घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
१४ / घट रामायण
सुना समझा रिझ लिया नहीं तो वह बानी हाथ से निकल जाती। इस प्रकार के अनेक शब्द उनकी
शब्दावली में हैं।१
घट रामायण की उनके विषय में लिखी गई इस जीवन चर्चा से अधिक प्रामाणिक तथा विस्तृत
सामग्री नहीं मिलती, अतः सम्प्रति उनके विषय में यही एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है। डॉ० रामकुमार वर्मा ने
इन्हें 'आवापंथी' स्वीकार किया है किन्तु भेष एवं पंथ का सबसे अधिक विरोध इन्होंने ही किया है।
कृतियों का परिचय
उनकी तीन कृतियाँ अब तक सर्वथा प्रसिद्ध एवं उनके सृजन के साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हैं। ये
हैं, क्रमश- घट रामायण, शब्दावली एवं रत्न सागर। इन कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
(क) घट रामायण-'घट रामायण' का अर्थ है, घट में न केवल सम्पूर्ण सृष्टि का अन्तरण अपितु
सम्पूर्ण सिद्धान्तों तथा आध्यात्मिक चिन्तन की अर्न्तसाधना का समाहार। वे अपने इस मन्तव्य को अनेक
स्थलों पर कहते ही नहीं अपितु साधना के व्यावहारिक स्तर पर भी उतारते हैं।
लखि अलष अंडन खलक खंडा पलक पर घट घट कही।
यहाँ सम्पूर्ण सृष्टि इस अंड (पिंड) शरीर में निहित है और इस प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि की गाथा वे
अपनी अन्तश्चेतना में स्वीकार करके आगे चलते हैं। वे इसे स्पष्ट करते हुए पुनः कहते हैं कि -
तन मन ब्रहांड पसार अंड खंड नौखंड लगै।
सो घट लखन मझार करत सैल ब्रह्मांड की॥
×× ×× ×× ××
पिंड माँहि ब्रह्मांड देखा निज घर जोड़ कै।
गुरु पद पदम प्रकास निज अकास अम्बर चखी॥
इसी शरीर पिण्ड में पचासी पवन हैं, इसी में षट् चक्र, द्वादश नाल, हैं। दसवीं नाल में 'राम तथा
लक्ष्मण' निवास करते हैं।२ इस घट में त्रिवेणी है, यही प्रयाग है, गंगा, यमुना तथा सरस्वती है। इसी में
शून्य महल है, शब्द शिखर है, त्रिकुटी है, इसमें नौ कमल तक तीन गम्य लोक और चौथा अगम्य
लोक है-इसी में नव द्वार हैं। इस तत्त्व में प्रवेश योगी नहीं सन्त एवं साधु रहते हैं। पिण्ड के इस लोक
का 'सत्यलोक' है। सत्य लोक में उस पर अनाम तत्त्व है, जिसे विरले जानते हैं।
इस घट के 34 भेद और 34 विविध तत्त्वों के केन्द्र स्थल हैं। तुलसी साहब अन्त में के सन्दर्भ में
सम्पूर्ण लोक, अध्यात्म, पुराण, धर्मकथा एवं उनके विविध संदर्भों का समाहार करके कहते हैं-
घट में स्वर्ग एवं नरक हैं दोई। घट में जनम मरन पुनि होई॥
घट में कथा पुरान सुनावै। घट में काया करम करावै॥
घट में बैठे पाँचों नादा। घट में लागी सहज समाधा॥
घट में राजा हैं बलि बावन। घट में सीता रघुपति रावन॥
घट में सुकदेव व्यास अरु नारद। घट में ऋषी मुनी आरु सारद॥
जो सब घट कहि बरनि सुनाई। तौ जग कागज मिलै न स्याही॥
१. बेलविडियर प्रेस, से प्रकाशित घट रामायण की भूमिका से साभार।
२. देखें, घट रामायण, पृष्ठ 20, 10वीं
घट रामायण १५
इस घट के भीतर बहत्तर कोठे हैं जिसमें ब्रह्मा, विष्णुशंकर, वरुण, सुमेर आदि बैठे हैं। यही नहीं,
चौरासी सिद्ध, पच्चीस प्रकृति, नौ नाड़ियाँ, पाँच इन्द्रिय निवास एवं बाईस शून्य, वैराग की चार गतियाँ
आदि सब कुछ हैं।
इस घट में अन्तरण में स्थित विधि तत्त्वों को न योगी देखता है और न कर्मकांडी। लोक के
धर्मपंथी और भेष रचना द्वारा आध्यात्मिकता का प्रदर्शन करने वाले तो इसे जानते ही नहीं।
कवि इस अन्तश्चेतना के आध्यात्मिक बोध के साक्ष्य के लिए अपने युग के पूर्व एवं सामायिक
सन्दर्भों तथा धर्मगुरूओं को सामने रखकर न केवल उनके आध्यात्मिक विचारों का खंडन करता है
अपितु उन्हें घट साधना के भीतर की आध्यात्मिक अन्तराकृति से जोड़कर उन्हें प्रामाणिक बनाता है।
काशी के पंडितों में नैनू-सैनू, फकीर तकी शेख, कर्मा तथा धर्मा नामक जैन धर्मावलम्बी, कर्मचन्द्र
पालीवाल शावक जैनधर्मी, करिया और सैनी नारियाँ, श्यामा पंडित, रेवतीदास, हिरदै अहीर का पुत्र
गुनवाँ, फूलदास कबीर पंथी, प्रिमेलाल आदि-आदि विविध मतो एवं सम्प्रदायों के ज्ञानियो को जिस
अगम्य तत्त्व का मार्ग दिखाकर सन्तुष्ट किया वह घट रामायण मे ही सम्बद्ध है। इस अद्भुत घट
रामायण के महत्त्व का निरूपण करते हुए वे कहते हैं कि-
ये री घट माँहिं तो रामायन गाई, ग्रंथन बनाइ के।
पिंड-पिंड ब्रह्मांड दिखाया तुलसी लै लाइ के।
हम देखा पिंड ब्रहांडा, निरखा सत द्वीप नौखंडा।
अंडा तत पाँच बनाया काया धसिजाई के॥
xx xx xx
तुलसी तत तोल बताई पुनि कहि-कहि भाखि सुनाई।
घट रामायण बूझै सूकै तिहूँ लोक में॥
सन्त मत के अन्तर्गत अगम्य तत्त्व का उद्बोधन एवं उसकी प्राप्ति तथा साधनाओं द्वारा अन्तर्वृत्ति के
अन्तर्गत अन्वेषण और वाह्य आडम्बरों, पंथ, भेष, मूर्ति, धर्मग्रंथ, मन्दिर, तीर्थ आदि के स्थान पर इस
घट की अन्तःवृत्ति में ब्रह्म तत्त्व (अगम तत्त्व) की प्राप्ति ही घट रामायण का मूल मन्तव्य है।
यहाँ 'रामायण' शब्द का अर्थ 'राम का अयन' नहीं उस अगम्य का अयन-जिसे लोग राम के रूप
में जानते हैं-वह अगम्य तत्त्व हैं-वह दशरथ पुत्र नहीं है, उसका मर्म कुछ और है। उस अगम तत्त्व की
वार्ता ही घट रामायण का मूल मन्तव्य है।
गोस्वामी तुलसीदास और तुलसी साहब का ऐक्य
घट रामायण के रचनाकार तुलसी साहब अपने पूर्व जन्म का वृत्तान्त देते हुए स्वयं को
'तुलसीदास' बताते हैं और कहते हैं कि संवत् 1618 में मैंने सर्वप्रथम घट रामायण की रचना की थी
किन्तु काशी में पंडितों तथा जनसमुदाय के विरोध के कारण इसे छिपा दिया और लोगों को भ्रमित
करने के लिए संवत् १६३१ में मैंने रामचरित्र किया-
संवत् सोला सै इकतीसा। रामचरित कीन्ह पद ईसा॥
ईस कर्म औतारी भावा। कर्मभाव सब जगहिं सुनावा॥
जग में कगरा जाना भाई। रावन रामचरित्र बनाई॥
पंडित भेष जगत सब मझारी। रामायन सुनि भये सुखारी॥
अंधा अंधे विधि समझावा। घट रामायन गुप्त करावा॥
१६ / घट रामायण
'घट रामायण' की रचना, जैसा कि उन्होंने बताया है-संवत् १६१८ में की थी और पुनर्जन्म के बाद
उन्होंने उसे भी प्रगट किया। प्रगट भी नहीं किया, यह सन्तों के हाथ लग गई थी और उन्होंने इसे लोक
के सामने रखा-
घट रामायन सार जग विरोध गुप्तै करी।
लगी संत के हाथ बूझि भेद सारा लिया॥
इस कथा का सार इतना ही है कि 'घट रामायण' और 'तुलसी रामायण' की यदि तुलना की जाए
तो दोनों में 'घट रामायण' श्रीरामचरित मानस से अधिक श्रेष्ठ है। वह तो लोकांध जन समुदाय को
अंधी विधि से समझाने की एक कथा मात्र है किन्तु यह घट रामायण उससे भिन्न इस प्रकार है-
घट रामायन अगम पसारा। पिंड ब्रह्मांड लखा विधि सारा॥
नाम अनेक अनेकन कहिया। सो सब घट भीतर दरसइया॥
