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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 302 में से

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पृष्ठ 41
  • २९ ] चित्रग्रीवका कबूतरोंको आश्वासन २१
    क्योंकि-अच्छे बड़े बड़े शास्त्रोंको पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहोंको दूर
    करने वाले (पंडित) भी लोभके वश हो कर दुःख भोगते हैं ॥ २६ ॥
    अन्यच्च,-
    लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
    लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥ २७ ॥
    और दूसरे-लोभसे क्रोध उत्पन्न होता है, लोभसे विषयभोगकी इच्छा होती है
    और लोभसे मोह और नाश होता है, इसलिये लोभी पापकी जड है ॥ २७ ॥
    अन्यच्च,-
    असंभवं हेममृगस्य जन्म
    तथापि रामो लुलुभे मृगाय ।
    प्रायः समापन्नविपत्तिकाले
    धियोऽपि पुंसां मलिना भवन्ति ॥ २८ ॥
    और देखो, सोनेके मृगका होना असंभव है, तो भी रामचन्द्रजी सोनेके
    मृगके पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषोंकी बुद्धियाँ भी
    बहुधा मलिन हो जाती हैं ! ॥ २८ ॥
    अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धा बभूवुः । ततो यस्य वचतात्तत्रावल-
    म्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्व्वन्ति ।
    इसके पीछे सबकेसब जालमें बँध गये । फिर जिसके वचनसे वहां उतरे थे
    उसका सब तिरस्कार करने लगे;
    यतः,-
    न गणस्याग्रतो गच्छेद्सिद्धे कार्ये समं फलम् ।
    यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते' ॥ २९ ॥
    जैसे कि कहा है-समूहके आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये, क्योंकि काम
    सिद्ध होनेसे फल सबको बराबर (प्राप्त) होता है, और जो काम बिगड़ जाय तो
    मुखियाही मारा जाता है' ॥ २९ ॥
    तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच - 'नायमस्य दोषः ।
    उसकी निन्दा सुन कर चित्रग्रीव बोला-'इसका कुछ दोष नहीं है;