हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५०-
इत्याकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन्नब्रवीत्—'साधु
मित्र ! साधु । अनेनाश्रितवात्सल्येन त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि
युज्यते' । एवमुक्त्वा तेन सर्वेषां बन्धनानि छिन्नानि । ततो हिर-
ण्यकः सर्वान्सादरं संपूज्याह—'सखे चित्रग्रीव ! सर्वथात्र जाल-
बन्धनविधौ दोषमाशङ्क्यात्मन्यवज्ञा न कर्तव्या ।
यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकायमान होकर बोला—'धन्य है,
मित्र ! धन्य है । इन आश्रितों पर दया विचारनेसे तो तुम तीनों लोककीही
प्रभुताके योग्य हो' । ऐसा कह कर उसने सबका बंधन काट डाला। पीछे हिरण्यक
सबका आदर-सत्कार कर बोला-'मित्र चित्रग्रीव ! इस जालबंधनके विषयमें
दोष की शंका कर अपनी अवज्ञा नहीं चाहिये ।
यतः,—
योऽधिकायोजनशतात्पश्यतीहामिषं खगः ।
स एव प्राप्तकालस्तु पाशबन्धं न पश्यति ॥ ५० ॥
क्योंकि—जो पक्षी सैकड़ों योजनसे भी अधिक दूरसे (छोटेसे) अन्नके दानेको
या मांसको देखता है वही बुरा समय आनेपर जालकी ( बडी ) गांठको नहीं
देखता है ॥ ५० ॥
अपरं च,—
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं
गजभुजंगमयोरपि बन्धनम् ।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां
विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ ५१ ॥
और दूसरे-चंद्रमा तथा सूर्यको ग्रहणकी पीड़ा, हाथी और सर्पका बंधन,
और पण्डितोंकी दरिद्रता, देख कर मेरी तो समझमें यह आता है कि
प्रारब्ध ही बलवान् है ॥ ५१ ॥
१ योजन=चार कोश याने ८ मील.