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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 302 में से

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पृष्ठ 43

-३७] सब कबूतरोंका जालके साथ उडना २३
अन्यच्च,—
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ३४ ॥
और इस संसारमें अपना कल्याण चाहने वाले पुरुषको निद्रा, तन्द्रा, भय,
क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देने चाहिये ॥ ३४ ॥
इदानीमप्येवं क्रियताम् । सर्वैरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीय-
ताम् ।
अब भी ऐसा करो, सब एक मत होकर जालको लेकर उड़ो;
यतः,—
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ ३५ ॥
क्योंकि-छोटी छोटी वस्तुओंके समूहसे भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे
घासकी बटी हुई रस्सियोंसे मत वाले हाथी बाँधे जाते हैं ॥ ३५ ॥
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ३६ ॥
अपने कुलके थोड़े मनुष्योंका समूह भी कल्याणका करने वाला होता है, क्योंकि
तुस (छिलके) से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते हैं ॥ ३६ ॥
इति विचिन्त्य पक्षिणः सर्वे जालमादायोत्पतिताः । अनन्तरं स
व्याधः सुदूराज्जालापहारकांस्तानवलोक्य पश्चाद्धावन्नचिन्तयत्-
यह विचार कर सब कबूतर जालको लेकर उड़े । फिर वह बहेलिया, जालको
लेकर उड़ने वाले कबूतरोंको दूरसे देख कर पीछे दौड़ता हुआ सोचने लगा.
‘संहतास्तु हरन्त्येते मम जालं विहंगमाः ।
यदा तु निपतिष्यन्ति वशमेष्यन्ति मे तदा’ ॥ ३७ ॥
‘ये पक्षी मिल कर मेरे जालको लेकर उड़े जाते हैं, परन्तु जब ये गिरेंगे
तब मेरे वशमें हो जायेंगे’ ॥ ३७ ॥
ततस्तेषु चक्षुर्विषयातिक्रान्तेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः ।
फिर जब वे पक्षी आंखसे नहीं दीखने लगे तब व्याध लौट गया.