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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 302 में से

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पृष्ठ 55

-६८ ] बिलावकी चाटुता पर आश्रय दे देना ३५

छूकर कानोंको छुआ, और बोला-‘मैंने धर्मशास्त्र सुन कर और विषयवासनाको
छोड़ यह कठिन चान्द्रायण व्रत किया है । आपसमें धर्मशास्त्रोंका विरोध होने
परभी “हिंसा न करना यही परम धर्म है” इस मंतव्यमें सब एकमत हैं,—
यतः,—
सर्वहिंसानिवृत्ता ये नराः सर्वसहाश्च ये ।
सर्वस्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ६४ ॥
क्योंकि—जो मनुष्य सब प्रकारकी हिंसासे रहित हैं, सब( असह्य )को सहते
हैं और सबको सहारा देते हैं वे स्वर्गको जाते हैं ॥ ६४ ॥
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥ ६५ ॥
एक धर्मही मित्र है जो मरने परभी ( आत्माके ) साथ जाता है, अन्य सब
वस्तु शरीरके साथ ( यहां ) ही नाश हो जाती हैं ॥ ६५ ॥
योऽत्ति यस्य यदा मांसमुभयोः पश्यतान्तरम् ।
एकस्य क्षणिका प्रीतिरन्यः प्राणैर्विमुच्यते ॥ ६६ ॥
जो प्राणी जिस समय, जिस प्राणिका मांस खाता है उन दोनोंमें अन्तर
देखो—एकको तो केवल क्षणभरका संतोष होता है और दूसरा प्राणोंसे जाता
है ॥ ६६ ॥
मर्त्तव्यमिति यद्दुःखं पुरुषस्योपजायते ।
शक्यते नानुमानेन परेण परिवर्णितुम् ॥ ६७ ॥
“मुझे अवश्य मरना होगा” ऐसी चिन्तासे मनुष्यको जो ( प्रत्यक्ष ) दुःख
होता है वह दुःख ( केवल ) अनुमानसे दूसरा मनुष्य वर्णन नहीं कर सकता
है ॥ ६७ ॥
शृणु पुनः,—
स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते ।
अस्य दग्धोदरस्यार्थे कः कुर्यात्पातकं महत् ? ॥ ६८ ॥
फिर सुनो–जो पेट अपने आप उगी हुई साग-भाजीसे भी भरा जा सकता
है, उस जले पेटके लिये ऐसा बड़ा ( भयंकर ) पाप कौन करे ? ॥ ६८ ॥
एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः ।
इस प्रकार विश्वास पैदा कर वह बिलाव वृक्षके खोडरमें रहने लगा ।
ततो दिनेषु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं
खादति । येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातैर्विलपद्भिरितस्ततो