अगम निगम औ अकथ कहानी। तुलसी भाखी अगम निसानी॥
घट रामायन ग्रंथ बनाई। साखी सब्द अगम विधि गाई॥
(२) तुलसी शब्दावली१-'तुलसी साहब के इस ग्रंथ का नाम तुलसी 'शब्दावली' है-'सब्द' या
सबद निर्गुण पंथ का एक पारिभाषिक शब्द है। परम्परा में सन्तों एवं सत्गुरुओं द्वारा आध्यात्मिक
अनुभव एवं साधना के सन्दर्भ में जिन सत्यों का साक्षात्कार हुआ उनका कथन ही 'सब्द' है। ज्ञानदेव,
नामदेव, नानकदेव, कबीरदास, दादूदयाल आदि के 'सब्द' इसी संदर्भ के है। ये उनके आध्यात्मिक
अनुभव के 'शब्द' हैं और सबद के रूप में उनके साहित्य के अन्तर्गत संकलित है। तुलसी साहब की
'शब्दावली' का भी यही अर्थ है। ये उनके आध्यात्मिक अनुभव से सम्बन्ध विविध अनुभवों के संकलन
या उनके अपने निजी अनुभव के प्रमाण हैं। ये सबद अनेक छंदों तथा अनेक रागों में सन्तों की साधना
से जुड़े उनके विविध आध्यात्मिक पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विविध साहित्यिक छंदों यथा-दोहा,
सवैया, कुण्डलिया आदि, विविध काव्यकथा रूढ़ियों यथा ककहरा, बारहमासा, संवाद, मंगल एवं
विविध राग रागिनियों यथा-टप्पा, कलंग, धमार, तिल्लाना, ठुमरी, प्रभाती आदि-आदि रागों में गाई गई
हैं।
'शब्दावली' के मुख्य विषय निर्गुण मतवाद से सम्बद्ध है। विविध आडम्बरों का विरोध सर्वत्र
दृष्टिगत है। विविध प्रकार के कर्मों के आडम्बर के बीच फँसे हुए मानव समाज को सहज, नैतिक एवं
आडम्बर विहीन मार्ग दर्शन हो इस कृति का यही मुख्य लक्ष्य है।
शब्दावली का सबसे प्रिय विषय है-आध्यात्मिक रहस्यवाद और कबीर आदि की परम्परा में तुलसी
साहब भी उस अगम्य प्रियतम के लिए आत्मा की पीड़ा भरी वेदना को निरन्तर व्यक्त करते हुए केवल
मिलने की कामना ही नहीं करते उसके तादत्म्य से मिले सुख का अपने विशिष्ट अनुभव के साथ व्यक्त
करते हैं-
सतगुरु विरहिन बात कलेजे रोवै और चिल्लाइ।
हाय हाय हिये में निसि वासर हरदम पीर पिराइ॥
मैं दुखिया हौं दर्द दिवानी प्रीतम दस लखाई।
तुलसी प्यास बुझै प्यारे से चढ़ कर अधर समाई॥
किरपावंत संत समझावै और न लगै उपाई॥
१. प्रकाशित तुलसी साहब की शब्दावली भाग एक तथा दो बेलविडियर प्रिंटिंग वर्क्स, इलाहाबाद।
घट रामायण १७
सन्त साहित्य की समग्र अवधारणाएँ इस शब्दावली को सारतत्त्व के रूप में संकलित किया
गया है।
रत्नसागर-तुलसी साहब की तीसरी कृति 'रत्नसागर' है। यह रत्नसागर सम्भवतया उनकी
प्रारम्भिक कृति है। १ इस 'रत्न सागर' का मूल मन्तव्य मानव जाति के उद्धार से सम्बद्ध है। वे मानव
जाति के उद्धार के विविध सन्दर्भों को अनेक शैलियों में रखते हैं जिनमें उनकी कथा शैली बड़ी ही
रोचक है। इस सृष्टि रचना के बीच जीव का जन्म किन कारणों से होता है और किन कारणों से वह
लोक में बंधा हुआ चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है। जीवन के भटकाव का मुख्य कारण
उसकी कर्म संसक्ति एवं उनसे उत्पन्न संशक्तियाँ हैं। वे अपने प्रिय शिष्य हिरदै के विविध प्रश्नों का उत्तर
देते हुए इस जीवन के बन्धन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हैं-
करनी करै भोगफल भाई। जोनी घर फल को भुगताई ॥
यह रहनी की बात बिचारा। यामे नहीं होय निरधारा ॥
करनी करै कर्म की बाजी। इनद्री सुख भोजन में राजी ॥
यही कर्म एवं इन्द्री सुख ही संसक्ति एवं बार-बार जन्म धारण का कारण हैं। सन्तों का कर्त्तव्य है,
मनुष्य को समझाकर, साधना की ओर उन्मुख करके तथा सत्संगति के सम्पर्क में प्रेरित करके जन्म-
मृत्यु के बन्धनों से मुक्त करना और अपने शिष्य हिरदै के विविध प्रश्नों के उत्तर द्वारा अपने सिद्धान्तों
का तुलसी साहब ने यहाँ विवेचन किया है। इन्होंने विश्वामित्र-वसिष्ठ, नारद कथा तथा अन्य लौकिक
कथा प्रसंगों द्वारा परमार्थ सत्य का बड़ा ही सटीक एवं सही विश्लेषण किया है। शान्ति, दया, उदारता,
क्षमा, धैर्य, सन्तोष, अहिंसा, विनम्रता एवं साधुता, अहंकारहीनता जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना
करके उनका अनुपालन समाज के लिए आवश्यक बताया है। छुआछूत तथा भेदभाव के समूह विनाश
के सम्बन्ध में इन्होंने जो उक्तियाँ स्थल-स्थल पर कहीं हैं-निश्चित ही आज के सन्दर्भ में उनका विशेष
महत्त्व है। हिरदै तथा स्वयं के बीच संवाद के रूप में लिखी गई यह कृति निश्चित ही मानव मूल्यों की
दृष्टि से आज भी प्रासंगिक है।
सन्त तुलसी साहब का मूल्यांकन
सन्त तुलसी साहब की सबसे बड़ी देन है, सम्पूर्ण मानव समुदाय के लिए-आध्यात्मिक
अन्धानुकरण का पूर्णतः तिरस्कार ॥ वे अध्यात्म के मूल तत्त्व को सन्त साधना से जोड़ते हैं, और
सन्त साधना का वे अर्थ बताते हैं-वाह्याडम्बर शून्य, परम्परा से मुक्त तथा तर्कमंडित धर्मानुशासन।
इसीलिए वे अपने युग के जैन, शिया, सुन्नी, वेदान्त, कर्मकांड, अंधपरम्परावाद के अन्तर्गत मूर्तिपूजन,
विविध धार्मिक उत्सवों एवं कार्यों के आडम्बर आदि के विरोध में खड़े होते हैं। वे स्वयं निर्गुण संत के
समर्थक हैं किन्तु निर्गुण साधक कबीर एवं नानकदेव की धार्मिक तथा व्यावहारिक मान्यताओं में
व्याप्त रूढ़ियों का विरोध करते हैं। वे गुरु नानक देव के सरोवर एवं कबीरदास की चौका साधना की
अपने ढंग से व्याख्या करके उसे वैज्ञानिक एवं तर्क संगत आधार देते हैं। उनका मूल सिद्धान्त है,
परम्परा, पुराणवादिता, लोक प्रचलन, वेदवाद से हटकर उनसे भिन्न तर्क सम्मत साधना का मार्ग
निर्मित करना ही मानव जाति का लक्ष्य है जो समाज के लिए सहज रूप से बोधगम्य हो सके।
पिंड में ब्रह्मांड का स्थिरीकरण-उनका सिद्धान्त इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सम्पूर्ण
आध्यात्मिक चेतना के केन्द्र बिन्दु में स्वयं को रखो, बाहर के संसार का अनुभव और ब्रह्मादि के संदर्भ
केवल वाह्यानुभूति के हैं, आत्मानुभूति के नहीं। अतः आत्मानुभूति के मूलाधार अपने मन, बुद्धि, मति,
विवेक, बोध तथा चैतन्य के द्वारा स्वयं में ही उस परम तत्त्व को जानने की चेष्टा करो जो मन्दिरों में है,
१. बेलविडियर प्रिंटिंग वर्क्स, इलाहाबाद से प्रकाशित।
१८ / घट रामायण
वेदों एवं किताबों में हैं, कर्मकांड एवं पंथ-भेष से जुड़ा है। आत्म चैतन्य एवं स्वतत्त्व का इस
चैतन्य में अंकुरण करके उसी में स्व विलयन उनकी साधना का परम लक्ष्य है।
उनकी तीसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता लोक समुदाय से स्वयं को जोड़ने की है। उनके शिष्य
सम्पूर्ण जातियों के व्यक्ति हैं। वे उनकी भाषा, उनके साक्ष्य, उनकी शैली, उनकी लोकरीतियाँ आदि का
इसलिए अपनी कविता में प्रयोग करते हैं ताकि सहज ही बिना किसी औपचारिकता के साथ वे उनसे
जुड़ सकें।
