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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 302 में से

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पृष्ठ 56

३६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६९-
जिज्ञासा समारब्धा । तत्परिज्ञाय मार्जारः कोटरान्निःसृत्य बहिः
पलायितः । पश्चात्पक्षिभिरितस्ततो निरूपयद्भिस्तत्र तरुकोटरे शा-
वकास्थीनि प्राप्तानि । अनन्तरं त ऊचुः—“अनेनैव जरद्गवेनास्माकं
शावकाः खादिताः” इति सर्वैः पक्षिभिर्निश्चित्य गृध्रो व्यापा-
दितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“अज्ञातकुलशीलस्य-” इत्यादि’ ॥ इत्या-
कर्ण्य स जम्बुकः सकोपमाह—‘मृगस्य प्रथमदर्शनदिने भवान-
प्यज्ञातकुलशील एव, तत्कथं भवता सहैतस्य स्नेहानुवृत्तिरुत्त-
रोत्तरं वर्धते ?
और थोड़े दिन बीत जाने पर वह पक्षियोंके बच्चोंको पकड़ खोडरमें लाकर
नित्य खाने लगा । जिन पक्षियोंके बच्चे खाये गये थे वे शोकसे व्याकुल विलाप
करते हुए इधर उधर ढूंढ़ने लगे । बिलाव यह जान कर खोडरसे निकल कर
बाहर भाग गया । उसके पीछे इधर उधर ढूंढते हुए पक्षियोंने उस पेड़की खोह-
ड़में बच्चोंकी हड्डियां पाईं । फिर उन्होंने कहा कि—“इस जरद्गवने हमारे बच्चे खाये
हैं” । यह बात सब पक्षियोंने निश्चय करके उस बूढे गिद्धको मार डाला ।
इसीलिये मैं कहता हूं कि—“जिसका कुल और स्वभाव” इत्यादि’. यह सुन
वह सियार झुंझल कर बोला-‘मृगसे पहलेही मिलनेके दिन तुम्हाराभी तो कुल
और स्वभाव नहीं जाना गया था, फिर किस प्रकार तुम्हारे साथ इसकी गाढ़ी
मित्रता क्रम क्रमसे बढ़ती जाती है ?
यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीरपि ।
निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ॥ ६९ ॥
जहां पंडित नहीं होता है वहां थोड़े पढ़ेकीभी बड़ाई होती है । जैसे कि जिस
देशमें पेड़ नहीं होता है वहां अरण्डाका वृक्षही पेड़ गिना जाता है ॥ ६९ ॥
अन्यच्च,—
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ ७० ॥
और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियोंकी गिनती
( समझ ) है । उदारचरित वालोंको तो सब पृथ्‍वीही कुटुंब है ॥ ७० ॥
यथायं मृगो मम बन्धुस्तथा भवानपि’ । मृगोऽब्रवीत्—‘किमनेनो-
त्तरेण ? सर्वैरेकत्र विश्रम्भालापैः सुखिभिः स्थीयताम् ।