हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ४२-
मेरा बन्धन पीछे काटना' । हिरण्यकने भी कहा-'मित्र ! मैं निर्बल हूं, और
मेरे दांतभी कोमल हैं, इसलिये इन सबका बंधन काटनेके लिये कैसे समर्थ हूं ?
इसलिये जब तक मेरे दांत नहीं टूटेंगे तब तक तुम्हारा फंदा काटता हूं । पीछे
इनकेभी बंधन जहां तक कट सकेंगे तब तक काटूंगा' । चित्रग्रीव बोला-'यह
ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो' । हिरण्यकने कहा-'अपनेको छोड़ कर
अपने आश्रितोंकी रक्षा करना यह नीति जानने वालों(पंडितों)को संमत नहीं है;
यतः,—
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ४२ ॥
क्योंकि—मनुष्यको आपत्तिके लिये धनकी, धन देकर स्त्रीकी, और धन तथा
स्त्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
अन्यच्च,—
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणाः संस्थितिहेतवः ।
तान्निघ्नता किं न हतं, रक्षता किं न रक्षितम् ?' ॥ ४३ ॥
और दूसरे—धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष इन चारोंकी रक्षाके लिये प्राण
कारण हैं, इसलिये जिसने इन प्राणोंका घात किया उसने क्या घात नहीं
किया ? अर्थात् सब कुछ घात किया, और जिसने प्राणोंका रक्षण किया उसने
क्या रक्षण न किया ? अर्थात् सबका रक्षण किया ॥ ४३ ॥
चित्रग्रीव उवाच-‘सखे ! नीतिस्तावदीदृश्येव । किं त्वहमस्सदा-
श्रितानां दुःखं सोढुं सर्वथाऽसमर्थः । तेनेदं ब्रवीमि ।
चित्रग्रीव बोला-‘मित्र ! नीति तो ऐसीही है परन्तु मैं अपने आश्रितोंका
दुःख सहनेको सब प्रकारसे असमर्थ हूं इस कारण यह कहता हूं.
यतः,—
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ ४४ ॥
क्योंकि—पण्डितको पराये उपकारके लिये अपना धन और प्राणोंकोभी छोड़
देना चाहिये, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये अच्छे पुरुषोंके लिये
प्राण त्यागना अच्छा है ॥ ४४ ॥