उनकी साधना एवं भक्ति का चौथा तत्त्व है, समग्र मानवीय मूल्यों की सामाजिक ग्राह्यता।
जैसा कि कहा गया है-वे जाति पाँति एवं स्त्री-पुरुष तथा पिता-पुत्र का भेद आध्यात्मिक साधना में नहीं
मानते हैं। वे हिरदै अहीर और उसके पुत्र गुनुवाँ को एक साथ धर्ममार्ग की दीक्षा देते हैं। वे महन्त
फूलदास एवं उनके शिष्य सुरतिदास को भी साथ-साथ ज्ञानमार्ग पर ले चलते हैं। हिंसा के वे प्रबल
विरोधी तथा पंथ, भेष कर्मकांड के पूर्णतः निंदक थे। वे आडम्बरपूर्ण धर्म, धर्मकथाओं की संसक्ति
का निरन्तर विरोध करते हुए तर्कसम्मत धर्म साधना में प्रवृत्त होने के लिए सम्पूर्ण समाज को प्रेरित
करते हैं। प्रेम, मैत्री, करुणा, विनम्रता, अहं भाव का त्याग उनकी साधना की मूल प्रवृत्ति थी। वे मानव
जाति को मानवीयता के बन्धन में बाँधकर उनको एक साथ रहने एवं रखने के पक्षपाती थे। वे पंथों के
रूप में विख्यात नहीं रहे हैं। सम्भव है, उनके देहावसान के बाद उनके मत को 'आवा पंथ' के नाम से
अभिहित किया गया हो।
निष्कर्ष रूप से, कहा जा सकता है कि वे मानवीय विवेक तथा समय को धर्मसाधना के आधार
के रूप में प्रेरित करते हुए समाज को रूढ़िवादिता से मुक्त करके धर्मभाव में प्रवृत्त करने के प्रति
आजीवन कृत संकल्प रहे हैं।
घट रामायण
भेद – पिंड और ब्रह्मांड का
॥ सोरठा ॥
स्रुति बुँद सिंध मिलाप, आप अधर चढ़ि चाखिया।
भाखा भोर भियान, भेद भान गुरु स्रुति लखा॥
अर्थ—सुरति बोध के अनुभव बिन्दु और परम तत्त्व के सिन्धु के सम्मिलन का आनन्द अन्तरात्मा
(अधर) में प्रवेश करके चखा और मूल तत्त्व के रहस्य (ज्ञान) का अनुभव गुरु रूपी सुरति से प्राप्त
करके दूसरे दिन प्रातः जगने पर (समाधि टूटने पर) उसका वर्णन प्रारम्भ किया॥
॥ छन्द स्रुति सिंध ॥
सत सुरति समझि सिहार साधौ। निरखि नित नैनन रहौ॥
धुनि धधक धीर गंभीर मुरली। परम मन मारग गहौ॥ १॥
सम सील लील अपील पेलै। खेल खुलि खुलि लखि परै॥
नित नेम प्रेम पियार पिउ कर। सुरति सजि पल पल भरै॥
धरि गगन डोरि अपोर१ परखै। पकरि पट पिउ पिउ करै॥ २॥
सर साधि सुन्न सुधारि जानौ। ध्यान धरि जब थिर थुवा२॥
जहँ रूप रेख न भेष काया। मन न माया तन जुवा॥ ३॥
अलि अंत मूल अतूल कँवला। फूल फिरि फिरि धरि धसै॥
तुलसि तार निहार३ सुरति। सैल सत मत मन बसै॥ ४॥
अर्थ—यद्यपि मैं उसे निरन्तर आँखों से देखता हूँ फिर भी, सुरति ध्यान के तत्त्व (सत्य तत्त्व) को
समझकर दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति को मैंने साधा है। अनाहत नाद की दशा में सहज गंभीर वंशीनाद
की ध्वनि की उत्तेजना (धधक) से मेरे मन ने उस रहस्यमय मार्ग का अनुगमन किया॥ १॥
शीलयुक्त समत्वभाव में वह विलक्षण भाव (अपेल पेलौ युक्त लीला (खेल) खुलकर दिखाई
पड़ने लगा। नित्य प्रति नियमपूर्वक प्रियतम (निर्गुण ब्रह्म) का प्यार सुरति रूपी सेज पर पल-पल
संचरित है। शून्याकाश से लगी हुई साधना की गाँठरहित (अपोर) प्रेम डोरी को परखते हुए निर्गुण ब्रह्म
रूपी पति के वस्त्रों को थाम्हें आत्मा रूपी प्रेमिका रात-दिन-' पिउ (प्रियतम) पिउ' करती रहती
है॥ २॥
१. जोड़ या गाँठ के।
२. हुआ।
३. मुन्शी देवीप्रसाद जी की पुस्तक में "तार" के आगे "पार" का शब्द भी है।
२० / घट रामायण
आत्मसंधान को शून्याकाश में भलीभाँति नियंत्रित करके ध्यान धारणा के बाद जब मन स्थिर हुआ
(जुवा) तब देखा कि उस शीर्ष बिन्दु पर न कोई रूप है, न लक्षण (रेख) हैं, न कोई भेष रचना है, न
कोई शरीर है, न मन है, न माया है, न युवा शरीर है ॥ ३ ॥
उस सहस्रार कमल के मूल के अन्त में एक भ्रमर है जो पुष्प को आधार बनाकर बार-बार उसी में
प्रवेश करना चाहता है। तुलसी साहब कहते हैं कि उस सुरति के सम्बद्ध सूत्र को देखकर सैकड़ों पर्वत
शिखरों से श्रेष्ठ (इस साधना के केन्द्र में) साधना में मेरा मन निवास करता है ॥ ४ ॥
॥ छन्द २ ॥
हिये नैन सैन सुचैन सुन्दरि। साजि स्रुत पिउ पै चली॥
गिर गवन गोह गुहारि मारग। चढ़त गढ़ गगना गली॥ १॥
जहँ ताल तट पट पार प्रीतम। परसि पद आगे अली॥
घट घोर सोर सिहार सुनि के। सिंध सलिता जस मिली॥ २॥
जब ठाट घाट बैराट कीन्हा। मीन जल कँवला कली॥
अली अंस सिंध सिहार अपना। खलक लखि सपना छली॥ ३॥
अस सार पार सम्हारि सूरति। समझि जग जुगजुग अली॥
गुरु ज्ञान ध्यान प्रमान पद बिन। भटकि तुलसी भौ मिली॥ ४॥
अर्थ- अपने हृदय के नेत्रों को, नेत्र भंगिमाओं को अत्यन्त आनन्दपूर्ण करके अर्थात् सुधार कर
सुरति से सजी हुई अपने उस पति से मिलन के लिए पुकारती हुई में चली और अत्यन्त सहजतापूर्वक
पर्वतों (साधना केन्द्रों), की गुफाओं (गौह) समाधि चित्त की विविध अवस्थाओं और मार्गों को
सकलती हुई शून्य गगन के पर्वत शिखर पर चढ़ती है ॥ १ ॥
उस शून्य गगन में स्थित सरोवर के उस पार प्रियतम (ब्रह्म) के पुनः चरण स्पर्श करके सखी
आगे बढ़ी। जहाँ घनघोर घटाओं की ध्वनि (अनाहत नाद) के शोर को सुनकर विराट सृष्टि यह आत्मा
रूपी प्रेमिका उस ब्रह्म से ऐसे मिली-जैसे समुद्र से सरिता (नदी) ॥ २ ॥
उस ब्रह्म सिन्धु के रूपरंग, घाट, वैराट (विशाल) को देखा तो उसमें उस आत्मा को जल की
मछली जैसी या कमल की कली जैसा अपने में अनुभव किया। उसे समस्त संसार, छलमयी स्वप्न की
भाँति दिखने लगा और उस सिंध का । (अपना अशिन् एवं स्वयं को उसका) अंश रूप माना ॥ ३॥
इस संसार के उस पार स्थित ब्रह्म ज्ञान के समुद्र को समझ कर युगों-युगों तक उसका ख्याल
रखो। यही नहीं, सद्गुरु के द्वारा दिखाए गए ज्ञान और ध्यान के प्रमाण के बिना यह आत्मा रूपी युवती
भटक कर पुनः भवसागर में मिल जाती है ॥ ४ ॥
॥ छन्द ३ ॥
अलि अधर धार निहारि निज कै। निकरि सिखर चढ़ावही॥
जहँ गगन गंगा सुरति जमुना। जतन धार बहावही॥ १॥
जहँ पदम प्रेम प्रयाग सुरसरि। धुर गुरू गति गावही॥
जहँ संत आस बिलास बेनी। बिमल अजब अन्हावही॥ २॥
कृत कुमति काग सुभाग कलिमल। कर्म धोइ बहावही॥
हिये हेरि हरष निहारि घर कौ। पार हंस कहावही॥ ३॥
घट रामायण / २१
मिलि तूल मूल अतूल स्वामी। धाम अबिचल बसि रही॥
अलि आदि अंत बिचारिपद कौ। तुलसि तब पिव की भई॥४॥
अर्थ-यह आत्मा रूपी सखी अपने को नीचे की धारा में देखकर ऊपर (सहस्रार पर) चलने के
लिए तत्पर रहती है। वह ऐसा शिखर (सहस्रार) है जहाँ गंगा (इड़ा) तथा यमुना (पिंगला) बड़े यत्न
पूर्वक अपनी धाराएँ बहाकर शून्याकाश में मिलन करती हैं॥१॥
वह सहस्रार बिन्दु से सम्बद्ध संसक्ति ही प्रयाग की गंगाधारा हैं और वहाँ उस ब्रह्म के आदि गुरु
गायन करते रहते हैं। जिस इंड़ा-पिंगला के संगम पर आत्मा अपने को चमत्कारपूर्ण ढंग से निर्मल स्नान
कराता रहता है॥२॥
बड़े भाग्य से यहाँ कलिमल रूपी काग के सदृश व्यक्ति अपने कर्मों के पापों को धोकर बहा देते
