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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

-५९ ] बिलावकी धर्मके बहानेसे आश्रययाचना ३३
यतः,-
जातिमात्रेण किं कश्चिद्धन्यते पूज्यते क्वचित् ? ।
व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् ॥ ५८ ॥
क्योंकि-केवल जातिसे क्या कभी कोई मारने अथवा सत्कार करने लायक
होता है ? परंतु व्यवहारको जान कर मारने अथवा पूजनेके योग्य होता है॥५८॥
गृध्रो ब्रूते—'ब्रूहि, किमर्थमागतोऽसि ?' । सोऽवदत्—'अहमत्र
गङ्गातीरे नित्यस्नायी निरामिषाशी ब्रह्मचारी चान्द्रायणव्रतमा-
चरंस्तिष्ठामि । 'यूयं धर्मज्ञानरता विश्वासभूमयः' इति पक्षिणः
सर्वे सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति । अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो
धर्मं श्रोतुमिहागतः । भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथिं
हन्तुमुद्यताः ।
गिद्ध बोला-'कह, किसलिये आया है ?' वह बोला-'मैं यहां पर गंगाजीके
किनारे नित्य स्नान करता हूं। मांसका भक्षण न करने वाला ब्रह्मचारी हूं और
चान्द्रायण व्रत करता हूं । 'तुम्हारी धर्म तथा ज्ञानमें प्रीति है और
विश्वासपात्र हो', इस प्रकार सब पक्षी सदा मेरे सामने तुम्हारी प्रशंसा किया
करते हैं। तुम विद्या और अवस्थामें बड़े हो, इसलिये आपसे धर्म सुननेके लिये
यहां आया हूं और आप ऐसे धर्मी हैं कि मुझ अतिथिको मारनेके लिये
तैयार हैं।
गृहस्थधर्मश्चैषः-
अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५९ ॥
परन्तु गृहस्थधर्म तो यह है कि-अपने घर पर वैरीभी आवे तो उसका
यथोचित आदर करना चाहिये, जैसे वृक्ष अपने (पास आये हुए) काटने वालेके
पास गई अपनी छायाको समेट नहीं लेता है ॥ ५९ ॥
यदि वा धनं नास्ति तदा प्रीतिवचसाप्यतिथिः पूज्य एव ।
जो धन न हो तो मीठे २ वचनोंसेही अतिथिका सत्कार करना चाहिये ।
१ त्रिकाल-स्नान कर सावधान और जितेन्द्री होकर कृष्णपक्षमें एक २ ग्रास कम
करे और शुक्लपक्षमें एक २ ग्रास बढावे इसीको मनुने 'चान्द्रायण-व्रत' कहा है.
हि० ३