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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

-७१ ] सियारकी चालसे हरिणका बंधन ३७
जैसा यह मृग मेरा बन्धु ( दोस्त ) है वैसेही तुमभी हो' । मृग बोला-'इस
उत्तर-प्रत्युत्तरसे क्या है ? सब एक स्थानमें विश्वासकी बातचीत कर सुखसे रहो ।
यतः,—
न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा' ॥ ७१ ॥
क्योंकि-न तो कोई किसीका मित्र है, और न कोई किसीका शत्रु है ।
व्यवहारसे मित्र तथा शत्रु बन जाते हैं' ॥ ७१ ॥
काकेनोक्तम् -'एवमस्तु ।' अथ प्रातः सर्वे यथाभिमतदेशं गताः ।
कौवेने कहा-'ठीक है' । फिर प्रातःकाल सब अपने २ मनमाने देशको गये ॥
एकदा निभृतं शृगालो ब्रूते - 'सखे ! अस्मिन्वनेकदेशे सस्यपूर्ण-
क्षेत्रमस्ति । तदहं त्वां नीत्वा दर्शयामि ।' तथा कृते सति मृगः
प्रत्यहं तत्र गत्वा सस्यं खादति । अथ क्षेत्रपतिना तद्दृष्ट्वा पाशो
योजितः । अनन्तरं पुनरागतो मृगः पाशैर्बद्धोऽचिन्तयत्—'को
मामितः कालपाशादिव व्याधपाशान्त्रातुं मित्रादन्यः समर्थः ?'
अत्रान्तरे जम्बुकस्तत्रागत्योपस्थितोऽचिन्तयत्—'फलिता तावद-
स्माकं कपटप्रबन्धेन मनोरथसिद्धिः । एतस्योत्कृत्यमानस्य मांसा-
सृग्लिप्तान्यस्थीनि मयावश्यं प्राप्तव्यानि । तानि बाहुल्येन भोजनानि
भविष्यन्ति ।' मृगस्तं दृष्ट्वोल्लासितो ब्रूते—'सखे ! छिन्धि तावन्मम
बन्धनम्, सत्वरं त्रायस्व माम् ।
एक दिन एकांतमें सियारने कहा-'मित्र मृग ! इस वनमें एक दूसरे स्थानमें
अनाजसे भरा हुआ खेत है, सो चल तुझे दिखाऊं' । वैसा करने पर मृग वहां
जा कर नित्य अनाज खाता रहा । एक दिन उसे खेत वालेने देख कर
फंदा लगाया । इसके अनन्तर जब वहां मृग फिर चरनेको आया सोही जालमें
फँस गया और सोचने लगा-'मुझे इस कालकी फांसीके समान व्याधके फंदेसे
मित्रको छोड़ कौन बचा सकता है?' इस बीचमें शृगाल वहां आकर उपस्थित
हुआ, और सोचने लगा-'मेरे छलकी चाल (सफाई)से मेरा मनोरथ सिद्ध
हुआ और इस उधड़े हुएकी मांस और लोहू लगी हुई हड्डियां मुझे अवश्य
मिलेंगी और वे मनमानी खानेके लिये होंगी.' मृग उसे देख प्रसन्न होकर
बोला-'हे मित्र ! मेरा बन्धन काटो और मुझे शीघ्र बचाओ ।