हैं और वे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हृदय से स्वयं को देखकर आध्यात्मिक जगत (उस पार) के हंस कहे
जाते हैं॥३॥
उनके पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत (तूल-तुलनीय) धर्म है-उस अतुल्य ब्रह्म से मिलाकर उस
अविचल (निर्गुण-ब्रह्म) धाम में निवास करते हैं। हे सखी! इस ज्ञान को (पद) आदि-अन्त तक विचार
करके मैं (तुलसी साहब) तत् पश्चात् उस परमात्मा (पिव) रूपी पति की होकर रह रही हूँ॥४॥
॥छन्द ४॥
अलि पार पलँग बिछाइ पल पल। ललक पिउ सुख पावही॥
खुस खेल मेल मिलाप पिउ कर। पकरि कंठ लगावही॥१॥
रस रीति जीति जनाइ आसिक। इस्क रस बस लै रही॥
पति पुरुष सेज सँवार सजनी। अजब अलि सुख का कहो॥२॥
मुख बैन कहनि न सैन आवै। चैन चौंज चिन्हावही॥
अलि संत अन्त अनन्त जानै। बूझि समझ सुनावही॥३॥
जनि चीन्हि तन मन सुरति साधी। भवन भीतर लखि लई॥
जिन गाइ सब्द सुनाइ साखी। भेद भाषा भिनि भई॥४॥
अलि अलष अंडन खलक खडा। पलक पट घट घट कही॥
(तुलसी) तोलबोल अबोल बानी। बूझि लखि बिरले लई॥५॥
अर्थ-हे सखि! मैं उस पार अपनी सेज (पलंग) बिछाकर बलवती आकांक्षा (ललक) करती हुई
(पति के मिलन का) आनन्द प्राप्त कर रही हूँ। मैं आनन्दपूर्वक पति (ब्रह्म) से क्रीड़ा, आलिंगन
(मेल-मिलाप) करती हुई पकड़कर उन्हें गले लगा लेती हूँ॥१॥
अपने को उनकी प्रेमिका प्रकट करके रस की प्रेममयी कला में उन्हें जीत लेती हूँ और उन्हें पूरी
तरह से अपने प्रेम के वश में भी कर रखा है। हे सखी! उस ब्रह्म रूपी पति (पुरुष) की सजाई हुई
शय्या पर मैं अद्भुत आनन्द प्राप्त करती हूँ। उस आनन्द का मैं कैसे वर्णन करूँ?॥२॥
उस आनन्द का वर्णन न मुख, न वाणी से, न इशारे से कर सकती हूँ। शान्ति की दशा में उसका
स्वरूप केवल चित्त समझता है। हे सखी! उस अनन्त आनन्द का अन्तिम रूप केवल सन्त जानता है और
वह उसका अनुभव करके, उसको समझकर दूसरे को सुनाता है॥३॥
जिन्होंने उस ब्रह्म को पहचान कर तन-मन को एक करके उनकी सुरति साधना साध ली है उसने
उसे अपने भीतर-भीतर देख लिया है। जिन्होंने उसे सबद (शब्द) और साखी के रूप में इसे सुनाकर
गाया है उनमें भाषा भेद के कारण वह भिन्न-भिन्न जैसा लगने लगा॥४॥
२२ / घट रामायण
हे सखि! वह ब्रह्मांड (अंडन), सृष्टि (खलक) के बीच अलक्ष्य रूप में वह पलकों के पटों तथा
घट-घट में खड़ा है। तुलसी साहब कहते हैं कि वह तुलनीय एवं अकथ्य वाणी से (पृथक्) है और
बिरले ही उसे देखते और समझते तथा प्राप्त करते हैं॥ ५॥
॥ छन्द ५ ॥
अलि देख लेख लखाव मधुकर। भरम भौ भटकत रही॥
दिन तीनि तन सँग साथ जानौ। अंत आनंद फिरि नहीं ॥ १ ॥
जग नहिन सार असार सखिरी। भ्रमत बिधि बस भौ महीं॥
धन धाम काम न कनक काया। मुलक माया लै बही ॥ २ ॥
येहि समझि बूझि बिचारिमन में। निरखि तन सपना सही॥
जम जाल जबर कराल सजनी। काल कुल करतब लई ॥ ३ ॥
सब तिरथ बरत अचार अलि से। कर्म बस बन्धन भई ॥
तुलसि तरक बिचारि तन मन। संत सतगुरु अस कही ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! उसके रूप लेख, उसके लक्षण, रूप सौन्दर्य तथा आकर्षण को देखकर भ्रमर
भ्रमित होकर भटकता रहा। वह इस शरीर के साथ उसमें लिप्त होकर कुछ ही दिनों तक (दिन तीनि-
मृत्यु तक) साथ रहा और उसके बाद उसको वह आनन्द उसे पुनः नहीं मिला॥ १॥
हे सखी! इस असार संसार में कोई सार तत्त्व नहीं है और प्राणी भ्रमवश दैवाधीन होकर भ्रमित
होता रहता है। वह माया रूपी नदी धन, धाम (गृह), कामनाओं, स्वर्णिम शरीर तथा सारे देश की माया
लेकर बह जाती है॥ २॥
मन में इस बात को समझ, बूझ तथा विचार करके देखो कि यह सब सही-सही स्वप्न है। हे
सजनी! यम का फन्दा बड़ा ही मजबूत तथा कठोर है और वह व्यक्ति के काल, कुल एवं कर्म-कौशल
(करतब) को नष्ट कर देता है॥ ३॥
हे सखी! समस्त तीर्थ, व्रत, धर्माचरण ये कर्मवश होकर व्यक्ति के लिए बन्धन बन जाते हैं।
तुलसी साहब निष्कर्ष निकालते हुए कहते हैं कि तन मन से तर्पण करते हुए मेरे इस कथ्य पर विचार
करो कि किसी सद्गुरु संत ने इस प्रकार बताया है॥ ४॥
॥ छन्द ६ ॥
सखि समझि सूर सहूर सुनि कै। बदन बिच सुधि बुधि गई॥
करूँ कवन भवन उपाव बिन बस। नेक मधुकर बस नहीं ॥ १॥
मिलि पाँच तीनि पचीस निसदिन। गाँठि गुन बन्धन भई ॥
भइ बिबस बस नहिँ दाँव लागै। दृढ़ निमख१ नहिँ आवही॥ २॥
धरि हाथ पटकि पुकारि पिव सँग। हारि जिव सँग हटि रही॥
कहुँ ठौर मोर न जोर चालै। आली बिपति कुछ का कही ॥ ३॥
सुनि ज्ञान ध्यान न कान मानै। बिकल तन मन बिचलई ॥
तुलसी बिरह बेहाल१ हिये में। मौत दिन देवै दई ॥ ४॥
१. लाड़-प्यार
घट रामायण / २३
अर्थ-सखी अपने सूरमा मन की इस नासमझी को सुनकर शरीर के बीच सुधि-बुद्धि रहित होकर
रह गई। यह चित्त रूपी मधुकर लेशमात्र भी वश में नहीं आ रहा है, इसके लिए कौन-सा उपाय गढ़कर
बनाऊँ ॥ १॥
नित्य प्रतिदिन पाँचों इन्द्रियाँ, तीनों ज्ञानवृत्तियाँ एवं पचीसों लोकात्मकगुण वृत्तियों भौतिक गुणों की
गठरी के रूप में मानव जाति के लिए बन्धन बन गई हैं। उनके वश में होकर मानव चेतना विवश हो
उठी है, उसका मुक्ति के लिए कोई दाँव नहीं लगता और एक क्षण भी (निमिख) दृढ़ता का भाव नहीं
आने पाता ॥ २॥
घर में हाथ पटक कर प्रियतम (निर्गुण ब्रह्म) को साथ-साथ पुकारती हुई हार मानकर जीव से दूर
हटकर रहने लगी। किसी स्थान पर भी मेरा वश नही चल पा रहा है। हे सखी! मैं अपनी विपत्ति को
क्या कहूँ ॥ ३॥
मेरे ज्ञान की बात सुनकर ध्यान (समाधि चित्त) विश्वास (कान) नहीं मानता और शरीर तथा मन
दोनों विचलित हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं अपने प्रियतम (निरंकार ब्रह्म) के लिए हृदय से
व्याकुल हो उठी हूँ-हे दैव! किसी दिन (शीघ्र) ही मुझे मृत्यु दे दो ॥ ४ ॥
॥ छन्द ७॥
सखि सीख सुनि गुनि गांठि बाँधै। ठाट ठट सतसँग करै ॥
जब रंग संग अपंग अलि री। अंग सत मत मन मरै ॥ १॥
मन मीन दिल जब दीन देखै। चीन्ह मधुकर सिर धरै ॥
अलि डगर मिलि जब सुरति सरजू। कँवल दल चल पद परै ॥ २॥
थिर थोव ठुमकि टिकाव नैना। नीर थिर जिमि थम थिर ॥
यहि भाँति साथ सुधारि मन कौ। पलक गिरि गगना भरै ॥ ३॥
लखि द्वार दृढ़ दरबार दरसै। परसि पुनि पद पिउ घरै ॥
गुरु गैल मेल मिलाप तुलसी। मन्त्र विषधर बसि करै ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! मेरी शिक्षा सुनो, मनन करो (गुनो) और गाँठ बाँध लो और अब तू दृढ़ चित्त से
सत्संग करो। हे सखी! जब उस निर्गुण का रंग तथा संग चित्त को प्राप्त होगा तो मन में स्थित नाना
प्रकार के विचार समाप्त हो उठेंगे ॥ १ ॥
मन-सरोवर का मत्स्य जब हृदय को दुखी देखेगा वह मधुकर को पहचान कर अपने शीश पर
धारण करेगा। हे सखि! जब सुरति रूपी सरयू नदी रास्ते में मिलेगी तब हे कमल दल! तू चलकर
