशादिव व्याधपाशान्त्रातुं मित्रादन्यः समर्थः ?'
अत्रान्तरे जम्बुकस्तत्रागत्योपस्थितोऽचिन्तयत्—'फलिता तावद-
स्माकं कपटप्रबन्धेन मनोरथसिद्धिः । एतस्योत्कृत्यमानस्य मांसा-
सृग्लिप्तान्यस्थीनि मयावश्यं प्राप्तव्यानि । तानि बाहुल्येन भोजनानि
भविष्यन्ति ।' मृगस्तं दृष्ट्वोल्लासितो ब्रूते—'सखे ! छिन्धि तावन्मम
बन्धनम्, सत्वरं त्रायस्व माम् ।
एक दिन एकांतमें सियारने कहा-'मित्र मृग ! इस वनमें एक दूसरे स्थानमें
अनाजसे भरा हुआ खेत है, सो चल तुझे दिखाऊं' । वैसा करने पर मृग वहां
जा कर नित्य अनाज खाता रहा । एक दिन उसे खेत वालेने देख कर
फंदा लगाया । इसके अनन्तर जब वहां मृग फिर चरनेको आया सोही जालमें
फँस गया और सोचने लगा-'मुझे इस कालकी फांसीके समान व्याधके फंदेसे
मित्रको छोड़ कौन बचा सकता है?' इस बीचमें शृगाल वहां आकर उपस्थित
हुआ, और सोचने लगा-'मेरे छलकी चाल (सफाई)से मेरा मनोरथ सिद्ध
हुआ और इस उधड़े हुएकी मांस और लोहू लगी हुई हड्डियां मुझे अवश्य
मिलेंगी और वे मनमानी खानेके लिये होंगी.' मृग उसे देख प्रसन्न होकर
बोला-'हे मित्र ! मेरा बन्धन काटो और मुझे शीघ्र बचाओ ।

३८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ७२-
यतः,—
आपत्सु मित्रं जानीयाद्युद्धे शूरमृणे शुचिम् ।
भार्याँ क्षीणेषु वित्तेषु व्यसनेषु च बान्धवान् ॥ ७२ ॥
आपत्तिमें मित्र, युद्धमें शूर, उधार(ऋण)में सच्चा व्यवहार, निर्धनतामें स्त्री
और दुःखमें भाई ( या कुटुंबी ) परखे जाते हैं ॥ ७२ ॥
अपरं च,—
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः’ ॥ ७३ ॥
और दूसरे-विवाहादि उत्सवमें, आपत्तिमें, अकालमें, राज्यके पलटनेमें, राज-
द्वारमें तथा श्मशानमें, जो साथ रहता है वह बान्धव है' ॥ ७३ ॥
जम्बुको मुहुर्मुहुः पाशं विलोक्याचिन्तयत्—'दृढस्तावदयं
बन्धः ।' ब्रूते च—'सखे ! स्नायुनिर्मिता एते पाशाः । तदद्य
भट्टारकवारे कथमेतान्दन्तैः स्पृशामि ? मित्र ! यदि चित्ते
नान्यथा मन्यसे तदा प्रभाते यत्त्वया वक्तव्यं तत्कर्तव्यम् ।' इत्यु-
क्त्वा तत्समीप आत्मानमाच्छाद्य स्थितः सः । अनन्तरं स काकः
प्रदोषकाले मृगमनागतमवलोक्येतस्ततोऽन्विष्य तथाविधं
दृष्ट्वोवाच—'सखे ! किमेतत् ?' । मृगेणोक्तम्-‘अवधीरितसुहृ-
द्वाक्यस्य फलमेतत् ।
सियार जालको वार वार देख सोचने लगा-‘यह बड़ा कड़ा बंधा है’. और
बोला-‘मित्र ! ये फंदे तांतके बने हुए हैं, इसलिये आज रविवारके दिन इन्हें
दांतोंसे कैसे छुऊं ? मित्र ! जो बुरा न मानो तो प्रातःकाल जो कहोगे सो करूंगा’।
ऐसा कह कर उसके पासही वह अपनेको छिपा कर बैठ गया । पीछे वह कौवा
सांझ होने पर मृगको नहीं आया देख कर इधर उधर ढूंढते ढूंढते उस प्रकार
उसे ( बंधनमें ) देख कर बोला-‘मित्र ! यह क्या है?'. मृगने कहा-‘मित्रका
वचन नहीं माननेका फल है;
तथा चोक्तम्,—
सुहृदां हितकामानां यः शृणोति न भाषितम् ।
विपत्सन्निहिता तस्य स नरः शत्रुनन्दनः’ ॥ ७४ ॥

-७७] सियारको कौवेका हार्दिक धिक्कार ३९
जैसा कहा है कि-जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रोंका वचन नहीं सुनता है
उसके पासही विपत्ति है, और वह अपने शत्रुओंको प्रसन्न करने वाला है' ॥७४॥
काको ब्रूते—‘स वञ्चकः क्वास्ते ?’ । मृगेणोक्तम्—‘मन्मांसार्थी
तिष्ठत्यत्रैव’ । काको ब्रूते—‘उक्तमेव मया पूर्वम्,-
कौवा बोला-‘वह ठग कहां है ?’. मृगने कहा-‘मेरे मांसका लोभी यहांही
कहाँ बैठा होगा ?’. कौवा बोला-‘मैंने पहलेही कहा था,—
अपराधो न मेऽस्तीति नैतद्विश्वासकारणम् ।
विद्यते हि नृशंसेभ्यो भयं गुणवतामपि ॥ ७५ ॥
‘मेरा कुछ अपराध नहीं है' अर्थात् मैने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा है, अत एव
यहभी मेरे संग विश्वासघात न करेगा यह बात कुछ विश्वासका कारण नहीं
है। क्योंकि गुण और दोषको बिना सोचे शत्रुता करने वाले नीचोंसे
सज्जनोंको अवश्य भय होता ही है ॥ ७५ ॥
दीपनिर्वाणगन्धं च सुहृद्वाक्यमरुन्धतीम् ।
न जिघ्रन्ति न शृण्वन्ति न पश्यन्ति गतायुषः ॥ ७६ ॥
और जिनकी मृत्यु पास आ लगी है, ऐसे मनुष्य न तो बुझे हुए दियेकी
चिरांद सूंघ सकते हैं, न मित्रका वचन सुनते हैं और न अरुन्धतीके तारेको
देख सकते हैं ॥ ७६ ॥
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्' ॥ ७७ ॥
पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी २ बातें करने वाले मित्रको,
मुखपर दूध वाले विषके घड़ेके समान छोड़ देना चाहिये' ॥ ७७ ॥
ततः काको दीर्घं निःश्वस्य ‘अरे वञ्चक ! किं त्वया पापकर्मणा
कृतम् ?
कौवेने लंबी सांस भर कर कहा कि-‘अरे ठग ! तुझ पापीने यह क्या किया ?
यतः,—
संलापितानां मधुरैर्वचोभि-
र्मिथ्योपचारैश्च वशीकृतानाम् ।
१ आकाशमें सप्त ऋषियोंके तारोंके पास एक बहुत छोटासा तारा है ।