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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

२२ / घट रामायण
हे सखि! वह ब्रह्मांड (अंडन), सृष्टि (खलक) के बीच अलक्ष्य रूप में वह पलकों के पटों तथा
घट-घट में खड़ा है। तुलसी साहब कहते हैं कि वह तुलनीय एवं अकथ्य वाणी से (पृथक्) है और
बिरले ही उसे देखते और समझते तथा प्राप्त करते हैं॥ ५॥
॥ छन्द ५ ॥
अलि देख लेख लखाव मधुकर। भरम भौ भटकत रही॥
दिन तीनि तन सँग साथ जानौ। अंत आनंद फिरि नहीं ॥ १ ॥
जग नहिन सार असार सखिरी। भ्रमत बिधि बस भौ महीं॥
धन धाम काम न कनक काया। मुलक माया लै बही ॥ २ ॥
येहि समझि बूझि बिचारिमन में। निरखि तन सपना सही॥
जम जाल जबर कराल सजनी। काल कुल करतब लई ॥ ३ ॥
सब तिरथ बरत अचार अलि से। कर्म बस बन्धन भई ॥
तुलसि तरक बिचारि तन मन। संत सतगुरु अस कही ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! उसके रूप लेख, उसके लक्षण, रूप सौन्दर्य तथा आकर्षण को देखकर भ्रमर
भ्रमित होकर भटकता रहा। वह इस शरीर के साथ उसमें लिप्त होकर कुछ ही दिनों तक (दिन तीनि-
मृत्यु तक) साथ रहा और उसके बाद उसको वह आनन्द उसे पुनः नहीं मिला॥ १॥
हे सखी! इस असार संसार में कोई सार तत्त्व नहीं है और प्राणी भ्रमवश दैवाधीन होकर भ्रमित
होता रहता है। वह माया रूपी नदी धन, धाम (गृह), कामनाओं, स्वर्णिम शरीर तथा सारे देश की माया
लेकर बह जाती है॥ २॥
मन में इस बात को समझ, बूझ तथा विचार करके देखो कि यह सब सही-सही स्वप्न है। हे
सजनी! यम का फन्दा बड़ा ही मजबूत तथा कठोर है और वह व्यक्ति के काल, कुल एवं कर्म-कौशल
(करतब) को नष्ट कर देता है॥ ३॥
हे सखी! समस्त तीर्थ, व्रत, धर्माचरण ये कर्मवश होकर व्यक्ति के लिए बन्धन बन जाते हैं।
तुलसी साहब निष्कर्ष निकालते हुए कहते हैं कि तन मन से तर्पण करते हुए मेरे इस कथ्य पर विचार
करो कि किसी सद्गुरु संत ने इस प्रकार बताया है॥ ४॥
॥ छन्द ६ ॥
सखि समझि सूर सहूर सुनि कै। बदन बिच सुधि बुधि गई॥
करूँ कवन भवन उपाव बिन बस। नेक मधुकर बस नहीं ॥ १॥
मिलि पाँच तीनि पचीस निसदिन। गाँठि गुन बन्धन भई ॥
भइ बिबस बस नहिँ दाँव लागै। दृढ़ निमख१ नहिँ आवही॥ २॥
धरि हाथ पटकि पुकारि पिव सँग। हारि जिव सँग हटि रही॥
कहुँ ठौर मोर न जोर चालै। आली बिपति कुछ का कही ॥ ३॥
सुनि ज्ञान ध्यान न कान मानै। बिकल तन मन बिचलई ॥
तुलसी बिरह बेहाल१ हिये में। मौत दिन देवै दई ॥ ४॥
१. लाड़-प्यार