उसी में जलस्थ हो जाएगा ॥ २ ॥
उस समाधि वृत्ति में स्थिर करके चित्त के नेत्रों को रोक करके (ठुमकि) ठहराओ। इस प्रकार,
मन को सुधार कर दोनों पलकों के बीच में स्थित ध्यान गिरि में उसे केन्द्रित करो ॥ ३ ॥
द्वार दृढ़ होने पर उस निर्गुण ब्रह्म का दरबार दिखाई पड़ेगा और पुनः पति के भवन का इस प्रकार
स्पर्श करो। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु के रास्ते पर सत्संगति द्वारा चलकर माया रूपी सर्प को उस
महामंत्र द्वारा वश में कर लो ॥ ४ ॥
॥ छन्द ८ ॥
सखि भेद भाव लखाव लै गुरु । मरम केहि मारग मिलै ॥
जेहि जतन पतन पियास पलपल । पकरि मन केहि बिधि चलै ॥ १ ॥
गुन गोह गति मति गजब गैला। सिखरि साधन करम फलै ॥
२४ / घट रामायण
सखि सुरति मंज समान संजम। मैल मन संग दुख खलै ॥ २ ॥
सुनि सुलभ लखन लखाव सजनी। दुलभ दृढ़ कलिमल दलै ॥
मोहिं दीन लीन जो चीन्ह चेरी। तपन बिच तन मन जलै ॥ ३ ॥
सखि चरन सरन निवास निसदिन। दुख दवा मोहिं अब मिलै ॥
गुरु सरन मन्त्र मिलाप तुलसी। जबर सँग जुलमी टलै ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! गुरु को साथ लेकर उसमें भाव एवं लोक के प्रति भेदभाव दर्शित करो-मालुम
नहीं, उनके साहचर्य से आध्यात्मिक रहस्य किस मार्ग में मिल जाएं। जिस यन्त्र से लोक वासनाओं के
प्यास का पतन हो पल पल उसके विषय में सोचो और यह भी स्मरण करो कि गुरु को अन्तिम रूप से
स्वीकार करके मन किस प्रकार साधना लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता जाए ॥ १ ॥
गुणों की कन्दरा के प्रवेश करने पर मन की आश्चर्यजनक गति दिखाई पड़ती है और सहस्रार तक
अन्य साधन कैसे रह सकते हैं। हे सखि! सुरति में निमज्जित (मंज) और वैसा ही संयम आवश्यक है।
मैले यंत्र के साथ निश्चित ही चित्त यहाँ दुखी रहता है ॥ २ ॥
हे सजनी! उन सर्व सुलभ लक्षणों (लखन) को दिखावो जो दृढ़तापूर्वक दुर्लभ कलिमल का दलन
कर दे। गुरु इस दीन को दासी के रूप में पहचान लिया है और अब ईश्वर के विरह में मेरे तन मन दोनों
जल रहे हैं ॥
हे सखी! मेरा निवास तो अब गुरुचरणों में हो रहा है और इसीलिए दुःख रूपी दावाग्नि मिलती
हैं, किन्तु समीप नहीं आते। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु द्वारा मिले मंत्र से मेरा तादात्म्य हो उठा है-
अतः शक्तिमान का साथ है और कलिकाल का जुल्म टल गया है॥ ४ ॥
॥ छन्द ९ ॥
जब बल बिकल दिल देखि बिरहिन। गुरु मिलन मारग दई ॥
सखि गगन गुरु पद पार सतगुरु। सुरति अंस जो आवई ॥ १ ॥
सुरति अंस जो जीव घर गुरु। गगन बस कंजा मई ॥
अलि गगन धार सवार आई। ऐन बस गोगुन रही ॥ २ ॥
सखि ऐन सूरति पैन पावै। नील चढ़ि निरमल भई ॥
जब दीप सीप सुधारि सजि कै। पछिम पट पद में गई ॥
गुर गगन कंज मिलाप करि कै। ताल तज सुन धुनि लई ॥ ३ ॥
सुनि सब्द से लखि सब्द न्यारा। प्रालबद जद क्या कही ॥
जेहि पार सतगुरु धाम सजनी। सुरति सजिभजि मिलिरही ॥ ४ ॥
अस अलल अंड अकार डारै। उलटि घर अपने गई ॥
येहि भाँति सतगुरु साथ भेंटे। कर अलो आनँद लई ॥ ५ ॥
दुख दाउ कर्म निवास निस दिन। धाम पिया दरसत वहीं ॥
सतगुरु दया दिल दीन तुलसी। लखत भै निरभै भई ॥ ६ ॥
अर्थ-जब इस विरहिणी के हृदय को गुरु ने व्याकुल देखा, अपने मिलन द्वारा उसे (आगे का)
मार्ग दिखाया) हे सखी! गुरु गगन-गुफा के उस पार हैं और जब 'सुरति' का प्रकाश (आवेग) आता
है॥ १ ॥
घट रामायण / २५
जीव जो सुरति साधना का अंश है, गुरु के घर में आकर गगन की शून्य गुहा में रहते हुए
कमलमय हो गया। हे सखि! गगन की सहस्त्रारधार में अपने को सँवारती हुई केवल देखने भर के
लिए इन्द्रिय गुणों से जुड़ी दिखती है-अन्यथा वह स्वयं गुरुमय हो उठी है॥२॥
हे सखि! वह उस सहस्त्रार के नील पर्वत पर चढ़कर निर्मल हो उठी और उसकी लौकिक चेतना
विलुप्त हो उठी और वह आत्मा जब अपने दीप्त स्वरूप को थोड़ा और सुधार कर तथा साजसज्जा
करके उस पश्चिमी छोर पर पहुँची (सहस्त्रार बिन्दु के अनाहत नाद के पास) तो उस गुरु के द्वारा
आकाश (शून्याकाश) के सहस्त्रार कमल से मिल करके उसने अनाहद नाद की ध्वनि को सुना॥३॥
शब्द सुनकर तथा शब्दातीत ध्वनि की प्रतीति करके पहले से कहे जाते हुए लोक शब्दों की
निरर्थकता (प्राल बद) के विषय में क्या कहा जाए? हे सजनी! जिसके उस पार सद्गुरु की निवास
स्थली है, मैं सुरति के साथ सजी-धजी उनसे मिल पड़ी॥४॥
ऐसे अंडाकार संसार (अलल) अर्थात् ब्रह्मांड का त्याग करके मैं इससे अलग अब अपनी शून्य
स्थली गगन गुफा में पहुँच गई। इस प्रक्रिया द्वारा मैंने सतगुरु से भेंट किया और हे सखि! सारा आनन्द
प्राप्त कर लिया॥५॥
अपने पति परमात्मा के धाम में रहती हुई दुःख, दावाग्नि एवं कर्म की स्थली रूपी इस संसार को
निर्लिप्त भाव से द्रष्टा की भाँति देखती रहती हूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि यह दीनहीन जीव सद्गुरु के
दयाभाव से दर्शक की भाँति इस संसार को देखता हुआ निर्भय हो उठा॥६॥
॥छन्द १०॥
अलि आदि अजर दयाल सतगुरु। मर्म कहौ कहँ लगि कहूँ॥
उस कुटिल खोट मलीन बुधि मैं। चित छली मनमत रहूँ॥१॥
धर धोइ सतगुरु सरस साबुन। ज्ञान सिल जल मल बह्यो॥
सखि मैल मन जस चिकट कपरा। उजल हिये अलि अस भयो॥२॥
जब आदि अटल अनादि रँग में। चटक रँग सतगुरु दयो॥
कहुँ कौन सिफति सुनाइ सजनी। अचल सलिता सिंध लह्यो॥३॥
सिंध सब्द सतगुरु सुरति सलिता। अलि मिलन अस बिधि भयो॥
सिंध बुन्द तन मन बन बिराटा। बूझ बिन बादै बह्यो॥४॥
जब उलटि घर अलि आदि चीन्हेँ। दीन दिल सतगुरु लयो॥
सखि आदि अंत समाद समझी। बरनि बिधि जस जस कह्यो॥५॥
सखि संत सतगुरु बरनि बरनौ। भाखि समझि सुनावही॥
गुरु चारि तन अस्थान अलि सुनि। समझि भेद लखावही॥६॥
सखि प्रथम गुरु सुनि कँवल कंजा। सहस दल पल पावही॥
सखि दुसर गुरु गढ़ गगन ऊपर। कँवल दुइ दल गावही॥
अलि तीनि गुरु तन माहिं पेखौ। चौकवल स्रुति लावही॥७॥
सतलोक चौथे चार सतगरु। अगम सिंध कहावही॥
जबँ सुरति शब्द मिलाप सजनी। संत वोहि घर जावही॥८॥
सखि मूल संत दयाल सतगुरु। पिउ निहाली मोहि करी॥
सत सुरति सिंधु सुधारि तुलसी। सार पद ज़द लखि परी॥९॥
२६ / घट रामायण
अर्थ-हे सखी ! मेरे सतगुरु आदितत्त्व हैं, अजर-अमर हैं, बड़े ही दयावान हैं, उनके रहस्य का कहाँ
तक वर्णन करूँ। उनके अभाव में इस कुटिल, भ्रष्ट, मलिन बुद्धि में छलिया चित्त को लेकर जन्मता
रहता हूँ॥ १॥
सतगुरु ने अत्यन्त आनन्दमयी साबुन से मेरा शरीर (घर) धो डाला और ज्ञान की शिला पर से
मलिन जल बह गया। हे सखि ! चिरकुट कपड़े जैसा मलिन मन अब इतना निर्मल एवं उज्ज्वल रूप का
हो उठा ॥ २॥
चित्त की इस उज्ज्वलता के वस्त्र पर अपने मूल रंग से रंगकर अब उसे और चटकदार बना दिया।
हे सखि ! फिर मैं उसका क्या वर्णन करूँ, जैसे कोई अचल नदी सिंधु रूप परमात्मा में जाकर मिल
उठी हो ॥ ३ ॥
इस प्रकार, सुरति नदी के सतगुरु सिंधु से मिलन हो उठा। सीमित तन मन में स्थित चेतना बिन्दु इस
संगम से विराट हो चली और मेरी यह समझ में न आया, कि वह मन कब ब्रह्म धारा में बह उठा ॥ ४॥
हे सखी ! जब उत्मनी दशा में अपने मूल आध्यात्मिक निवास की पहचान कर ली तो पता चला कि
यह दुर्बल दीन आत्म तत्त्व अब मेरा नहीं, सतगुरु का हो उठा। हे सखि ! आदि-अन्त तक मैंने उस
रचना को समझा और जैसा-जैसा मुझे बताया गया है, उसी प्रकार मैंने यहाँ (इस कृति में) उसका
वर्णन किया है ॥५॥
हे सखि ! सद्गुरु सन्त ने इसका जो कुछ भी वर्णन किया है, स्वयं समझने के बाद कहकर सुना
रहा हूँ। हे सखी! इन चार स्थलों का गुरु मुख से वर्णित स्वरूप सुनो और में (गुरुमुख से सुन
समझकर) उनका भेद बता रहा हूँ॥६॥
हे सखी! इन चारो में से प्रथम बिन्दु पर 'कँवल कंज' है जिसमें सहस्रार दल समाधि के क्षण
(पल) प्राप्त होता है। हे सखि ! दूसरा गगन गुहा के ऊपर स्थित सतगुरु का गढ़ है-जहाँ दो दलों वाला
कमल है। हे सखी! सतगुरु के शरीर को देखो, जहाँ चार दलों वाला कमल सुरति समाधि प्राप्त कराता
है (स्रुति लावहीं) ॥७॥
सतगुरु का चौथा लोक सत लोक है-जो अगम सिंधु के नाम से पुकारा जाता है-उसे 'अगम्य
सिंधु' भी कहा जाता है। इस सिन्धु से सुरति साधना का संगम होता है और संतों की चित्त दशा निरन्तर
वहीं जाकर निवास करती है ॥८॥
हे सखि! जगत के मूल (परमात्मा रूप) संत तथा दयालु सत्यगुरु ने मुझे पति परमात्मा के लिए
व्याकुल बना दिया है। तुलसी साहब कहते हैं कि सत् सुरति समाधि रूपी समुद्र को सुधारो, तभी वह
परमात्मा रूपी सार तत्त्व दिखाई पड़ सकता है ॥९॥
॥ छन्द ११ ॥
लख अगम भेद अलोक अलि री। संत सतगुरु मोहिं कह्यौ ॥
तिहुँ लोक से री अलोक न्यारा। पार मारग मोहिं दयौ ॥ १॥
सिंध सब्द सतगुरु किरनि चेला। सुरति सब्द मिलावही ॥
सतलोक सिंध सम्हार अलि लख। मिलन समझ सुनावही ॥ २॥
सखि सिंध बुन्द मिलाप सतगुरु। किरनि सुरज कहावही ॥
सखि समुद जल जस भरत बदरा। भूमि बरस बहावही ॥ ३॥
अलि सिमटि नीर समीर सलिता। सिंध समझि समावही ॥
सखि सिंध बुन्द जो सिष्य सतगुरु। गवन गत मत गावही ॥ ४॥
सखि जलहि जल बल एक करिकै। भूमि भर्म नसावही ॥
घट रामायण / २७
चित चीन्ह जैसे खेल चौपड़। जुग नरद घर आवही ॥ ५ ॥
जिमि किरनि भास निवास रबि में। गगन मर्म मिलावही ॥
अलि गगन नास अकास बिनसै। रबि रहन नहिं पावही ॥ ६ ॥
अलि सिंधु सूरज ब्रह्म कहि नद। किरनि जीव कहावही ॥
सब ठाट बाट बिराट बिनसै। सुरज कहँ होइ रहावही ॥ ७ ॥
सखि सुरज ब्रह्म विनास किरनी। जब अकास नसाइये ॥
सखि सुरज कहौ केहि ठाम रहि। सोइ समझ खोज लगाइये ॥ ८ ॥
अर्थ-हे री सखी! इस अगम्य (अध्यात्मिक) लोक को देखकर संत सतगुरु ने मुझसे कहा। यह
आध्यात्मिक लोक तीनों लोकों से विलक्षण है और इस लोक में प्रवेश का मार्ग मुझे गुरु ने ही बताया
है ॥ १ ॥
इस ज्ञान के बाद मुझे लगने लगा कि सिन्धु शब्द ही सतगुरु है और उस जल की चमक शिष्य है।
गुरु तथा शिष्य को सुरति ध्यान ही एक करता है। हे सखि! देखो, इस सिन्धु में ही 'सत् लोक' समाया
हुआ है और शिष्यगण सिन्धु तथा बिन्दु के मिलन के अनुभव का ही गुणगान करके सुनाते रहते
हैं॥२॥
हे सखि! सिन्धु एवं शिष्य रूपी बिन्दु का मिलाप ही सतगुरु (ब्रह्म) है। यह सम्मिलन उसी प्रकार
है, जैसे सूर्य और उसकी किरणों का मिलाप। हे सखि, समुद्र का जल जैसे अपने में आत्मसात् करके
बादल पुनः उसे भूमि पर बरसाता है-उसी प्रकार शिष्य भी सत्गुरु के सम्पर्क में ब्रह्मानुभूति से आत्म
साक्षात्कार करके उसे पुनः लोक में जन समुदाय के बीच रखता है ॥ ३ ॥
हे सखि! वही जल तथा वायु तथा तालाबों को सिन्धु समझकर उसमें पुनः समाविष्ट हो उठता है।
ठीक उसी प्रकार, शिष्य तथा सतगुरु बिन्दु तथा समुद्र हैं जो परस्पर एक दूसरे से परिपक्व होकर पुनः
उन्हीं में मिल जाते हैं। अतः एक दूसरे से मिले होने के उनके स्वरूप का मैं वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥
हे सखि! साधक शिष्य तथा गुरु दोनों जल को ही जल के माध्यम से ही एक रूप करके भूमि
(माया) होने का भ्रम दूर करते हैं। अपने चित्त से पहचानों जैसे चौपड़ खेल के खिलाड़ी दो हैं किन्तु
एक ही घर को लौटते हैं ॥ ५ ॥
जिस प्रकार किरणों के प्रकाश का निवास सूर्य में है और आकाश इस मर्म का नियन्ता है। हे
सखि! उसी प्रकार, जैसे आकाश का विनाश होने के बाद समझ शून्य नष्ट हो जायेगा और वहाँ सूर्य
रहने नहीं पाएगा ॥ ६ ॥
जब आकाश नष्ट हो जाएगा तो हे सखि! सूरज की किरणें भी विनष्ट हो उठेंगी-तब बताओं, वह
सूरज कहाँ है, किस स्थान पर चला गया, सोच समझ कर खोज करो ॥ ८ ॥
सोइ धाम ठाम ठिकात सजनी। घर समझ जहँ जाइये ॥
नहिं और आस बिनास सबको। कोइ रहन नहिं पाइये ॥ ९ ॥
सखि नीर छीर मिलाप समुन्दर। बदर फिरि भरि लावहीं ॥
जल बरसि नद मिलि समुंद आवै। जाइ पुनि फिरि आवही ॥ १० ॥
अस जीव आवागवन माहीं। ब्रह्म जीव कहावही ॥
बस कर्म काल बिनास निस दिन। अगम घर नहिं पावही ॥ ११ ॥
अलि समुन्द आदि बुन्याद कह सोइ। स्त्रोत केहि घर गावही ॥
२८ / घट रामायण
करि खोजि रोज बिचारि मन में। गैल गुरु सँग पावही ॥ १२ ॥
सखि संत चरन निवास चेरी। अधर समझ सुनावही ॥
लखि सिंध बुन्द से अगम आगे। देखि समझि समावही ॥
सोइ समझ सतगुरु सार सजि के। लेख लखन लखावही ॥ १३ ॥
जिमि धार मिलि जल मीन चढ़िके। अधर घर धसि धावही ॥
अलि अमर लोक निवास करिके। सुख अचल जुग पावही ॥ १४ ॥
गुरु कंज सतगुरु मज मिलि के। अंज अमल पिलावही ॥
सज सुरति निरति सम्हार मिलिके। पिलि पुरुष पिय पावही ॥ १५ ॥
एरी अगम दीनदयाल सतगुरु। हाल हरष निहारही ॥
तुलसिदास बिलास कहि अस। संत अज अरथावही ॥ १६ ॥
अर्थ-हे सजनी! उस स्थान को खोजो क्योंकि वही आत्मा का मूल निवासस्थल है, वही उसका
ठिकाना है (ठाँव) है, और वह साधक का घर है तथा उसी को ही अपना समझ कर वहीं जाओ। सभी
के लिए अन्य कोई निवास स्थली की आशा नहीं है तथा वह अन्यत्र नहीं रहने पाएगा ॥ ९ ॥
हे सखि! आत्मा तथा ब्रह्म का मिलाप, नीर-क्षीर मिलन समुद्र से सम्बद्ध है और बादल पुनः पुनः
उसी से ले जाते तथा वहीं दे आते हैं। बादल जल बरसते हैं, वह नदी में आता है और नदी के द्वारा गया
हुआ जल पुनः समुद्र में आता है ॥ १० ॥
इस प्रकार, जीव जगत में आवागमन के कारण केवल जीव कहलाता है और कर्म तथा काल के
प्रभाव से यह विनाशधर्मी जीव अज्ञानता वश ब्रह्म का सानिध्य नहीं प्राप्त करता ॥ ११ ॥
हे सखि! उसी अनादि समुद्र को निर्गुण ब्रह्म समझें, वही जगत का मूल तथा आदि आधार है।
उसका स्रोत कहाँ है, किसी को पता नहीं है। मन में अच्छी तरह से प्रतिदिन विचार करके देखो, उसे
पाने का मार्ग (गैल) गुरु सान्निध्य से ही प्राप्त किया जा सकता है ॥ १२ ॥
हे सखि! सन्त-चरणों में निवास करके उनकी दासी बनो और वे अन्तः लोक में स्थित उस ब्रह्म
विद्या के विषय में बताएँगे। उस मूल ब्रह्म तत्त्व को बिन्दु और सिन्धु के मिलन की दशा के भी आगे
समझकर, देखकर उसमें विलीनता प्राप्त करो ॥ १३ ॥
जिस प्रकार जल तथा धारा पर जलस्थित मछली चढ़कर अपने अन्तर्तम में स्थित निवास में प्रवेश
करके दौड़ती है-नितान्त सहजभाव से, वैसे ही, साधक उस अमर लोक में निवास करता हुआ अनन्त
-अनन्त युगों तक आनन्द प्राप्त करेगा ॥ १४ ॥
गुरु रूपी कमल और सतगुरु (ब्रह्म) रूपी सौन्दर्य (का मंत्र) मिलकर निर्मल अमृत (अंज) का
पान कराएँगे। इस प्रकार सुरति-निरति के सौन्दर्य से सज्जित स्वयं पति रूपी ब्रह्म के सान्निध्य का सुख
प्राप्त करोगे ॥ १५ ॥
अरी री! सखी!! सर्वथा अगम्य दीन दयालु प्रभु ही सतगुरु हैं-प्रतिक्षण हर्षपूर्वक वे भक्त की दशा
देखते रहते हैं। तुलसी साहब उनके इस निर्गुणमयी लीला-विलास का सन्त महात्माओं के लिए गान
करते हुए उनके अजत्व की अर्थमीमांसा करते हैं ॥ १६ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी अगम निवास, सुरति बास बस घर किया ॥
पिया परम रस मूल, सो अतूल अंदर हिया ॥ १ ॥
घट रामायण / २९
फूली बन फुलवारि, भीतर घट के कहि कही॥
खग मृग सरवर ताल, गुरु निहाल करि लखि लई॥ २॥
अर्थ-तुलसीसाहब बताते हैं कि ब्रह्म का निवास ऐसे स्थान पर है जो सर्वथा अगम्य है। सुरतियोग
के फलस्वरूप मैंने भी वहीं अपनी निवास स्थली बना ली। वह मेरा ब्रह्म पति आनन्द का अधिष्ठान है
और वह अतुलनीय विलक्षण मेरे हृदय के अन्तरतम में है॥ १॥
उसके साथ रहने पर इस शरीर के अन्तरतम की पुष्प वाटिका खिल उठी है और इसी शरीर में
उसकी कृपा से मैं पक्षी, मृग (वन पशु), सरोवर, ताल आदि सब कुछ देख रहा हूँ॥ २॥
॥ सोरठा ॥
तन मन ब्रह्मांड पसार, अंड अंड नौखंड लौं।
सो घट लखन मँझार, करत सैल ब्रह्मांड की॥ १॥
सतगुरु गगन गुहार, गगन मगन स्रुति मिलि रही।
मन्दिर मगन निहार, कंज भान भिन के कही ॥ २॥
अर्थ-इस शरीर तथा मन के अन्दर ब्रह्मांड फैल उठा है, अंडों की भाँति ब्रह्मांड जैसे इसी में स्थित
हो। मैं इस (वाणी) के अन्दर ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जैसे सैर (सैल) कर रहा हूँ॥ १॥
इस पिंड रूपी आकाश में सतगुरु (ब्रह्म) की ही वाणी सुनाई पड़ रही है-उस प्रभु की ध्वनि इसी
हृदयाकाश में इसी सुरति के साथ विलीन भी हो रही है। मैं आनन्दित भाव से आत्मा के अधिष्ठान रूप
शून्य गगन के उस मंदिर को देख रहा हूँ, जहाँ भिन्न-भिन्न कमल हैं और भिन्न-भिन्न सूर्य बताये जाते
हैं॥ २॥
॥ दोहा ॥
भास भवन घट में लखी, सलिल कँवल के माहिँ।
पदम पार बेनी बसी, लसी अधर चढ़ि धाइ॥
अर्थ-ब्रह्म का अधिष्ठान मैंने शरीर में अनुभव किया, यहीं बिना जल के कमल देखा-इस कमल
के उस पार बनी हुई त्रिवेणी (सहस्रार की सन्धिस्थली) दिखाई पड़ी-यह सब हमने अन्दर-अन्दर ही
दौड़ते हुए शून्य शिखर पर चढ़कर देखा॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तोल निहार, गुरु अगम पद पदम हीं।
कर दृग ऐन अधार, पार परस पट भवन में॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भलीभाँति तौलकर (मूल्यांकन करके) देख लिया है कि गुरु
के चरण-कमल ही अगम्य (को जानने के हेतु) हैं। इस संसार के रहस्य को आवृत किए हुए पट
(परदे) को देखने के लिए गुरु के ज्ञान दान से प्राप्त निर्मल दृष्टि को ही आधार बनाओ॥
॥ शब्द चरचरी ॥
तुलसिदास भास भवन, देखा घट माहीं।
लाई स्रुति सलिल कँवल, पदमन पर जाई॥ टेक॥
सतगुरु गिरि गगन, मगन, मंदिर मानौ अजूब।
३० / घट रामायण
कंजा भजि भलक भान, कोटिन छबि छाई॥ १॥
बेनी मजन अनूप, रहिनी अन्दर अरूप।
चंदा रबि रैनि दिवस, तारे नभ नाही॥ २॥
बरनन लखि अलख ऐन, स्याम सिखर निकर कंद।
निरता स्रुति समझि सूर, पकज अपनाई॥ ३॥
अंडा अंबुज अतूल, बेलि बृच्छ अधर मूल।
फूला फल बन निवास, ललित लता छाई॥ ४॥
भंवर भृंग लसि सुगंध, उरझे रस बस बिलास।
आनंद सीतल समीर, सखर तट माई॥ ५॥
जहँ जहँ दृग देखि जात, खगपति कृति नभ उड़ात।
बन बन मृग चरत जात, कोकिल करकाई॥ ६॥
धरिकै धस धरन डोर, दृढ़कै चढ़ि कड़क कोक।
धधकत धसि धधक नीर, फूटा पुल जाई॥ ७॥
भाखा भीतर बयान, सज्जन सुनि समझि साथ।
अद्बुद अज अजर बात, संतन लखवाई॥ ८॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्म भवन का ज्ञान (भास) मुझे हो गया है और वह शरीर
(घट) के अन्दर ही है। मैं शरीर के अन्दर स्थित इस भवन में जाकर स्थित कमल को सुरति रूपी
जल में आया॥ टेक॥
सतगुरु ब्रह्म गगन (शून्य) पर्वत पर मग्न हैं-उनका मंदिर (भवन) मानों मंदिर न होकर कोई
अजूबा हो। वहाँ गगन-गुफा में स्थित कमल दल का ध्यान करो (भजि) उसी के माध्यम से कोटि-
कोटि छवियों से अलंकृत सूर्य सुन्दर प्रतीत (झलक) होगा॥ १॥
उस इंडा-पिंगला एवं सुषुम्ना रूपी त्रिवेणी का स्नान अनुपम है, उसके अन्दर चित्त का निवास तो
और भी अनुपम है। यहाँ रात-दिन चन्द्र एवं सूर्य निरन्तर बने रहते हैं किन्तु उस आकाश में तारे नहीं
हैं॥ २॥
उस अलक्ष्य गृह का रूप देखकर तथा उसके श्यामल (शून्य) शिखरों के समूह का अनुभव
करके जो लोकवासनाओं से विरक्त जन एवं समाधि सिद्ध योगिजन (सूर) हैं, वे उस सहस्रार कमल
को अपना लेते हैं-अर्थात् अपनी समाधि सहस्रार में लगाए रहते हैं॥ ३॥
उस सहस्रार कमल को सम्हालने वाला ब्रह्मांड अतुलनीय है, उसके नीचे लताएँ, वृक्ष तथा
लटकती हुई जड़ें हैं-उस वन के परिसर में निवास है, फल-फूल मंडित ललित लताएँ छाई हुई हैं॥ ४॥
साधना विलास सुगंधि और रस में आनन्दित (उलझे) भ्रमर समूह फैले है। उस सरोवर के तट पर
शीतल वायु आनन्द दे रही है॥ ५॥
जहाँ जहाँ नेत्रों की दृष्टि जाती है, गरुण आकाश में उड़ते जैसे दिखते हैं। वन-वन में मृग समूह
चरते दिखते हैं तथा कोकिला कुहुकती रहती है॥ ६॥
हे साधक! इस शून्य में समाधि की डोरी पकड़ कर उसमें प्रवेश करो और पूरी दृढ़ता से उस
अविचल कमल में अध्यवसित (प्रविष्ट) होओ। तुम्हारे प्रवेश काल में शून्य सरोवर का वह जल
धधकता है (धधकेगा) और उसका सेतु फूटने-सा लगेगा (किन्तु हे साधक! तुम विचलित न
होना)॥ ७॥
घट रामायण / ३१
हे सज्जनों! मैं घट-ब्रह्मांड के भीतर की स्थिति का वर्णन मैं कर चुका, इसे सुनें और साथ-साथ
समझ लें। यही सर्वाधिक अद्भुत, अज एवं मृत्युमुक्त चर्चा (बात) है और इसे सन्तों को मैंने दिखा
दिया है॥ ८॥
॥ सोरठा ॥
भान भवन घट वास, लखि अकास अन्दर गई।
लीला गिरि चित चास, दीपक मंदिर मरम जस ॥ १ ॥
अर्थ-जब सूर्य के प्रकाशमय भवन में शरीर तथा चित्त का निवास हुआ तब वहाँ शून्याकाश
देखकर विलासवती आत्मा उसमें प्रवेश कर गई। उसके मन में अब लोला गिरि की साध (चास) हो
गई है और यह उसी प्रकार है-जैसे मंदिर के अन्दर दीप (प्रभा) का रहस्य अर्थात् मन्दिर एवं दीपक
दोनों एक दूसरे को प्रकाशित करते हैं-उसी प्रकार शून्याकाश में आत्मा परमतत्त्व एक दूसरे को
आलोकित करने लगे ॥ १॥
॥ दोहा ॥
लखि प्रकास पद तेज, सेज गवन गढ़ गगन में।
पति प्रिय प्रेम बिलास, तुलसिदास दस गिरा में॥ २॥
अर्थ-प्रकाश के इसके तेजोमय स्वरूप (पद) को देखकर शून्याकाश रूपी दुर्ग में स्थित पति
(ब्रह्म) की शय्या पर उसने गमन किया। दसों द्वार वाले उस भवन में जाकर, तुलसी साहब कहते हैं
कि, वह अपने प्रियतम पति के विलास में डूब गई ॥ २॥
॥ सोरठा ॥
मैं मति ऐन अयान, गुरु बयान मो को कह्यौ।
लह्यौ गगन सोइ जान, सतगुरु मंजन पदम हीं॥ ३॥
सतगुरु अगम अपार, सार समझि तुलसी कियो।
दया दीन निरधार, मोहिं निकार बाहिर लियो॥ ४॥
अर्थ-अज्ञान भरे चित्त वाले मुझ शिष्य को गुरु ने इस अध्यात्म विद्या का वर्णन किया-फिर ब्रह्म
रूपी गुरु के चरणों का प्रक्षालन करता हुआ मैंने ज्ञानदृष्टि से उसे शून्य आकाश को समझा॥ ३॥
मेरे सतगुरु अगम्य हैं, अपार हैं, मैंने उनके होने का मूल तत्त्व समझकर उन्हें गुरु माना। बिना
किसी कारण के अर्थात् अकारण इस दीनजन पर उनकी दया बनी रही, वे सतगुरु ही हैं-जिन्होंने इस
मायामय संसार से निकालकर मुझे मुक्त कर दिया॥ ४॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु संत दयाल, करि निहाल मो को दियो।
मूरति सिन्ध सुधार, सार पार जद लखि पर्यो॥ ५॥
अर्थ-सतगुरु ही वह दयावान् सन्त हैं, जिन्होंने मुझे वह परम तत्त्व देकर विह्वल बना दिया। सुरति
साधना द्वारा सिन्धु के मार्ग को सुधारा और मैं और इस भवसागर के पार जैसे दिखाई पड़ने लगा॥ ५॥
॥ सोरठा ॥
संत चरन पद धूर, मूर मरम मो को दई।
भई निरति श्रुति सूर, लइ समान मन चूर करि॥ १॥
३२ / घट रामायण
मैं मति मान अपूर, कूर कुटिल न्यारे किये।
हिये तिमर तन दूर, तूर तमक तन की गई॥२॥
मो मन सुरति अयान, जानि सुरति सत रीति ले।
गहि कर संत सुजान, मान मनी मद छाँड़ि के॥३॥
मैं मति सत सम नाहिं, पाइ पकरि लारै लई।
सतगुरु दीन दयाल, जाल काट न्यारी करी॥४॥
सतगुरु चरन निवास, बिमल बास बिधि लखि परी।
धरी जो तुलसीदास, भास चमक चढ़ि चाँप धरि॥५॥
सतगुरु परम उदार, दल दरिद्र सब दूरि करि।
संपति सुरति बिचार, निधि निहार सच्छै लखा॥६॥
अर्थ-सन्त की चरणधूलि ने ही मुझे रहस्य के मूल तत्त्व को दिया है। मेरी मति निरति और सुरति
के कारण सबल हो उठी और तुच्छ वस्तु के सदृश उन्होंने मन को (लोकमन को) नष्ट कर दिया॥१॥
मुझ अपूर्ण बुद्धि के व्यक्ति की क्रूरता, कुटिलता को गुरु ने मुझसे अलग किया। मेरे हृदय का
अँधेरा दूर हुआ और शरीर का अहम् और गर्व (तूर तमक) दूर हो गया॥२॥
सुरति-समाधि तथा ज्ञान से सर्वथा अज्ञानी मेरे चित्त ने सत्य रीति (सही-सही तरीके से) से सुरति
को समझा और इस प्रकार मन के मान एवं मद विकार का परित्याग करके सज्जन संत का हाथ
पकड़ा (सहारा लिया)॥३॥
मैं अपनी मति के अनुसार सत्यमय नहीं था-गुरु के चरणों को पकड़ कर उसी में अपनी निष्ठा
(लारै) लगाई और दीनों के प्रति अत्यधिक दयाभाव रखने वाले मेरे गुरु ने मायिक संसक्ति (जाल)
को काटकर मुझे उससे मुक्त कर दिया॥४॥
सतगुरु के चरणों की छाया में निवास करने से निर्मल (पवित्र) निवास की विधि मुझे दिखाई पड़
गई। इस तुलसी साहब ने उसे ग्रहण करके अदृश्य में प्रकाशित तत्त्व को देखकर समझा॥५॥
मेरे सतगुरु परम उदारमना हैं, मेरी दरिद्रता के सारे समूहों को उन्होंने विनष्ट किया। उनके ज्ञान दर्शन
के बाद ही मुझे सुरति ज्ञान जैसी संपत्ति समझ में आई और उसी के माध्यम से अपूर्व ज्ञान रूपी निधि
को देखकर 'अनाहत नाद' जैसे शब्द से साक्षात्कार किया है॥६॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
परथम बन्दौं सतगुरु स्वामी। तुलसी चरन सरनि रति मानी॥
पुनि बन्दौं संतन सरनाई। जिन पुनि सुरत निरत दरसाई॥
चरन सरन संतन बलिहारी। सूरति दीन्ही लखन सिहारी॥
सरन सूर सूरति समझाई। सतगुरु सूर मरम लख पाई॥
मैं मतिहीन दीन दिल दीन्हा। संत सरल सतगुरु को चीन्हा॥
सतगुरु अगम सिंध सुखदाई। जिन सत गेह रीति दरसाई॥
पुनि पुनि चरन कँवल सिर नाऊँ। दीन होइ संतन गति गाऊँ॥
दीन जानि दीन्ही मोहिं आँखी। मैं पुनि चरन सरनगहि भाखी॥
प्रथम खण्ड: घट-घट राम एवं सुरति-शब्द योग निरूपण
घट रामायण / ३३
मैं तौ चरन भाव चित चेरा। मोहिं अति अधम जानि कै हेरा॥
मैं तौ प्रति प्रति दास तुम्हारा। संत बिना कोई पावै न पारा॥
संत दयाल कृपा सुखदाई। तुम्हारी सरन अधम तरि जाई॥
आदि न अंत संत बिन कोई। तुलसी तुच्छ सरन में सोई॥
जो कुछ करहिं करहिं सोइ संता। संत बिना नहिं पावै पंथा॥
मोरे इष्ट संत श्रुति सारा। सतगुरु संत परम पद पारा॥
सतगुरु सत्तपुरुष अबिनासी। राह दीन लखि काटी फाँसी॥
कँवलकंज सतगुरु पद वासी। सूरति कीन दीन निज दासी॥
सूरति निरत आदि अपनाई। सतगुरु चरन सरन लौ लाई॥
बार बार सतगुरु बलिहारी। तुलसी अधम अघ नाहिं बिचारी॥
बन्दौं सब चर अचर समाना। जानौ तुलसी दास निदाना॥
मैं किंकर पर दया बिचारा। अनहित प्रिये करौ हित सारा॥
सब के चरन बन्दि सिर नाई। प्रिये लार लै प्रीति जनाई॥
तुम प्रति भूल बंद अस गाई। बार बार चरनन सिर नाई॥
पुनि बन्दौं सतगुरु सत भावा। जिनसे बस्तु अगोचर पावा॥
सतगुरु अगम अरूप अकाया। जिनकी गति मति संतन पाया॥
सतगुरु की कस करहुँ बखानी। सूरति दीन्ही अगम निसानी॥
लख लख अलख सुरति अलगानी। संतकृपा सतगुरु सहदानी॥
सूरति सैल पेल रस राती। सतगुरु कंज पदम मदमाती॥
तुलसी तुच्छ कुछ नहिं जानै। सतगुरु चरन सरन रत मानै॥
सूरति सतगुरु दीन्हि जनाई। नित नित चढ़ै गगन पर धाई॥
सैल करै ब्रह्मांड निहारा। देखै आदि अंत पद सारा॥
निरखा आदि अंत मधि माहीं। सोइ सोइ तुलसी भाखि सुनाई॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड समाना। तुलसी देखा अगम ठिकाना॥
पिंड ब्रह्मांड में आदि अगाधा। पेली सुरति अलख लख साधा॥
पिंड ब्रह्मांड अगम लख पाया। तुलसी निरखि अगाध सुनाया १॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना। ता की तुलसी करो बखाना॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि उनके चरणों की शरण की संसक्ति स्वीकार करके मैं सर्वप्रथम
स्वामी सतगुरु की बन्दना करता हूँ॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में "अगाध सुनाया" की जगह "परख गत गाया" और आगे की कड़ी में
"दिखाना" की जगह "समाना" है।